पहली रचना
----------
कविता
------
एक पन्ने पर कहीं तो
----------------
मैं नहीं धृतराष्ट्र का प्रिय पुत्र दुर्योधन,
जिसे सब कुछ मिला था जन्म से ही।
मैं नहीं गुरू द्रोण का प्रिय शिष्य अर्जुन,
जो रहा प्रभु-स्नेह का भाजन सदा ही।
मैं नहीं अभिमन्यु, जिसने पा लिया था
ज्ञान का वरदान, माँ के गर्भ में ही।
मैं नहीं वह सूर्य का सुत कर्ण,
जो जन्मा जगत में, ले सुरक्षा का कवच ही।
प्रश्न है फिर कौन हूँ मैं?
मैं वही हूँ दीन, सुविधाहीन, वनवासी धनुर्धर
जो न था इस योग्य,
उसको कोई भूमि से उठाता
और सीने से लगाता,
कुछ बताता, कुछ सिखाता।
किन्तु मैंने प्राप्त कर ली जब निपुणता
निज यतन से, प्राण-पण से,
यह व्यवस्था आ गई मुझको सताने, यह बताने
दी नहीं गुरुदक्षिणा मैंने अभी तक।
यह व्यवस्था, जो नहीं देती कभी कुछ,
किन्तु तत्पर है हमेशा छीनने को।
यह व्यवस्था, जो नहीं प्रतिभा परखती,
यह व्यवस्था, जो सदा सम्पन्नता के साथ रहती।
यह व्यवस्था, जो दिखाती स्वप्न झूठा,
और जैसे ही मिले अवसर, कपट से
माँग लेती है अँगूठा।
यह व्यवस्था, दे न दे वह मान मुझको,
सिद्ध है जिस पर मेरा हक़।
पर लिखेगा काल जब अपनी कहानी,
हर किसी के काम का लेखा करेगा।
इन सभी योद्धाओं का गुणगान करके,
पृष्ठ कितने ही भरेगा।
पर वही पहचान कर सामर्थ्य मेरी,
श्रेष्ठता मेरी परख कर,
एक पल को तो रुकेगा।
और अपनी पोथियों में, एक पन्ने पर कहीं तो,
ज़िक्र मेरा भी करेगा, नाम मेरा भी लिखेगा।
नाम मेरा भी लिखेगा, ज़िक्र मेरा भी करेगा।
दूसरी रचना
---------
कविता
------
प्रगति की मंज़िलें
-------------
व्यवस्था के रथ में जुते
श्रम रूपी घोड़े हैं हम
और वे.....
सत्ता की लगाम से हमें थामे
रथ के सवार।
उनके हाथों में
अधिकारों के चाबुक हैं
जिन्हें वे पहले से लुहूलुहान
हमारे जिस्मों पर
दनादन बरसा रहे हैं।
घायल पीठ और उखड़ी साँसें लिए
जब हम दौड़ते हैं और तेज़
तो ठठाकर हँसते हैं वे
और कहते हैं,
"देखो, हमने प्रगति की कितनी मंज़िलें
तय कर ली हैं।"
तीसरी रचना
----------
कविता
------
पूजना ही है अगर
--------------
धैर्य रखकर ज़िन्दगी की हर पहेली बूझ साथी।
पूजना ही है अगर, श्रम-देवता को पूज साथी।।
हर सफ़लता के लिए संघर्ष करना ही पड़ेगा।
राह की कठिनाइयों से भी गुज़रना ही पड़ेगा।
शांत दरिया हो कि अपनी मौज में आया समंदर,
पार करने के लिए जल में उतरना ही पड़ेगा।
हौसले से हर लहर से, हर भँवर से जूझ साथी।
पूजना ही है अगर, श्रम-देवता को पूज साथी।।
कौन सा वह काम है जो ठान लेने से न होगा।
बाज़ुओं की शक्ति को पहचान लेने से न होगा।
काम कितना भी कठिन हो, पर नहीं ऐसा कठिन कुछ,
जो मनुज-सामर्थ्य को संधान लेने से न होगा।
काम आएगी सदा मुश्किल घड़ी में सूझ साथी।
पूजना ही है अगर, श्रम-देवता को पूज साथी।।
चौथी रचना
---------
गीत
---
बुतों का युग न आ जाए
-------------------
कहीं प्रतिमा हज़ारों आदमी का हक़ न खा जाए।
यही डर सामने है अब, बुतों का युग न आ जाए।।
चले थे देश को उन्नत बनाने का इरादा कर,
मगर पाषाण-युग में अब, इसे ले जा रहे हो क्या?
नई जो सोच लाए हो, नई जो योजनाएँ हैं,
इसी से लोग खुश होंगे, यही समझा रहे हो क्या?
