शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

शहीद करकरे



मज़हब की ठेकेदारी से ,नफरत की पैरोकारी से ,
जो दूर रहें मज़हब और धर्मों की हर रिश्तेदारी से ,
"कामते साहब" "सालसकर" से कुछ नए सरफिरे पैदा कर ,
अल्लाह दुआ हम सबकी है एक और "करकरे" पैदा कर ,

जो समझ सके कि दहशत का एक और चेहरा भी होता है ,
अफ़सोस मगर एक "ख़ास कौम" के सर पर सेहरा होता है,
जिसकी खातिर दहशतगर्दी का मतलब दहशतगर्दी हो ,
जिसे किसी न जात न किसी कौम से कोई भी हमदर्दी हो ,

नफरत की परिभाषा बदले ,कुछ नए दायरे पैदा कर ,
अल्लाह दुआ हम सबकी है एक और करकरे .................

जिसकी क़ुरबानी भारत में हम सदियों सदियों याद करे ,
जिसकी इंसाफ परस्ती को हम गलियों गलियों याद करे ,
मौला हम सब के  होंठो पर मासूम दुआएं बची रहे ,
कविता (करकरे ) जैसी हिंदुस्तान में लाखों ही माएं बची रहें,

मोदी ,कसाब ,न तोगड़िया ,न कोई ठाकरे पैदा कर ,
अल्लाह दुआ हम सबकी है बस एक करकरे पैदा कर !
                                               - इमरान प्रतापगढ़ी

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