सरकार का जब कोई बस नहीं चलता है तो वह साजिशों पर उतर आती है. विपक्ष और मीडिया भी उसकी राह चल पड़ते हैं .हाल के ही कुछ उदहारण देखें . जब अन्ना आन्दोलन उभार पर था तो कोल घोटाला निकल आया. जब कोल घोटाला तूल पकड़ा तो केजरीवाल का आन्दोलन हवा पा गया, जब वह जोर पकड़ा तो ऍफ़ डी आई आ गया. जब ऍफ़ डी आई के खिलाफ मोर्चा बाँधा गया तो आरक्षण का भूत निकल आया जब उसका आकार बड़ा होने लगा तो दिल्ली गेंगरेप ने सारे मुद्दों को हवा में उडा दिया और दिल्ली राजनीतिक रूप से राहत की सांस लेने लगी. लेकिन दिल्ली की की फिंजा इस सर्दी के मोसम में भी इतनी गर्म है कि गैंग रेप के खिलाफ आन्दोलन कारियों ने वह एकजुटता दिखाई कि सरकार के कर्ता धर्ताओं को पसीने छूट रहें हैं.
इससे मुक्ति कि जब कोई राह नहीं दिखाई दी तो भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच फिक्स करा दिया गया है. जैसा कि हम सब जानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच खेल खेल नहीं रहता है वह उन्मत्त अंधराष्ट्रवाद का शिकार होता है. भारत और पाकिस्तान के लोग सब कुछ भूलकर एक दूसरे की जीत हार के गुणा भाग में जुट जाते हैं. अब भी यही होगा . आन्दोलन कारी युवा प्रदर्शन के मोर्चे से पलायन कर घरों में टी वी के सामने चिपक जायेंगें और उनके दिलों दिमाग में जो आक्रोश है उसकी दिशा बदल जायेगी. मार्क्स ने कहा था धर्म जनता के लिए अफीम है लेकिन लगता है भारतीयों के लिए क्रकेट भी अफीम है. उसके नशें में उन्हें कुछ भी ध्यान नहीं रहता है .
मुझे याद है जब संसद पर आतंक वादी हमला हुआ था तो बाद में उसकी फुटेज टी वी पर प्रसारित कि जा रहीं थी उसी समय क्रिकेट मैच भी चल रहा था तो नौजवान संसद पर आतंकवादी हमले की तस्वीरे देखने के बजाय टी वी पर क्रिकेट मैच देखने को तरजीह दे रहे थे जबकि क्रिकेट में हारने जीतने से देश के भविष्य पर कोई असर पड़ने वाला नहीं था. संसद हमारे राष्ट्र कि संप्रभुता की प्रतीक है .उसकी प्रतिष्ठा पर कोई आंच आती है तो हमारी संप्रभुता को चोट लगती है.इसीलिए हम क्षुब्ध होते हैं कि हमारे माननीय सांसद संसद की गरिमा का ध्यान नहीं रखते हैं .लेकिन जिस युवा पीढ़ी से बदलाव की उम्मीद जगती है वो अगर क्रिकेट के नशे के गिरप्त में पड़ जाती है तो यह दुर्भाग्य पूर्ण होगा.
मैं भी खूब क्रिकेट खेल हूँ लेकिन मुझे इससे बेकार का खेल कोई दूसरा नहीं लगता है . क्रिकेट मैच देखना तो मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है . यह खेल सबसे ज्यादा समय बर्बाद करने वाला है और आर्थिक रूप से भी जनता के लिए महंगा है. हमारे देशवासियों को फ़ुटबाल जैसा खेल खेलना चाहिए जो सस्ता है,वक्त की बचत भी करता है. लेकिन सरकार और प्रायोजक ऐसे खेलों को क्यूँ बढ़ावा देंगें जिससे जल्द मुक्त होकर जनता अपने जरूरी काम धंधें देखने लगे.
