मेरी वैरागी चौखट पर, घी का दीपक धरने वाले।
मेंहदी की ख़ुशबू में डूबे, पहले हाथ तुम्हारे ही हैं।।
मैं सदियों से चुप बैठा था,
नक्षत्रों में हठयोगी-सा।
तुमने सुर्ख़ चूड़ियों वाले,
नरम हाथ से क्यों छू डाला।।
जिसकी रखवाली करते थे,
जाने कब से ढीठ अंधेरे।
उस पत्थर की मूरत पर क्यों,
आकर डाल गये जयमाला।।
अब तुमको ही सुलझानी हैं, ख़ामोशी की ख़ुश्क जटायें,
क्योंकि मैंने तो सदियों तक, इसके केश सँवारे ही हैं।।
मेरे पथरीले हाथों पर,
कब्ज़ा चोटिल रेखाओं का।
तुम कहते हो, मैं इस पहली,
उबटन का उदघाटन कर दूँ।।
तुमने अपने चिर-यौवन के,
द्वारे पर जो खींच रखी है।
तुम कहते हो, मैं उस अंधी
रेखा का उल्लंघन कर दूँ
तो मैं अवरोहण करता हूँ, झूठी नैतिकता के ध्वज का।
क्योंकि तुमने तो ये परचम, जनमो-जनम उतारे ही हैं।।
तुम जो ना इक फूल चढ़ाकर,
इस पत्थर को पावन करते।।
कैसे इस कलमुंहे जगत को,
एक देवता पूरा मिलता।।
मैं हाथों में छैनी लेकर,
खुद अपना पौरुष गढ़ता था।
तुम न आते तो जग को फिर,
मेरा बदन अधूरा मिलता।।
तुम ही इस प्रतीक्षा के अब, होठों पर गंगाजल रख दो।
क्योंकि मैंने तो जनमों तक, इसके पांव पखारे ही हैं।।
-कुमार पंकज
پہلے ہاتھ تمہارے ہی ہیں
میری وےراگي چوكھٹ پر، گھی کا دیپک دھرنے والے.
مہندی کی خوشبو میں ڈوبے، پہلے ہاتھ تمہارے ہی ہیں ..
میں صدیوں سے خاموش بیٹھا تھا،
نكشترو میں هٹھيوگي - سا.
تم نے سرخ چوڑيو والے،
نرم ہاتھ سے کیوں چھو ڈالا ..
جس کی حفاظت کرتے تھے،
جانے کب سے ڈھيٹھ اندھیرے.
اس پتھر کی مورت پر کیوں،
آ کر ڈال گئے جيمالا ..
اب تم ہی سلجھاني ہیں، خاموشی کی خشک جٹايے،
کیونکہ میں نے تو صدیوں تک، اس کیس سوارے ہی ہیں ..
میرے پتھريلے ہاتھوں پر،
قبضہ زخمی رےكھاو کا.
تم کہتے ہو، میں اس پہلی،
ابٹن کا افتتاح کر دوں ..
تم نے اپنے چر - جوانی کے،
دوارے پر جو کھینچ رکھی ہے.
تم کہتے ہو، میں اس اندھی
لائن کی خلاف ورزی کر دوں
تو میں اوروه کرتا ہوں، جھوٹی اخلاقیات کے پرچم کا.
کیونکہ تم نے تو یہ پرچم، جنمو - جنم اتارے ہی ہیں ..
تم جو نا اک پھول چڑھا کر،
اس پتھر کو پاون کرتے ..
کس طرح اس كلمهے دنیا کو،
ایک دیوتا مکمل ملتا ..
میں ہاتھوں میں چھےني لے کر،
اپنا پورش گڑھتا تھا.
تم نہ آتے تو جگ کو پھر،
میرا بدن ادھورا ملتا ..
تم ہی اس انتظار کے اب، ہونٹوں پر گنگاجل رکھ دو.
کیونکہ میں نے تو جنمو تک، اس کے پاؤں پكھارے ہی ہیں ..
