अभी पिछले दिनो, तुमने कई तस्वीर भेजी थीं।
उन्हीं में एक है, जो हर समय तकरार करती है।।
हमेशा मुंह फुलाती है, मगर मैं कुछ नहीं कहता।
मुझे मालूम है कमबख्त! मुझसे प्यार करती है।।
मुझे मालूम है खामोशियों की बदजबानी भी।
तुम्हारी अनकही नाराजगी सब जानता हूं मैं।।
दुपट्टा बांधकर नरमी का अपने गर्म चेहरे पर।
खड़ी हैं तल्खियां जितनी, उन्हें पहचानता हूं मैं।।
मगर बदले में केवल इसलिए लड़ता नहीं हूं मैं।
तुम्हारी हर लड़ाई है, मुहब्बत ‘और’ पाने की।।
असल में बात ये है, मैं बहुत मसरूफ रहता हूं।
तुम्हे लगता है, ये तरकीब है, दामन बचाने की।।
मुझे मालूम है तुम हो महज अहसास की मूरत।
तुम्हे लगता है मैं अक्सर जेहन से काम लेता हूं।।
मगर तुमको कभी शायद खबर ये मिल नहीं पाई।
मैं सोते वक्त भी अक्सर तुम्हारा नाम लेता हूं।।
हमेशा तुम शिकायत के जो तोहफे सौंप जाती हो।
तुम्हारी पीठ पीछे मैं उन्हें दिल से लगाता हूं।।
तुम्हारी हर निशानी की तरह उस खास कमरे में।
तुम्हारी हर शिकायत भी, करीने से सजाता हूं।।
मगर तुम सोचती हो, इश्क का कैसा फरिश्ता है।
इसे तो भूल से भी प्यार की फुर्सत नहीं मिलती।।
समझ में क्यों नहीं आता कभी इस संगदिल को ये।
कि जन्नत भी अधूरी है, अगर चाहत नहीं मिलती।
मुझे मालूम है ये बात लेकिन क्या करूं दिलबर।
बहुत मसरूफियत हैं, जो मुझे मजबूर करती हैं।।
नजर इनकी बचाकर मैं, महज तुमसे ही मिलता हूं।
मगर कमबख्त अदबद कर ‘तुम्हीं’ से दूर करती हैं।।
मुझे मालूम है ये भी, तुम्हारी रूह के भीतर।
कहीं पर एक वो मासूम-सी लड़की टहलती है।।
जिसे समझाओ तो वो जिद पकड़ लेती है रोने की।
खिलौने से नहीं, जो बस मुहब्बत से बहलती है।।
तुम्हारी ख़्वाहिशें मासूम हैं, हर मांग जायज है।
कहीं पर हैं कमी कुछ, मैं जिन्हें स्वीकार करता हूं।।
मगर दिल के किसी कोने में ये विश्वास रखना, मैं
हमेशा बस तुम्हीं से, बस तुम्हीं से प्यार करता हूं।।
-कुमार पंकज
Alpha
ابھی پچھلے دنوں، تم نے بہت سے تصویر بھیجی تھیں.انہی میں سے ایک ہے، جو ہر وقت تکرار کرتا ہے ..ہمیشہ منہ پھلاتي ہے، مگر میں کچھ نہیں کہتا.مجھے معلوم ہے کمبکھت! مجھ سے محبت کرتی ہے ..
مجھے معلوم ہے كھاموشيو کی بدجباني بھی.تمہاری انکہی ناراضگی سب جانتا ہوں میں ..دوپٹہ باندھ کر نرمی کا اپنے گرم چہرے پر.کھڑی ہیں تلكھيا جتنی، انہیں پہچانتا ہوں میں ..
مگر بدلے میں صرف اس لئے لڑتا نہیں ہوں میں.تمہاری ہر لڑائی ہے، محبت 'اور' حاصل کرنے کی ..اصل میں بات یہ ہے، میں بہت مصروف رہتا ہوں.تمہیں لگتا ہے، یہ ترکیب ہے، دامن بچانے کی ..
مجھے معلوم ہے تم ہو صرف احساس کی مورت.تمہیں لگتا ہے میں اکثر ذہن سے کام لیتا ہوں ..مگر تم کبھی شاید خبر یہ مل نہیں پائی.میں سوتے وقت بھی اکثر تمہارا نام لیتا ہوں ..
ہمیشہ تم شکایت کے جو توہپھے سونپ جاتی ہو.تمہاری پیٹھ پیچھے میں انہیں دل سے لگاتا ہوں ..تمہاری ہر نشانی کی طرح اس خاص کمرے میں.تمہاری ہر شکایت بھی، كرينے سے سجاتا ہوں ..
مگر تم سوچتی ہو، عشق کا کیسا پھرشتا ہے.اسے تو بھول سے بھی پیار کی فرصت نہیں ملتی ..سمجھ میں کیوں نہیں آتا کبھی اس سگدل کو یہ.کہ جنت بھی ادھوری ہے، اگر چاہت نہیں ملتی.
