Brindavan Singh
फूल शाख़ों पे खिलने लगे तुम कहो ,
जाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो ,
इस खुले झूट को ज़ेहन की लूट को
जाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो ,
इस खुले झूट को ज़ेहन की लूट को
मैं नहीं मानता....
मैं नहीं जानता
मैं नहीं जानता
कराची की सड़क पर अपने लिखे गीत गाते हुए हबीब जालिब, जिया उल हक की सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। तभी चारो ओर से पुलिस ने इस तरह से घेरा, जैसे कोई खतरनाक टेररिस्ट सड़क पर घूम रहा हो। उसके हथियार थे उसकी नज्में जो धार्मिक कट्टरता, मार्शल ला और बोलने की आज़ादी रोकने के खिलाफ आग उगलती थी। खुला घूमता हबीब देश की सुरक्षा और स्थिरता के लिए खतरा था।
इस फोटो के कुछ ही देर में हबीब कराची की सेंट्रल जेल में थे। अगली कविता लिखते हुए.. । अब जेल कोई नई बात तो थी नही। हबीब ने जिन्ना को भी देखा, अयूब को भी, याह्या को और भुटटो को भी.. हुकूमतों का किरदार एक सा ही होता है। 64 साल की जिंदगी में कोई 19 दफा जेल की सैर की। अगली नज्म को लिखने की सबसे मुफीद जगह जेल की कोठरी ही महसूस होती रही थी। इस दफा जिया की जेल सही।
1929 पंजाब के होशियारपुर में जन्मे हबीब बटवारे के बाद पाकिस्तान में बस गए थे। जिंदगी शुरू की एक अखबार में प्रूफरीडर के बतौर..। मगर उस अखबार के एडिटर थे मशहूर शायर फैज अहमद फैज। उनकी संगत ने जिंदगी बदल दी। शुरुआत तो की उसी शेरो शायरी से, जो हम सब जवानी में करते है। मगर मुड़ गयी उस तरफ जिधर जाने की मनाही होती है।
सीधे सादे लफ्जों में अपनी बात कहने वाले हबीब को पाकिस्तान का दुष्यंत कुमार कहना अतिश्योक्ति नही होगी। हालांकि वरिष्ठता के आधार पर दुष्यंत को भारत का हबीब जालिब कहना उचित होगा। दुष्यंत ने जब शुरू नही किया था, तब अयूब खान की हुकूमत की मज़म्मत करते हुए हबीब की पंक्तियां " मैं नहीं जानता, मैं नही मानता" पाकिस्तान की अवाम का नारा बन चुकी थी।
दीप जिस का महल्लात ही में जले ,
चंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चले
वो जो साए में हर मस्लहत के पले ,
चंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चले
वो जो साए में हर मस्लहत के पले ,
ऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर को
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
मैं भी ख़ाइफ़ नहीं तख़्ता-ए-दार से ,
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़्यार से
क्यूँ डराते हो ज़िंदाँ की दीवार से ,
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़्यार से
क्यूँ डराते हो ज़िंदाँ की दीवार से ,
ज़ुल्म की बात को जहल की रात को
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
फूल शाख़ों पे खिलने लगे तुम कहो ,
जाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो ,
जाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो ,
इस खुले झूट को ज़ेहन की लूट को
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
तुम ने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ ,
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूँ
चारागर दर्दमंदों के बनते हो क्यूँ ,
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूँ
चारागर दर्दमंदों के बनते हो क्यूँ ,
तुम नहीं चारागर कोई माने मगर
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
1993 में हबीब का इंतकाल हुआ और पाकिस्तानी हुक्मरानों ने चैन की सांस ली। लेकिन उनका लिखा आज भी दुनिया के हर तानाशाह को परेशान करता है। बहरहाल ये गीत जेएनयू के कुछ स्टूडेंट्स को गाते सुना। टुकडे टुकड़े गैंग वाले पाकिस्तान प्रेमियों से और आशा भी क्या की जा सकती है।
... यही की वे एक बेहतरीन क्रांतिकारी शायर की याद दिला दें।
साभार-Manish Singh

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