न जाने वक़्त कब आकर, तुम्हें ही कुछ सिखा जाए।।
हमारे पेट रोटी से भरेंगे या शिलाओं से,
हमें तो नौकरी दे दो, तुम्हें मन्दिर मुबारक हो।
हमारी तुम सुनो, शायद तुम्हारी रामजी सुन लें,
हमारी इन दुआओं की, पहुँच शायद वहाँ तक हो।
करो कुछ काम की बातें, तभी तो कुछ सुना जाए।।
शिकायत थी तुम्हें तुष्टिकरण की जिस सियासत से,
उसी तुष्टिकरण की राह पर तो चल रहे हो तुम।
उठाकर धार्मिक मुद्दे, दिलों से खेल लेते हो,
कभी मन्दिर, कभी प्रतिमा बनाकर छल रहे हो तुम।
ज़रूरी यह नहीं बिलकुल, तुम्हें कल फिर चुना जाए।।
सियासत धर्म की हो, जाति की हो, या प्रदेशों की,
कभी भी देशहित के फ़ैसले लेने नहीं देती।
सभी दल एक जैसे हैं, सभी को है पता इसका,
करो भड़काऊ बातें, ख़ूब होगी वोट की खेती।
सदा उल्लू बने हैं हम, कहो अब क्या किया जाए?
--बृज राज किशोर 'राहगीर'
संक्षिप्त परिचय
-------------
नाम: बृज राज किशोर 'राहगीर'
जन्मतिथि: ८ नवम्बर, १९५१
जन्मस्थान: मुज़फ़्फ़रनगर (उ.प्र.)
शिक्षा: बी.एस-सी., बी.एड., भारतीय बीमा संस्थान की फैलोशिप
सम्प्रति: ४१ वर्षों तक भारतीय जीवन बीमा निगम में सेवा के बाद मण्डल प्रबन्धक के रूप में सेवानिवृत्ति। वर्तमान में पूर्णकालिक लेखन
प्रकाशित पुस्तकें: तीन काव्य संग्रह व एक ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित
(१) एक पन्ने पर कहीं तो
(२) लेखनी गोमुख बनी है
(३) मैं काव्य जगत का इन्द्रधनुष
(४) मुख़्तलिफ़ (ग़ज़ल संग्रह)
आधा दर्जन से अधिक साझा काव्य संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित
देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
कवि-सम्मेलनों में काव्य पाठ, आकाशवाणी नज़ीबाबाद से अनेक बार काव्य पाठ
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कविता
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एक पन्ने पर कहीं तो
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मैं नहीं धृतराष्ट्र का प्रिय पुत्र दुर्योधन,
जिसे सब कुछ मिला था जन्म से ही।
मैं नहीं गुरू द्रोण का प्रिय शिष्य अर्जुन,
जो रहा प्रभु-स्नेह का भाजन सदा ही।
मैं नहीं अभिमन्यु, जिसने पा लिया था
ज्ञान का वरदान, माँ के गर्भ में ही।
मैं नहीं वह सूर्य का सुत कर्ण,
जो जन्मा जगत में, ले सुरक्षा का कवच ही।
प्रश्न है फिर कौन हूँ मैं?
मैं वही हूँ दीन, सुविधाहीन, वनवासी धनुर्धर
जो न था इस योग्य,
उसको कोई भूमि से उठाता
और सीने से लगाता,
कुछ बताता, कुछ सिखाता।
किन्तु मैंने प्राप्त कर ली जब निपुणता
निज यतन से, प्राण-पण से,
यह व्यवस्था आ गई मुझको सताने, यह बताने
दी नहीं गुरुदक्षिणा मैंने अभी तक।
यह व्यवस्था, जो नहीं देती कभी कुछ,
किन्तु तत्पर है हमेशा छीनने को।
यह व्यवस्था, जो नहीं प्रतिभा परखती,
यह व्यवस्था, जो सदा सम्पन्नता के साथ रहती।
यह व्यवस्था, जो दिखाती स्वप्न झूठा,
और जैसे ही मिले अवसर, कपट से
माँग लेती है अँगूठा।
यह व्यवस्था, दे न दे वह मान मुझको,
सिद्ध है जिस पर मेरा हक़।
पर लिखेगा काल जब अपनी कहानी,
हर किसी के काम का लेखा करेगा।
इन सभी योद्धाओं का गुणगान करके,
पृष्ठ कितने ही भरेगा।
पर वही पहचान कर सामर्थ्य मेरी,
श्रेष्ठता मेरी परख कर,
एक पल को तो रुकेगा।
और अपनी पोथियों में, एक पन्ने पर कहीं तो,
ज़िक्र मेरा भी करेगा, नाम मेरा भी लिखेगा।
नाम मेरा भी लिखेगा, ज़िक्र मेरा भी करेगा।
दूसरी रचना
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कविता
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प्रगति की मंज़िलें
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व्यवस्था के रथ में जुते
श्रम रूपी घोड़े हैं हम
और वे.....