مجھے معلوم ہے یہ بات لیکن کیا کروں دلبر.بہت مسروپھيت ہیں، جو مجھے مجبور کرتی ہیں ..نظر ان کی بچا کر میں، صرف تم سے ہی ملتا ہوں.مگر کمبکھت ادبد کر 'تم' سے دور کرتی ہیں ..
مجھے معلوم ہے یہ بھی، تمہاری روح کے اندر اندر.کہیں پر ایک وہ معصوم - سی لڑکی ٹہلتی ہے ..جسے سمجھاو تو وہ ضد پکڑ لیتی ہے رونے کی.کھلونے سے نہیں، جو بس محبت سے بهلتي ہے ..
تمہاری خواهشے معصوم ہیں، ہر مانگ جائز ہے.کہیں پر ہیں کمی کچھ، میں جو قبول کرتا ہوں ..مگر دل کے کسی کونے میں یہ یقین رکھنا، میںہمیشہ بس تم ہی سے، بس تم سے پیار کرتا ہوں ..
- کمار پنکج
अभी पिछले दिनो, तुमने कई तस्वीर भेजी थीं।
उन्हीं में एक है, जो हर समय तकरार करती है।।
हमेशा मुंह फुलाती है, मगर मैं कुछ नहीं कहता।
मुझे मालूम है कमबख्त! मुझसे प्यार करती है।।
उन्हीं में एक है, जो हर समय तकरार करती है।।
हमेशा मुंह फुलाती है, मगर मैं कुछ नहीं कहता।
मुझे मालूम है कमबख्त! मुझसे प्यार करती है।।
मुझे मालूम है खामोशियों की बदजबानी भी।
तुम्हारी अनकही नाराजगी सब जानता हूं मैं।।
दुपट्टा बांधकर नरमी का अपने गर्म चेहरे पर।
खड़ी हैं तल्खियां जितनी, उन्हें पहचानता हूं मैं।।
मगर बदले में केवल इसलिए लड़ता नहीं हूं मैं।
तुम्हारी हर लड़ाई है, मुहब्बत ‘और’ पाने की।।
असल में बात ये है, मैं बहुत मसरूफ रहता हूं।
तुम्हे लगता है, ये तरकीब है, दामन बचाने की।।
मुझे मालूम है तुम हो महज अहसास की मूरत।
तुम्हे लगता है मैं अक्सर जेहन से काम लेता हूं।।
मगर तुमको कभी शायद खबर ये मिल नहीं पाई।
मैं सोते वक्त भी अक्सर तुम्हारा नाम लेता हूं।।
हमेशा तुम शिकायत के जो तोहफे सौंप जाती हो।
तुम्हारी पीठ पीछे मैं उन्हें दिल से लगाता हूं।।
तुम्हारी हर निशानी की तरह उस खास कमरे में।
तुम्हारी हर शिकायत भी, करीने से सजाता हूं।।
मगर तुम सोचती हो, इश्क का कैसा फरिश्ता है।
इसे तो भूल से भी प्यार की फुर्सत नहीं मिलती।।
समझ में क्यों नहीं आता कभी इस संगदिल को ये।
कि जन्नत भी अधूरी है, अगर चाहत नहीं मिलती।
मुझे मालूम है ये बात लेकिन क्या करूं दिलबर।
बहुत मसरूफियत हैं, जो मुझे मजबूर करती हैं।।
नजर इनकी बचाकर मैं, महज तुमसे ही मिलता हूं।
मगर कमबख्त अदबद कर ‘तुम्हीं’ से दूर करती हैं।।
मुझे मालूम है ये भी, तुम्हारी रूह के भीतर।
कहीं पर एक वो मासूम-सी लड़की टहलती है।।
जिसे समझाओ तो वो जिद पकड़ लेती है रोने की।
खिलौने से नहीं, जो बस मुहब्बत से बहलती है।।
तुम्हारी ख़्वाहिशें मासूम हैं, हर मांग जायज है।
कहीं पर हैं कमी कुछ, मैं जिन्हें स्वीकार करता हूं।।
मगर दिल के किसी कोने में ये विश्वास रखना, मैं
हमेशा बस तुम्हीं से, बस तुम्हीं से प्यार करता हूं।।
-कुमार पंकज
तुम्हारी अनकही नाराजगी सब जानता हूं मैं।।
दुपट्टा बांधकर नरमी का अपने गर्म चेहरे पर।
खड़ी हैं तल्खियां जितनी, उन्हें पहचानता हूं मैं।।
मगर बदले में केवल इसलिए लड़ता नहीं हूं मैं।
तुम्हारी हर लड़ाई है, मुहब्बत ‘और’ पाने की।।
असल में बात ये है, मैं बहुत मसरूफ रहता हूं।
