सन्दर्भ भिन्न सही पर आज इन्कलाबी कवि अवतार सिंह पाश बहुत याद आये -
मैंने उम्र भर उसके खिलाफ सोचा और लिखा है
अगर उसके शोक में सारा देश शामिल है
तो इस देश से मेरा नाम काट दें.
मैंने उम्र भर उसके खिलाफ सोचा और लिखा है
अगर उसके शोक में सारा देश शामिल है
तो इस देश से मेरा नाम काट दें.
बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे!!
कैसे फासिस्टी प्रभुओं की-
गला रहा है दाल ठाकरे !
अबे सम्हल जा , वो आ पहुंचा बाल ठाकरे!
सबने हां की,कौन ना करे!
छिप जा, मत तू उधर ताक रे!
शिवसेना की वर्दी डाटे जमा रहा लय-ताल ठाकरे!
सभी डर गये, बजा रहा है गाल ठाकरे!
अपने भक्तों को कर देगा अब तो मालामाल ठाकरे!
गूंज रही सह्याद्रि घाटिया, मचा रहा भूचाल ठाकरे!
मन ही मन कहते राजा जी, जिए भला सौ साल ठाकरे!
चुप है कवि,डरता है शायद खींच नहीं ले खाल ठाकरे!
कौन नहीं फंसता है, देखे, बिछा चुका है जाल ठाकरे!
बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे!
बर्बरता के ढाल ठाकरे !
प्रजातंत्र के काल ठाकरे !
धन पिसाच के इंगित पाकर ऊंचा करता भाल ठाकरे !
चला पूछने मोसोलिनी से अपने दिल का हाल ठाकरे !
गला रहा है दाल ठाकरे !
अबे सम्हल जा , वो आ पहुंचा बाल ठाकरे!
सबने हां की,कौन ना करे!
छिप जा, मत तू उधर ताक रे!
शिवसेना की वर्दी डाटे जमा रहा लय-ताल ठाकरे!
सभी डर गये, बजा रहा है गाल ठाकरे!
अपने भक्तों को कर देगा अब तो मालामाल ठाकरे!
गूंज रही सह्याद्रि घाटिया, मचा रहा भूचाल ठाकरे!
मन ही मन कहते राजा जी, जिए भला सौ साल ठाकरे!
चुप है कवि,डरता है शायद खींच नहीं ले खाल ठाकरे!
कौन नहीं फंसता है, देखे, बिछा चुका है जाल ठाकरे!
बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे!
बर्बरता के ढाल ठाकरे !
प्रजातंत्र के काल ठाकरे !
धन पिसाच के इंगित पाकर ऊंचा करता भाल ठाकरे !
चला पूछने मोसोलिनी से अपने दिल का हाल ठाकरे !
बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे!
बाल ठाकरे की मौत पर आ रहीं कुछ प्रतिक्रियाओं को देखकर अचानक सा'दत हसन मंटो का ये कौल याद आ गया, आप लोग भी पढ़िए-
''मैं ऐसी दुनिया पर, ऐसे मुहज़्ज़ब मुल्क पर, ऐसे मुहज्जब समाज पर हज़ार लानत भेजता हूं जहां यह उसूल मुरव्वज हो कि मरने के बाद हर शख्स का किरदार और तखख़्खुस लांडरी में भेज दिया जाए, जहां से वह धुल-धुलाकर आए औ
र रहमतुल्लाह अलैह की खूंटी पर लटका दिया जाए। मेरे इसलाहखाने में कोई शाना नहीं, कोई शैम्पू नहीं, कोई घूंघर पैदा करने वाली मशीन नहीं। मैं बनाव-सिंगार करना नहीं जानता। इस किताब (गंजे फरिश्ते) में जो फरिश्ता भी आया है, उसका मुंडन हुआ है और यह रस्म मैंने बड़े सलीके से अदा की है।''
- मंटो (गंजे फरिश्ते)
- मंटो (गंजे फरिश्ते)
सांप मरता हुआ भी जहर फेंकता है,लेकिन मौत को नहीं डस सकता मौत ही उसे खा जाती है . अब एक बड़ा नाग मर गया।बहुत फुंकारता था। अपने आप मर गया किसी ने नहीं मारा लेकिन सारे नागवंशी फुंकार रहें हैं .बिलकुल पगला गए हैं जो मिलता है उस पर झपट रहें हैं. एक बार दो साँप सड़क पर मस्ती कर रहे थे एक ट्रक एक सांप को कुचल कर चला गया .दूसरे साँप ने क्रुद्ध होकर ऐसा आतंक मचाया कि रास्ता रुक गया .दोनों तरफ गाड़ियों की लम्बी कतार लग गयी बड़ी देर तक रास्ता बंद रखने के बाद साँप वहाँ से गया तब यातायात शुरू हुआ .समझदार आदमी को चाहिए साँपों से सावधान रहे .वैसे साँप अकारण किसी को काटते नहीं हैं लेकिन इन साँपों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है. इसलिए इनसे दूर रहो और इन्हें अपने नजदीक भी न आने दो .
