मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

सौगंध राम की खाते हैं ...


                   हमारे देश में राम कथा को जन जन तक पहुंचाने का काम राम लीला मंडलियों ने ही किया है भले तुलसी ने जन भाषा अवधी में राम चरित मानस लिखा हो लेकिन अधिकांश लोग उसे पढ़ नहीं पाते हैं.स्वयं मैं भी अनेक प्रयास करने पर भी उसे कभी एक साथ पूरा नहीं पढ़ सका . सही बात तो यह है कि  राम कथा की मेरी जानकारी बचपन में देखी गयी राम लीलाओं से ही है. लेकिन दशहरे पर रावण दहन के साथ ही राम लीला ख़त्म हो जाती है. क्या ये सही है ? राम लीला तो राम के सरयू में जल समाधि लेने पर ख़त्म होती है .फिर लंका विजय के बाद का मंचन क्यूँ नहीं होता है ? क्या यह राम के परवर्ती जीवन चरित्र को जनता से छुपाये रखने की साजिश नहीं है ? अगर पूरा जीवन चरित्र दिखाया जाए तो सब लोग जान जायें कि राम इतना मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं है जितना उसे बताया जाता है.उसका व्यवहार अपनी पत्नी और बच्चों के प्रति आदर्श तो क्या सामान्य भी नहीं रहा. उसके परिवार के सदस्यों और स्वयं उसकी मृत्यु भी स्वाभाविक नहीं थी. क्या जनता को आदर्श राम के आदर्श [?] जीवन को पूरा जानने समझाने का अवसर नहीं दिया जाना चाहिए ? ऐसा न होने देने में किसका हित है ?

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سوگدھ رام کی کھاتے ہیں ......ہمارے ملک میں رام کتھا کو عوامی عوام تک پہنچانے کا کام رام لیلا مڈليو نے ہی کیا ہے بھلے تلسی نے عوامی زبان مدت میں رام چرت مانس لکھا ہو لیکن زیادہ تر لوگ اسے پڑھ نہیں پاتے ہیں. خود میں بھی کئی کوشش کرنے پر بھی اسے کبھی ایک ساتھ مکمل نہیں پڑھ سکا. صحیح بات تو یہ ہے کی رام کتھا کی میری معلومات بچپن میں دیکھی گئی رام ليلاو سے ہی ہے. لیکن دشهرے پر راون دہن کے ساتھ ہی رام لیلا ختم ہو جاتی ہے. کیا یہ صحیح ہے؟ رام لیلا تو رام کے سريو میں جل سمادھ لینے پر ختم ہوتی ہے. پھر لنکا فتح کے بعد کا مچن کیوں نہیں ہوتا ہے؟ کیا یہ رام کے پرورتي زندگی کردار کو عوام سے چھپائے رکھنے کی سازش نہیں ہے؟ اگر مکمل زندگی کردار دکھایا جائے تو سب لوگ جان جائیں رام اتنا مریادا پرشوتم نہیں ہے جتنا اسے بتایا جاتا ہے. اس کا سلوک اپنی بیوی اور بچوں کے لئے مثالی تو کیا عام بھی نہیں رہا. اس پرواركے ارکان اور خود اس کی موت بھی قدرتی نہیں تھی. کیا عوام کو مثالی رام کے آدرش [؟] زندگی کو مکمل جاننے سمجھانے کا موقع نہیں دیا جانا چاہئے؟ ایسا نہ ہونے دینے میں کس کا حق ہے؟




1 टिप्पणी:

  1. 1-शैल त्यागी बेज़ार - बिलकुल, चीज़ों को तर्क और संवेदना के आधार पर देखा जाना चाहिए न कि आस्था और भावनाओं के आधार पर .
    2-वीरेंदर नाथ - केवल रामायण को अगर ठीक से पढ़ लो तो एक हजार साल गाली देने की भरपूर सामग्री है ,लेकिन थोड़ा कष्ट करना पडेगा और पढ़ना पडेगा.

    3-व्हव बागी- अफ़सोस इसी बात का कि सच्चाई से ये मक्कार पुरोहित अपना मुहं छुपाते है, अगर सच बताया तो बागी जैसे लाखों पैदा हो जाएंगे.

    4-अतुल के मेहता -जितना दिखाया जाता है , अगर उसी को समझ लोगे , तो सारे पाप कट जायेंगे ... :)

    5-व्हव बागी - जिस दिन, इस भारत की जनता बीमार मानसिकता से बाहर आ जाएगी, उस दिन इस हिंदू धर्म का नाम-लेवा कोई नहीं होगा.

    6-आशीष दीक्षित - राम को तो उल्टा मत कहो .

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