तुम्हे लगता है, ये तरकीब है, दामन बचाने की।।
मुझे मालूम है तुम हो महज अहसास की मूरत।
तुम्हे लगता है मैं अक्सर जेहन से काम लेता हूं।।
मगर तुमको कभी शायद खबर ये मिल नहीं पाई।
मैं सोते वक्त भी अक्सर तुम्हारा नाम लेता हूं।।
हमेशा तुम शिकायत के जो तोहफे सौंप जाती हो।
तुम्हारी पीठ पीछे मैं उन्हें दिल से लगाता हूं।।
तुम्हारी हर निशानी की तरह उस खास कमरे में।
तुम्हारी हर शिकायत भी, करीने से सजाता हूं।।
मगर तुम सोचती हो, इश्क का कैसा फरिश्ता है।
इसे तो भूल से भी प्यार की फुर्सत नहीं मिलती।।
समझ में क्यों नहीं आता कभी इस संगदिल को ये।
कि जन्नत भी अधूरी है, अगर चाहत नहीं मिलती।
मुझे मालूम है ये बात लेकिन क्या करूं दिलबर।
बहुत मसरूफियत हैं, जो मुझे मजबूर करती हैं।।
नजर इनकी बचाकर मैं, महज तुमसे ही मिलता हूं।
मगर कमबख्त अदबद कर ‘तुम्हीं’ से दूर करती हैं।।
मुझे मालूम है ये भी, तुम्हारी रूह के भीतर।
कहीं पर एक वो मासूम-सी लड़की टहलती है।।
जिसे समझाओ तो वो जिद पकड़ लेती है रोने की।
खिलौने से नहीं, जो बस मुहब्बत से बहलती है।।
तुम्हारी ख़्वाहिशें मासूम हैं, हर मांग जायज है।
कहीं पर हैं कमी कुछ, मैं जिन्हें स्वीकार करता हूं।।
मगर दिल के किसी कोने में ये विश्वास रखना, मैं
हमेशा बस तुम्हीं से, बस तुम्हीं से प्यार करता हूं।।
-कुमार पंकज
Alpha
مجھے معلوم ہے كھاموشيو کی بدجباني بھی.تمہاری انکہی ناراضگی سب جانتا ہوں میں ..دوپٹہ باندھ کر نرمی کا اپنے گرم چہرے پر.کھڑی ہیں تلكھيا جتنی، انہیں پہچانتا ہوں میں ..
مگر بدلے میں صرف اس لئے لڑتا نہیں ہوں میں.تمہاری ہر لڑائی ہے، محبت 'اور' حاصل کرنے کی ..اصل میں بات یہ ہے، میں بہت مصروف رہتا ہوں.تمہیں لگتا ہے، یہ ترکیب ہے، دامن بچانے کی ..
مجھے معلوم ہے تم ہو صرف احساس کی مورت.تمہیں لگتا ہے میں اکثر ذہن سے کام لیتا ہوں ..مگر تم کبھی شاید خبر یہ مل نہیں پائی.میں سوتے وقت بھی اکثر تمہارا نام لیتا ہوں ..
ہمیشہ تم شکایت کے جو توہپھے سونپ جاتی ہو.تمہاری پیٹھ پیچھے میں انہیں دل سے لگاتا ہوں ..تمہاری ہر نشانی کی طرح اس خاص کمرے میں.تمہاری ہر شکایت بھی، كرينے سے سجاتا ہوں ..
مگر تم سوچتی ہو، عشق کا کیسا پھرشتا ہے.اسے تو بھول سے بھی پیار کی فرصت نہیں ملتی ..سمجھ میں کیوں نہیں آتا کبھی اس سگدل کو یہ.کہ جنت بھی ادھوری ہے، اگر چاہت نہیں ملتی.
مجھے معلوم ہے یہ بات لیکن کیا کروں دلبر.بہت مسروپھيت ہیں، جو مجھے مجبور کرتی ہیں ..نظر ان کی بچا کر میں، صرف تم سے ہی ملتا ہوں.مگر کمبکھت ادبد کر 'تم' سے دور کرتی ہیں ..
مجھے معلوم ہے یہ بھی، تمہاری روح کے اندر اندر.کہیں پر ایک وہ معصوم - سی لڑکی ٹہلتی ہے ..جسے سمجھاو تو وہ ضد پکڑ لیتی ہے رونے کی.کھلونے سے نہیں، جو بس محبت سے بهلتي ہے ..
تمہاری خواهشے معصوم ہیں، ہر مانگ جائز ہے.کہیں پر ہیں کمی کچھ، میں جو قبول کرتا ہوں ..مگر دل کے کسی کونے میں یہ یقین رکھنا، میںہمیشہ بس تم ہی سے، بس تم سے پیار کرتا ہوں ..
- کمار پنکج

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