बाल ठाकरे जैसी शिष्ट भाषा बोलता था उसे वैसी ही भाषा में याद किया जाए तो कुछ अनुचित न होगा .उस बदनाम दुरात्मा मराठा अमानुष की मौत पर दुखी होना भिंडरवाले या वीरप्पन के मरने पर दुखी होने जैसा है .
बाल ठाकरे का मताधिकार दिसम्बर 11, 1999 से पांच वर्ष के लिए छीन लिया गया था। एक चुनाव में समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने का सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दोषी पाए जाने के कारण यह कदम उठाया गया था। तत्कालीन राष्ट्रपति नारायणन ने चुनाव आयोग से सजा की मात्रा तय करने के लिए कहा था।
बाल ठाकरे के कुछ 'अनमोल' वचन हैं -
बिहारी- एक बिहारी सौ बीमारी
मुसलमान - कैंसर की बीमारी
दलित - महारों ने सारी नौकरियां छीन ली
दक्षिण भारतीय - लुंगी हटाओ, पुंगी बजाओ
डॉ अम्बेडकर - अम्बेडकर के सारे पुतले गिरा दो।
बिहारी- एक बिहारी सौ बीमारी
मुसलमान - कैंसर की बीमारी
दलित - महारों ने सारी नौकरियां छीन ली
दक्षिण भारतीय - लुंगी हटाओ, पुंगी बजाओ
डॉ अम्बेडकर - अम्बेडकर के सारे पुतले गिरा दो।
सावधान घर से बाहर न निकलें, आज सरकार शोकाकुल है वो आपकी हिफाजत नहीं कर सकती है .
बाल ठाकरे की मौत पर आ रहीं कुछ प्रतिक्रियाओं को देखकर अचानक सा'दत हसन मंटो का ये कौल याद आ गया, आप लोग भी पढ़िए-''मैं ऐसी दुनिया पर, ऐसे मुहज़्ज़ब मुल्क पर, ऐसे मुहज्जब समाज पर हज़ार लानत भेजता हूं जहां यह उसूल मुरव्वज हो कि मरने के बाद हर शख्स का किरदार और तखख़्खुस लांडरी में भेज दिया जाए, जहां से वह धुल-धुलाकर आए और रहमतुल्लाह अलैह की खूंटी पर लटका दिया जाए। मेरे इसलाहखाने में कोई शाना नहीं, कोई शैम्पू नहीं, कोई घूंघर पैदा करने वाली मशीन नहीं। मैं बनाव-सिंगार करना नहीं जानता। इस किताब (गंजे फरिश्ते) में जो फरिश्ता भी आया है, उसका मुंडन हुआ है और यह रस्म मैंने बड़े सलीके से अदा की है।''
- मंटो (गंजे फरिश्ते)



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