حکومت کا جب کوئی بس نہیں چلتا ہے تو وہ ساجشو پر اتر آتی ہے. اپوزیشن اور میڈیا بھی اس کی راہ چل پڑتے ہیں. حال کے ہی کچھ ادهار دیکھیں. جب انا تحریک ابھار پر تھا تو کول گھوٹالہ نکل آیا. جب کول گھوٹالہ طول پکڑا تو كےجريوال کا احتجاج ہوا پا گیا، جب وہ زور پکڑا تو ف ڈی آئی آ گیا. جب ف ڈی آئی کے خلاف مورچہ بادھا گیا تو ریزرویشن کا بھوت نکل آیا جب اس کا سائز بڑا ہونے لگا تو دہلی گےگرےپ نے تمام مسائل کو ہوا میں اڑا دیا اور دہلی سیاسی طور پر راحت کی سانس لینے لگی. لیکن دہلی کی کی پھجا اس سردی کے موسم میں بھی اتنی گرم ہے کہ گینگ ریپ کے خلاف تحریک كاريو نے وہ اتحاد دکھائی کہ حکومت کے کرتا دھرتاو کو پسینے چھوٹ رہے ہیں. اس سے نجات کہ جب کوئی راہ نہیں دکھائی دی تو بھارت اور پاکستان کے درمیان کرکٹ میچ فکس کرا دیا گیا ہے. جیسا کہ ہم سب جانتے ہیں کہ بھارت اور پاکستان کے درمیان کھیل کھیل نہیں رہتا ہے وہ انمتت ادھراشٹرواد کا شکار ہوتا ہے. بھارت اور پاکستان کے لوگ سب کچھ بھول کر ایک دوسرے کی ہار جیت کے گنا حصہ میں لگ جاتے ہیں. اب بھی یہی ہوگا. تحریک قاری نوجوان کارکردگی کے محاذ سے نقل مکانی کر گھروں میں ٹی وی کے سامنے چپک جايےگے اور ان کے دلوں دماغ میں جو غصہ ہے اس کی سمت بدل جائے گی. مارکس نے کہا تھا مذہب عوام کے لئے افیون ہے لیکن لگتا ہے ہندوستانیوں کے لئے كركےٹ بھی افیون ہے. اس کے نشے میں انہیں کچھ بھی یاد نہیں رہتا ہے. مجھے یاد ہے جب پارلیمنٹ پر دہشت وادی حملہ ہوا تھا تو بعد میں اس کی فوٹیج ٹی وی پر نشر کی کہ جا رہی تھی اسی وقت کرکٹ میچ بھی چل رہا تھا تو نوجوان پارلیمنٹ پر دہشت گردانہ حملے کی تسويرے دیکھنے کے بجائے ٹی وی پر کرکٹ میچ دیکھنے کو ترجیح دے رہے تھے جب کہ کرکٹ میں ہارنے جیتنے سے ملک کے مستقبل پر کوئی اثر پڑنے والا نہیں تھا. پارلیمنٹ ہمارے ملک کہ خود مختاری کی علامت ہے. اس کی عزت پر کوئی آنچ آتی ہے تو ہماری خود مختاری کو چوٹ لگتی ہے. اس لئے ہم كشبدھ ہوتے ہیں کہ ہمارے ماننيي رکن پارلیمنٹ کی وقار کا خیال نہیں رکھتے ہیں. لیکن جس نوجوان نسل سے تبدیلی کی امید جگتي ہے وہ اگر کرکٹ کے نشے کے گرپت میں پڑ جاتی ہے تو یہ بدقسمتی مکمل ہوگا. میں بھی خوب کرکٹ کھیل ہوں لیکن مجھے اس سے بیکار کا کھیل کوئی دوسرا نہیں لگتا ہے. کرکٹ میچ دیکھنا تو حماقت کے سوا کچھ نہیں ہے. یہ کھیل سب سے زیادہ وقت ضائع کرنے والا ہے اور اقتصادی طور پر بھی عوام کے لئے مہنگا ہے. ہمارے ملک کے باشندوں کو فٹبال جیسا کھیل کھیلنا چاہئے جو سستا ہے، وقت کی بچت بھی کرتا ہے. لیکن حکومت اور اسپانسر ایسے کھیل کو کیوں فروغ دےگے جس سے جلد آزاد ہو کر عوام اپنے ضروری کام دھدھے دیکھنے لگے.

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