आज बक्र-ईद है | हंसी ख़ुशी का माहौल है | कई दिनों से कई जगह कुर्बान किये जाने वाले पशुओं का बाजार लगा है | पशु दुल्हे की तरह सजे धजे थे | लेकिन ख़ास बात ये देखने में आयी कि हजारों पशुओं में एक भी पशु, जिसमें बाल पशु भी थे, न रंभाता था ना मिमियाता था | वे आपस में सींग भी नहीं लड़ाते थे न एक दुसरे को प्यार से चाटते थे |उनकी आँखों में एक गहरी उदासी थी, दहशत थी | पशुओं ने जरुर अपनी मौन भाषा में आपस में कह सुन लिया होगा कि आज जिंदगी का आखिरी दिन है | ये कैसा ख़ुशी का दिन है जिसमें बेवजह बेजुबान जानवरों को बेदर्दी से मारा जा रहा है | लेकिन जब जानवर कोई इन्सान को मारे .......| ये कैसा धर्म है ? ये धर्म है तो अधर्म क्या है ? अरे ओ धर्म धुरंधरों! अरे ओ अल्लाह के बन्दों! रहम करो | ये कायनात अल्लाह की सारी नेमतों के रहने पर ही रह सकती है| इनके बगैर ये जमीन इन्सान के रहने लायक न रहेगी | अपने स्वाद के लिये बेजुबान को मारना किसी बड़े गुनाह से कम नहीं है | अगर खुदा है तो इस गुनाह के लिये तुम्हें वो जरुर सजा देगा | अगर तुम्हें सजा नहीं मिलती है तो कोई खुदा नहीं है जिसकी इबादत की जाये | क्यों न ऐसी इबादत, ऐसे दीन धर्म से तौबा कर लें या उसके असली रूप पर अमल करें जो मौहब्बत और अमन का पैगाम देता है | दीन हीन की मदद करने को कहता है | पडोसी के दुःख दर्द में हाथ बंटाता है |
पिछले वर्ष की घटना है . सदर बाजार मेरठ में जगदीशपुरम में मंदिर के पास कुरबानी के लिए दो ऊंट लाये गए | एक ऊंट की कुर्बानी दे दी गयी लेकिन दूसरा जान बचाकर भाग निकला | उसके रास्तें में जो आया वो हडबडा कर भागने लगा. सड़क पर बाजार में एक हड़कंप मच गया. रिक्शे टकरा गए ,ठेले उलट गए कई लोगों को चोटें आयीं| अखबार की खबरका शीर्षक है 'कुर्बानी के लिए लाये गए ऊंट का उत्पात' | अब ऊंट भला क्या उत्पात कर रहा है | आदमी उसकी जान ले रहा है और वह जानबचाकर भाग रहा है | क्या उसे ज़िंदा रहने का अधिकार नहीं है ? उत्पात तो वो कर रहे हैं जो उसकी जान के दुश्मन हैं | ये इन्सान नहीं शैतान हैं इनकी ऐसी कुर्बानी अजाब है, गुनाह है | सही बात तो यह है कि बन्दर और नीलगाय जैसे कुछ पशुओं के अलावा बाकी सारे पशु धीरे धीरे लुप्तप्राय प्राणियों की श्रेणी में आ गए हैं इनके सरंक्षण की आवश्यकता है और जो इनकी हत्या करते हैं वो गुनाहगार हैं उन्हें क़ानून के हिसाब से सजा मिलनी चाहिए |धार्मिक परम्पराओं के नाम पर किसी को अपराध कि छुट नहीं मिलनी चाहिए .
