मंगलवार, 20 नवंबर 2012

गजल - हिटलरी गुमान का आज अंत हो गया -अमरनाथ 'मधुर',

हिटलरी गुमान का आज अंत हो गया
फिर से फूल खिल रहे फिर बसंत हो गया .

अब दिलों से मिट गयी जो बनी थी दूरियाँ 
सारे बैर भाव का आज अंत हो गया .


हम भुला तो दें सितम तुम मगर कहो नहीं 
मर गया जब आज वो एक संत हो गया .

अर्थियां लियें हुये राजनीति जो करें
क्या वो उनका बाप था या कि कंत हो गया .

नफरतें, बबाल ही देन उसकी है रही
और उसने क्या दिया जो महंत हो गया .






هٹلري گمان کا آج آخر ہو گیا 
پھر سے پھول کھل رہے پھر بسنت ہو گیا. 

اب دلوں سے مٹ گئی جو بنی تھی دوریاں 
سارے بیر بھاو کا آج اختتام ہو گیا. 

ہم بھلا تو دیں ستم تم مگر کہو نہیں 
مر گیا جب آج وہ ایک سنت ہو گیا. 

ارتھيا ليے ہوئے سیاست جو لوڈ، اتارنا 
کیا وہ ان کا باپ تھا یا کہ كت ہو گیا. 

نپھرتے، ببال ہی دین اس کی ہے رہی 
اور اس نے کیا کیا ہے جو مہنت ہو گیا....




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