गुरुवार, 22 नवंबर 2012

म्रत्यु का उत्सव


 1-            मुम्बई के शिवाजी पार्क में जहां बाल ठाकरे का अंतिम सस्कार किया  गया उनकी समाधि बनाया ना तय किया गया है।बालठाकरे की अंतिम शव यात्रा का प्रसारण भी ऐसे ही किया गया जैसे महात्मा गांधी का किया गया था .यह सब बाल ठाकरे को महात्मा गांधी के समान सम्मान देने की कौशिश है और हो सकता है की उसे राष्ट्रपिता की तर्ज पर महाराष्ट्र पिता कहा जाने लगे वैसे भी उनके भक्त उन्हें अपना भगवान मानते हैं बाकी मराठियों से वह इतना तो चाहेंगें ही  कि वे बाल ठाकरे को ऐसा मान दें। भारत के दौरे पर आने वाले विदेशी राष्ट्र प्रमुख जब दिल्ली आते हैं तो राष्ट्र पिता महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने जाते हैं। आईंदा जब वो भारत में आयेंगें और अगर वो दिल्ली के अलावा मुम्बई भी गए तो उन्हें महाराष्ट्र पिता की समाधि पर भी फूल चढाने के लिए ले जाया जायेगा. वो संकोच वश कुछ कह भले ही न पायें लेकिन सारे रास्ते इस गुत्थी को सुलझाने में ही लगे रहगें कि एक राष्ट्र में महाराष्ट्र और महाराष्ट्र पिता? कैसे हो सकते हैं ? आखिर वो ये सोच कर ही संतुष्ट होंगें कि भारत विचित्रताओं का देश है और यहाँ कुछ भी हो  सकता है.



2-    यह सवाल क्यूँ नहीं पूछा जाना चाहिए कि मृत व्यक्ति स्वतंत्रता सेनानी या सशस्त्र सुरक्षा बल का शहीद या प्रमुख संविंधानिक पदासीन था जो उसके मृत शरीर को तिरंगें में लपेटा गया ? सनद रहे वो अपने भक्तों का भगवान और विरोधियों का शैतान हो सकता है लेकिन बाकी के लिए एक बदनाम नहीं तो आम इंसान से ज्यादा कुछ नहीं था .आम इंसान ऐसे कि उसने कुछ भी ऐसा नहीं किया जिसे देश की जनता यादरख सके .अगर अभद्र भाषा में बड़बोलेपन को ख़ास काम माना जा सकता हो तो वो ख़ास है लेकिन इतने से वह राष्ट्रीय सम्मान का पात्र नहीं हो जाता है। उसे राष्ट्रीय सम्मान एक गलत परम्परा बनेगा .वह केवलअपने संगठन के झंडे का हकदार था।

                                                         
 3- महाराष्ट्र  में दो लड़कियों  को इसलिए गिरप्तार कर लिया गया कि उनहोंने बाल ठाकरे कि मौत पर मुम्बई बंद के औचित्य पर सवाल करते हुए फेस बुक पर कमेन्ट किया था .मुम्बई की शाहीन-रेनू प्रकरण पर सोशल मीडिया में हुई प्रतिक्रिया से एक बात समझ में आती है कि एक ख़ास सामाजिक समूह ने इस मौजू पर खुल कर हिस्सा लिया.किरण बेदी को एक क़ानून पसंद अफसर माना जाता है. उनकी छवि दबंग हक़ पसंद नेता की भी बनी है लेकिन एन डी टी वी पर आज की बहस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उनके विचार कुछ बहुत स्पष्ट नहीं थे .उनके इस कथन से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि अगर कोई व्यक्ति फेस बुक पर किसी के कमेन्ट को लाईक करता है या शेयर करता है तो इसका मतलब है कि वह भी यही कहता है .मुझे इस पर आपत्ति है. कई बार हमें ऐसे कमेन्ट को भी शेयर करते हैं जिससे हम पूर्णत असहमत या आंशिक सहमत होते हैं और उस पर हम चर्चा को आगे बढ़ाना चाहते हैं ताकि लोगों का नजरिया सामने आ सके .इसके अतिरिक्त क्यूंकि फेसबुक पर लाईक,  कमेन्ट और शेयर के अलावा और कोई विकल्प नहीं है इसलिए लाईक का मतलब हमेशा सहमत या पसंद नहीं होता .मेरे लिए ज्यादातर इसका अर्थ पढ़ लिया जाना है . मैंने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी  है, दोस्त हों या दुश्मन गलत फहमी बाकी नहीं रहनी चाहिए .आजकल तीसरी आँख कड़ी नजर भी रख रही है .

4-   मेरे एक मित्र ने सवाल किया है कि अगर हिन्दुस्तान कसाब शव को पाकिस्तान को सोंपता है तो क्या 
कट्टर पंथी उसके शव को शहीद की मजार बना कर आतंक वाद के लिए दूसरों को उकसाने के लिए उसका इस्तेमाल कर सकते हैं ? मेरी समझ में वे ऐसा अवश्य करेंगे। लेकिन हम पाकिस्तान की बात नकरें।अपने देश की मजारों के इतिहास को ही खंगालें. हम पायेंगें कि मजारें जहाँ पहुंचे हुए सूफी संतों और शायरों की हैं वहीं उन कुख्यात हमलावरों की भी हैं जिन्होंने महमूद गजनवी ,मोहम्मद गोरी या बाबर के सेनापति के रूप में हिन्दुस्तानियों को लूटा और क़त्ल किया .आज सभी धर्मों के लोग उनकी दरगाह परजाते  हैं और अपने लिए दुआ माँगते हैं . पता नहीं ये आतंकी को भय से शीश झुकाने की परम्परा है या उन आतंकियों के जीवन के अंतिम वर्षों में संत बन जाने को नमन है. दोनों हो सकते हैं ,कहीं कुछ तो कहीं कुछ. लेकिन इतना तय है कि जनता को उनकी हकीकत मालूम नहीं है।परम्परा का निर्वाह समझ बूझ कर किया जाए और उसके औचित्य को समालोचना के दायरें में लाया जाए तो सही होगा. लेकिन आस्था ऐसा करने कब देती है ?

5-    आज के वक्त में चोर के हाथ काट लेना, बद नजर रखने वाले की आँख निकाल लेना ,बदचलन को पत्थर बरसाकर कर मार देना कानूनन सही नहीं माना जाता है और न किसी आधुनिक लोकतांत्रिक देश में ये सजाएं दी जाती हैं .एक वक्त था जब ऐसी सजा दी जाती थी और उस पर कोई सवाल भी नहीं उठाता था.राम ने शूर्पनखा के नाक कान की सजा दी और आज भी राम राज्य को आदर्श माना जाता है लेकिन आजकोई किसी को ऐसी सजा दिया जाना शायद ही पसंद करेग. तालिबानी पत्थर बरसा कर मारने की सजा देते हैं, जिसके खिलाफ सारी दुनियाँ के लोग हैं. इसी प्रकार सभ्य देशों में फांसी की सजा को अच्छा नहीं माना जाता और उसे समाप्त कर दिया गया है। असल में फाँसी के बाद तो अपराधी एक झटकें में ही सारे अपराध भाव सेपरे हो जाता है बात तो तब है जब वह तिल तिल कर अपने गुनाह की आग में जले .और ये तभी हो सकता हैजब वह जिन्दा रहे .इसीलिए मेरी समझ में जघन्य अपराधों के लिए बा मशक्कत उम्र कैद की सजा दी जानीचाहिए .उम्र कैद का मतलब उम्र कैद है चौदह बरस का कारावास नहीं .

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