آج بکر - عید ہے | ہنسی خوشی کا ماحول ہے | کئی دنوں سے کئی جگہ قربان کئے جانے والے جانوروں کا بازار لگا ہے | جانوروں دولھے کی طرح سجے دھجے تھے | لیکن خاص بات یہ دیکھنے میں آئی کہ ہزاروں جانوروں میں ایک بھی جانور، جس میں بال جانور بھی تھے، نہ ربھاتا تھا نا ممياتا تھا | وہ آپس میں سینگ بھی نہیں لڑاتے تھے نہ ایک دوسرے کو پیار سے چاٹتے تھے | ان کی آنکھوں میں ایک گہری اداسی تھی، دہشت تھی | جانوروں نے ضرور اپنی خاموش زبان میں آپس میں کہہ سن لیا ہو گا کہ آج زندگی کا آخری دن ہے | یہ کیسی خوشی کا دن ہے جس میں بے وجہ بےجبان جانوروں کو بےدردي سے مارا جا رہا ہے | لیکن جب جانور کوئی انسان کو ہلاک ....... | یہ کیسا مذہب ہے؟ یہ مذہب ہے تو بے دینی کیا ہے؟ ارے او مذہب جانبازوں! ارے او اللہ کے بندوں!رحم کرو | یہ کائنات اللہ کی ساری نعمتوں کے رہنے پر ہی رہ سکتی ہے | ان کے بغیر یہ زمین انسان کے رہنے کے قابل نہ رہے گی | اپنے ذائقہ کے لئے بےجبان کو مارنا کسی بڑے گناہ سے کم نہیں ہے | اگر خدا ہے تو اس گناہ کے لیے تمہیں وہ ضرور سزا دے گا | اگر تمہیں سزا نہیں ملتی ہے تو کوئی خدا نہیں ہے جس کی عبادت کی جائے | کیوں نہ ایسی عبادت، ایسے دین مذہب سے توبہ کر لیں یا اس کے اصلی روپ پر عمل کریں جو موهببت اور امن کا پیغام دیتا ہے | دین احساس کی مدد کرنے کو کہتا ہے | پڑوسی کے دکھ درد میں ہاتھ بٹاتا ہے |
پچھلے سال کی واقعہ ہے. صدر بازار میرٹھ میں جگديشپرم میں مندر کے پاس كرباني کے لئے دو اونٹ لائے گئے | ایک اونٹ کی قربانی دے دی گئی لیکن دوسری جان بچا کر بھاگ نکلا | اس راستیں میں جو آیا وہ هڈبڈا کر بھاگنے لگا. سڑک پر بازار میں ایک هڑكپ مچ گیا. رکشے ٹکرا گئے، ٹھیلے الٹ گئے کئی لوگوں کو چوٹیں آئیں | اخبار کی كھبركا عنوان ہے 'قربانی کے لئے لائے گئے اونٹ کا فساد' | اب اونٹ بھلا کیا فساد کر رہا ہے | آدمی اس کی جان لے رہا ہے اور وہ جان بچا کر بھاگ رہا ہے | کیا اسے زندہ رہنے کا حق نہیں ہے؟ فساد تو وہ کر رہے ہیں جو اس کی جان کے دشمن ہیں | یہ انسان نہیں شیطان ہیں ان کی ایسی قربانی اجاب ہے، گناہ ہے | صحیح بات تو یہ ہے کہ بندر اور نيلگاي جیسے کچھ جانوروں کے علاوہ باقی تمام جانوروں دھیرے دھیرے لپتپراي جانوروں کے زمرے میں آ گئے ہیں ان سركش کی ضرورت ہے اور جو ان کی قتل کرتے ہیں وہ گناہ گار ہیں انہیں قانون کے مطابق سزا ملنی چاہئے | مذہبی پرمپراو کے نام پر کسی کو جرم کہ چھٹ نہیں ملنی چاہئے.
1-कुमार पंकज - क्या कहूँ .............मार्क्स ने सही कहा था.......
2-बी. एल. 'पारस' -पशुओँ के साथ नैतिकता की भी बलि समझो ।। 3-अमित कुमार मिश्र - इंसान तो अब है ही नहीं .
