गुरुवार, 3 जनवरी 2013

दिसम्बर मान जाओ ना

दिसम्बर!
और तुम दो-चार दिन क्या रुक नहीं सकते!
अभी देखो
मेरी आँखों से उसकी दीद के सपने नहीं टूटे,
अभी देखो
मेरे चेहरे से उसकी याद के मौसम नहीं रूठे,
अभी देखो
कोई आवाज़े-पा आई नहीं है मेरे कानों में,
अभी देखो
किसी के साथ मैं बैठा नहीं
माज़ी के उन दिलकश ठिकानों में।
दिसम्बर
और तुम दो-चार दिन क्या रुक नहीं सकते!
अभी तो कुछ नहीं,कुछ भी नहीं
अच्छा हुआ देखो,
अभी मैंने उसे देखा नहीं है तेरे साये में,
कि वो लड़की दिसम्बर के दिनों में कैसी लगती है!
अभी तो लौटती वापस थकी हारी-सी वो पगली
बिछड़कर तनहा राहों में नहीं टकरायी है मुझसे,
कि इक मौका मिले जब मैं उसे कुछ देर तक देखूँ
फिर उसके लब पे इक खामोश-सी धीमी हँसी उभरे!
झुकाकर अपनी गरदन फिर वो इक रफ़्तार से गुज़रे!
दिसम्बर
मान जाओ ना!
अभी दो-चार दिन तुम और रुक जाओ।
दिसम्बर जानता हूँ मैं
तुम्हारा काम आकर लौट जाना है,
मोहब्बत के महीने हो
तुम्हे टूटे कई रिश्ते बनाना है!
मगर मैं क्या करुँ
जितना मैं उसके पास जाता हूँ,
वो उतनी दूर मुझसे होती जाती है!
उसी की रस्म को तुमने भी अपना ही लिया शायद
कि इतनी जल्द मुझसे अलविदा कहने चले आये
उसे लेने चले आये...
दिसम्बर जानता हूँ मैं,
कि तुम चाहो भी तो इक लमहा ज्यादा रुक नहीं सकते!
हुक़ूमत वक़्त की तुम पर भी चलती है,
मगर पहली किरन जैसी वो लड़की जब भी मिलती है,
तो लब केवल यही फरियाद करते हैं-
दिसम्बर!
और तुम दो चार दिन क्या रूक नहीं सकते!

                                        -सौरभ नीमा 

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