सत्ता की लगाम से हमें थामे
रथ के सवार।
उनके हाथों में
अधिकारों के चाबुक हैं
जिन्हें वे पहले से लुहूलुहान
हमारे जिस्मों पर
दनादन बरसा रहे हैं।
घायल पीठ और उखड़ी साँसें लिए
जब हम दौड़ते हैं और तेज़
तो ठठाकर हँसते हैं वे
और कहते हैं,
"देखो, हमने प्रगति की कितनी मंज़िलें
तय कर ली हैं।"
तीसरी रचना
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कविता
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पूजना ही है अगर
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धैर्य रखकर ज़िन्दगी की हर पहेली बूझ साथी।
पूजना ही है अगर, श्रम-देवता को पूज साथी।।
हर सफ़लता के लिए संघर्ष करना ही पड़ेगा।
राह की कठिनाइयों से भी गुज़रना ही पड़ेगा।
शांत दरिया हो कि अपनी मौज में आया समंदर,
पार करने के लिए जल में उतरना ही पड़ेगा।
हौसले से हर लहर से, हर भँवर से जूझ साथी।
पूजना ही है अगर, श्रम-देवता को पूज साथी।।
कौन सा वह काम है जो ठान लेने से न होगा।
बाज़ुओं की शक्ति को पहचान लेने से न होगा।
काम कितना भी कठिन हो, पर नहीं ऐसा कठिन कुछ,
जो मनुज-सामर्थ्य को संधान लेने से न होगा।
काम आएगी सदा मुश्किल घड़ी में सूझ साथी।
पूजना ही है अगर, श्रम-देवता को पूज साथी।।
चौथी रचना
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गीत
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बुतों का युग न आ जाए
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कहीं प्रतिमा हज़ारों आदमी का हक़ न खा जाए।
यही डर सामने है अब, बुतों का युग न आ जाए।।
चले थे देश को उन्नत बनाने का इरादा कर,
मगर पाषाण-युग में अब, इसे ले जा रहे हो क्या?
नई जो सोच लाए हो, नई जो योजनाएँ हैं,
इसी से लोग खुश होंगे, यही समझा रहे हो क्या?
न जाने वक़्त कब आकर, तुम्हें ही कुछ सिखा जाए।।
हमारे पेट रोटी से भरेंगे या शिलाओं से,
हमें तो नौकरी दे दो, तुम्हें मन्दिर मुबारक हो।
हमारी तुम सुनो, शायद तुम्हारी रामजी सुन लें,
हमारी इन दुआओं की, पहुँच शायद वहाँ तक हो।
करो कुछ काम की बातें, तभी तो कुछ सुना जाए।।
शिकायत थी तुम्हें तुष्टिकरण की जिस सियासत से,
उसी तुष्टिकरण की राह पर तो चल रहे हो तुम।
उठाकर धार्मिक मुद्दे, दिलों से खेल लेते हो,
कभी मन्दिर, कभी प्रतिमा बनाकर छल रहे हो तुम।
ज़रूरी यह नहीं बिलकुल, तुम्हें कल फिर चुना जाए।।
सियासत धर्म की हो, जाति की हो, या प्रदेशों की,
कभी भी देशहित के फ़ैसले लेने नहीं देती।
सभी दल एक जैसे हैं, सभी को है पता इसका,
करो भड़काऊ बातें, ख़ूब होगी वोट की खेती।
सदा उल्लू बने हैं हम, कहो अब क्या किया जाए?
--बृज राज किशोर 'राहगीर'
संक्षिप्त परिचय
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नाम: बृज राज किशोर 'राहगीर'
जन्मतिथि: ८ नवम्बर, १९५१
जन्मस्थान: मुज़फ़्फ़रनगर (उ.प्र.)
शिक्षा: बी.एस-सी., बी.एड., भारतीय बीमा संस्थान की फैलोशिप
सम्प्रति: ४१ वर्षों तक भारतीय जीवन बीमा निगम में सेवा के बाद मण्डल प्रबन्धक के रूप में सेवानिवृत्ति। वर्तमान में पूर्णकालिक लेखन
प्रकाशित पुस्तकें: तीन काव्य संग्रह व एक ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित
(१) एक पन्ने पर कहीं तो
(२) लेखनी गोमुख बनी है
(३) मैं काव्य जगत का इन्द्रधनुष
(४) मुख़्तलिफ़ (ग़ज़ल संग्रह)
आधा दर्जन से अधिक साझा काव्य संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित
देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
कवि-सम्मेलनों में काव्य पाठ, आकाशवाणी नज़ीबाबाद से अनेक बार काव्य पाठ
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