4-बी. एल. 'पारस' -ताउम्र भार ढोता रहा पशु, बिन कहे सब सहता रहा पशु । झुका बदन,कांपते पैर,मजबूर आंखेँ, जिँदा होकर भी बेजान समझा जाता है पशु ।
5-मनीष कुमार -आहत दिल पर होते अघात को किसने देखा है हमने तो धर्म के नाम पर मुल्क को टूटते देखा है धार पर जान रख लोग करते है जाने कितनी रस्मे हमने बिन रस्मो के आदम को बलि पर चढ़ते देखा है --इश्मन --
6-बी. एल. 'पारस'- देवताओँ को खुश करने की खातिर, बलि चढा दिया जाता है पशु । मरने के बाद फेँक दी लाश सङक पर, क्योँ आज इंसान भी बन गया है पशु ।
7-राहुल प्रजापति - अमरनाथ जी सही कहा आपने पर आप बकराईद मनाने वालो के लिए इंसान और धर्म जैसे पवित्र शब्दो का इस्तेमाल मत करो | सतयुग मे देव, असुर, मानव, किन्नर, दानव आदि जातिया होती थी, आज कलियुग मे भी है...बस फर्क इतना है कि सब के सब अपने आप को इंसान बता रहे है | मांस खाने वाले असुर है...हिंदुत्व की रक्षा करने वाले देव |धर्म रक्षको की सहायता से जीने वाले मानव,आतंकवादी दानव है |किन्नर तो आप सब जानते ही हो.....सेकूलर | कल किस जाति का त्योहार है....सब समझ सकते है |और इन असुरो का विनाश हर युग मे निश्चित है |
8-शैल त्यागी बेज़ार - यही इन सब तथाकथित धर्मों का असली रूप है .
10-मनीष कुमार - 'अखबार की खबर है कुर्बानी के लिए लाये गए ऊंट का उत्पात | अब ऊंट भला क्या उत्पात कर रहा है | आदमी उसकी जान ले रहा है और वह जान बचाकर भाग रहा है '|........ यह खूब रहा ....
9-शैल त्यागी बेज़ार - राहुल जी मगर ये पोस्ट किसी धर्म विशेष को लक्षित नहीं करती और जहाँ तक मानस का सवाल है तो फिर अधिकाँश हिन्दू भी इसी श्रेणी में आते हैं
11-राहुल प्रजापति - तो मैने कब कहा कि हिंदुओ मे असुर प्रकृति के लोग नही है....?
12-बी. एल. 'पारस' -मैँ तो पशु बलि का विरोधी हूँ फिर चाहे ये घृणित काम कोई मुस्लिम करे या हिन्दू ।।
13-शैल त्यागी बेज़ार - माफ़ी चाहता हूँ राहुल जी लेकिन मुझे आपके कमेन्ट से ऐसा लगा था इसलिए कहा मैंने , आशा है आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे.
14-राहुल प्रजापति - @ साहिल जी अगर कोई हिंदुत्व के लिए कुछ बोल भी दे क्या ये गलत है ?
15-शैल त्यागी बेज़ार - राहुल जी सही और ग़लत कदाचित तर्क और संवेदना के आधार पर ही निर्धारित किया जा सकता है फिर चाहे वह किसी भी जाती या धर्म से संबंद्धित हो .
17-अमरनाथ मधुर - माँसाहार पर चिंतन धर्म के दायरे में न किया जाये. माँसाहार न अपने में सही है और न गलत है.कहा गया है जीव जीवस्य भोजनम. किसी पशु क्या मुझे किसी पेड़ पौधे के काटे जाने में भी आपत्ति है. लेकिन जरुरत के मुताबिक़ दुसरे के अस्तित्व कि रक्षा करते हुए कैसे जीवन यापन किया जाये ये विचारणीय है ?
18-राहुल प्रजापति - मनुष्यो मे भगवान ने सबसे ज्यादा समझ और भावनाए दी है..|जीव जीवस्य भोजनम को हम अपने संदर्भ मे ले ही....क्या यह जरूरी है ?
19कॉम्प बिरोहर - काश ये सब ख्याल दंगों के वक़्त भी आये ........... काश इन पशुओं के बारे में भी कुछ सोचा जाये .....
जवाब देंहटाएं1-कुमार पंकज - क्या कहूँ .............मार्क्स ने सही कहा था.......
2-बी. एल. 'पारस' -पशुओँ के साथ नैतिकता की भी बलि समझो ।।
3-अमित कुमार मिश्र - इंसान तो अब है ही नहीं .