- کمار پنکج
मेरी वैरागी चौखट पर, घी का दीपक धरने वाले।
मेंहदी की ख़ुशबू में डूबे, पहले हाथ तुम्हारे ही हैं।।
मैं सदियों से चुप बैठा था,
नक्षत्रों में हठयोगी-सा।
तुमने सुर्ख़ चूड़ियों वाले,
नरम हाथ से क्यों छू डाला।।
जिसकी रखवाली करते थे,
जाने कब से ढीठ अंधेरे।
उस पत्थर की मूरत पर क्यों,
आकर डाल गये जयमाला।।
अब तुमको ही सुलझानी हैं, ख़ामोशी की ख़ुश्क जटायें,
क्योंकि मैंने तो सदियों तक, इसके केश सँवारे ही हैं।।
मेरे पथरीले हाथों पर,
कब्ज़ा चोटिल रेखाओं का।
तुम कहते हो, मैं इस पहली,
उबटन का उदघाटन कर दूँ।।
तुमने अपने चिर-यौवन के,
द्वारे पर जो खींच रखी है।
तुम कहते हो, मैं उस अंधी
रेखा का उल्लंघन कर दूँ
तो मैं अवरोहण करता हूँ, झूठी नैतिकता के ध्वज का।
क्योंकि तुमने तो ये परचम, जनमो-जनम उतारे ही हैं।।
तुम जो ना इक फूल चढ़ाकर,
इस पत्थर को पावन करते।।
कैसे इस कलमुंहे जगत को,
एक देवता पूरा मिलता।।
मैं हाथों में छैनी लेकर,
खुद अपना पौरुष गढ़ता था।
तुम न आते तो जग को फिर,
मेरा बदन अधूरा मिलता।।
तुम ही इस प्रतीक्षा के अब, होठों पर गंगाजल रख दो।
क्योंकि मैंने तो जनमों तक, इसके पांव पखारे ही हैं।।
-कुमार पंकज
नक्षत्रों में हठयोगी-सा।
तुमने सुर्ख़ चूड़ियों वाले,
नरम हाथ से क्यों छू डाला।।
जिसकी रखवाली करते थे,
जाने कब से ढीठ अंधेरे।
उस पत्थर की मूरत पर क्यों,
आकर डाल गये जयमाला।।
अब तुमको ही सुलझानी हैं, ख़ामोशी की ख़ुश्क जटायें,
क्योंकि मैंने तो सदियों तक, इसके केश सँवारे ही हैं।।
मेरे पथरीले हाथों पर,
कब्ज़ा चोटिल रेखाओं का।
तुम कहते हो, मैं इस पहली,
उबटन का उदघाटन कर दूँ।।
तुमने अपने चिर-यौवन के,
द्वारे पर जो खींच रखी है।
तुम कहते हो, मैं उस अंधी
रेखा का उल्लंघन कर दूँ
तो मैं अवरोहण करता हूँ, झूठी नैतिकता के ध्वज का।
क्योंकि तुमने तो ये परचम, जनमो-जनम उतारे ही हैं।।
तुम जो ना इक फूल चढ़ाकर,
इस पत्थर को पावन करते।।
कैसे इस कलमुंहे जगत को,
एक देवता पूरा मिलता।।
मैं हाथों में छैनी लेकर,
खुद अपना पौरुष गढ़ता था।
तुम न आते तो जग को फिर,
मेरा बदन अधूरा मिलता।।
तुम ही इस प्रतीक्षा के अब, होठों पर गंगाजल रख दो।
क्योंकि मैंने तो जनमों तक, इसके पांव पखारे ही हैं।।
-कुमार पंकज
پہلے ہاتھ تمہارے ہی ہیں
میری وےراگي چوكھٹ پر، گھی کا دیپک دھرنے والے.
مہندی کی خوشبو میں ڈوبے، پہلے ہاتھ تمہارے ہی ہیں ..
میں صدیوں سے خاموش بیٹھا تھا،
نكشترو میں هٹھيوگي - سا.
تم نے سرخ چوڑيو والے،
نرم ہاتھ سے کیوں چھو ڈالا ..
جس کی حفاظت کرتے تھے،
جانے کب سے ڈھيٹھ اندھیرے.
اس پتھر کی مورت پر کیوں،
آ کر ڈال گئے جيمالا ..
اب تم ہی سلجھاني ہیں، خاموشی کی خشک جٹايے،
کیونکہ میں نے تو صدیوں تک، اس کیس سوارے ہی ہیں ..
میرے پتھريلے ہاتھوں پر،
قبضہ زخمی رےكھاو کا.
تم کہتے ہو، میں اس پہلی،
ابٹن کا افتتاح کر دوں ..
تم نے اپنے چر - جوانی کے،
دوارے پر جو کھینچ رکھی ہے.
تم کہتے ہو، میں اس اندھی
لائن کی خلاف ورزی کر دوں
تو میں اوروه کرتا ہوں، جھوٹی اخلاقیات کے پرچم کا.
کیونکہ تم نے تو یہ پرچم، جنمو - جنم اتارے ہی ہیں ..
تم جو نا اک پھول چڑھا کر،
اس پتھر کو پاون کرتے ..
کس طرح اس كلمهے دنیا کو،
ایک دیوتا مکمل ملتا ..
میں ہاتھوں میں چھےني لے کر،
اپنا پورش گڑھتا تھا.
تم نہ آتے تو جگ کو پھر،
میرا بدن ادھورا ملتا ..
تم ہی اس انتظار کے اب، ہونٹوں پر گنگاجل رکھ دو.
کیونکہ میں نے تو جنمو تک، اس کے پاؤں پكھارے ہی ہیں ..
- کمار پنکج

0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें