उल्लू की गजल -अमरनाथ 'मधुर'
उल्लुओं की पीठ पर लक्ष्मी के सारे सुत सवार .
ज्ञान का दीपक जलाओ वो अभी देंगें उतार .
है अँधेरा जब तलक तब तक है साजिश कामियाब
जब उजाला हो गया रहता न कोई अख्तियार .
आँख में चुभता उजाला गर बहुत चुभने भी दो
खोल भी लें आँख वो अब सो चुके सदियाँ हजार .
गैर के कितने गुनाहों का है बोझा पीठ पर
कब भला सोचा उन्होंने कर रहे अब भी बिगार.
तुम नहीं समझोगे ये, कितने हैं शातिर लोग ये
खुद लिये जाते हैं लक्ष्मी, दे उन्हें बुत और मजार .
الو کی گجل - امرناتھ 'میٹھی'
اللو کی پیٹھ پر لکشمی کے سارے ست سوار.
علم کا چراغ جلاؤ وہ ابھی دےگے اتار.
ہے اندھیرا جب تلک اس وقت تک ہے سازش كامياب
جب اجالا ہو گیا رہتا نہ کوئی اختیار.
آنکھ میں چبھتا اجالا گر بہت چبھنے بھی دو
کھول بھی لیں آنکھ وہ اب سو چکے صدیاں ہزار.
غیر کے کتنے گناہوں کا ہے بوجھا پیٹھ پر
کب بھلا سوچا انہوں نے کر رہے اب بھی بگار.
تم نہیں سمجھو گے یہ، کتنے ہیں شاطر لوگ یہ
خود کیلئے جاتے ہیں لکشمی، دے انہیں بت اور مزار.

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