4-बी. एल. 'पारस' -ताउम्र भार ढोता रहा पशु,
बिन कहे सब सहता रहा पशु ।
झुका बदन,कांपते पैर,मजबूर आंखेँ,
जिँदा होकर भी बेजान समझा जाता है पशु ।
5-मनीष कुमार -आहत दिल पर होते अघात को किसने देखा है
हमने तो धर्म के नाम पर मुल्क को टूटते देखा है
धार पर जान रख लोग करते है जाने कितनी रस्मे
हमने बिन रस्मो के आदम को बलि पर चढ़ते देखा है
--इश्मन --
6-बी. एल. 'पारस'- देवताओँ को खुश करने की खातिर,
बलि चढा दिया जाता है पशु ।
मरने के बाद फेँक दी लाश सङक पर,
क्योँ आज इंसान भी बन गया है पशु ।
7-राहुल प्रजापति - अमरनाथ जी सही कहा आपने पर आप बकराईद मनाने वालो के लिए इंसान और धर्म जैसे पवित्र शब्दो का इस्तेमाल मत करो |
सतयुग मे देव, असुर, मानव, किन्नर, दानव आदि जातिया होती थी, आज कलियुग मे भी है...बस फर्क इतना है कि सब के सब अपने आप को इंसान बता रहे है |
मांस खाने वाले असुर है...हिंदुत्व की रक्षा करने वाले देव |धर्म रक्षको की सहायता से जीने वाले मानव,आतंकवादी दानव है |किन्नर तो आप सब जानते ही हो.....सेकूलर |
कल किस जाति का त्योहार है....सब समझ सकते है |और इन असुरो का विनाश हर युग मे निश्चित है |
8-शैल त्यागी बेज़ार - यही इन सब तथाकथित धर्मों का असली रूप है .
10-मनीष कुमार - 'अखबार की खबर है कुर्बानी के लिए लाये गए ऊंट का उत्पात | अब ऊंट भला क्या उत्पात कर रहा है | आदमी उसकी जान ले रहा है और वह जान बचाकर भाग रहा है '|........ यह खूब रहा ....
9-शैल त्यागी बेज़ार - राहुल जी मगर ये पोस्ट किसी धर्म विशेष को लक्षित नहीं करती और जहाँ तक मानस का सवाल है तो फिर अधिकाँश हिन्दू भी इसी श्रेणी में आते हैं
11-राहुल प्रजापति - तो मैने कब कहा कि हिंदुओ मे असुर प्रकृति के लोग नही है....?
12-बी. एल. 'पारस' -मैँ तो पशु बलि का विरोधी हूँ फिर चाहे ये घृणित काम कोई मुस्लिम करे या हिन्दू ।।
13-शैल त्यागी बेज़ार - माफ़ी चाहता हूँ राहुल जी लेकिन मुझे आपके कमेन्ट से ऐसा लगा था इसलिए कहा मैंने , आशा है आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे.
14-राहुल प्रजापति - @ साहिल जी अगर कोई हिंदुत्व के लिए कुछ बोल भी दे क्या ये गलत है ?
15-शैल त्यागी बेज़ार - राहुल जी सही और ग़लत कदाचित तर्क और संवेदना के आधार पर ही निर्धारित किया जा सकता है फिर चाहे वह किसी भी जाती या धर्म से संबंद्धित हो .
17-अमरनाथ मधुर - माँसाहार पर चिंतन धर्म के दायरे में न किया जाये. माँसाहार न अपने में सही है और न गलत है.कहा गया है जीव जीवस्य भोजनम. किसी पशु क्या मुझे किसी पेड़ पौधे के काटे जाने में भी आपत्ति है. लेकिन जरुरत के मुताबिक़ दुसरे के अस्तित्व कि रक्षा करते हुए कैसे जीवन यापन किया जाये ये विचारणीय है ?
18-राहुल प्रजापति - मनुष्यो मे भगवान ने सबसे ज्यादा समझ और भावनाए दी है..|जीव जीवस्य भोजनम को हम अपने संदर्भ मे ले ही....क्या यह जरूरी है ?
19कॉम्प बिरोहर - काश ये सब ख्याल दंगों के वक़्त भी आये ........... काश इन पशुओं के बारे में भी कुछ सोचा जाये .....