![]() आज मित्रता दिवस है.हमारे यहाँ प्रगाढ़ मित्रता के अनेक उदाहरण हैं जिनमें कृष्ण- सुदामा, राम-सुग्रीव, दुर्योधन -कर्ण का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. यूँ कथासरितसागर में मगर और बन्दर की दोस्ती की भी प्रेरणा दायक कथा है लेकिन वो एक गढ़ी हुई बोध कथा है, इसलिए उसका जिक्र नहीं करता हूँ. बात आदर्श मित्रों की करें जिनका उदाहरण देकर मित्रता का पाठ पढ़ाया जाता है, और कहा जाता है कि मित्र हो तो ऐसा हो. सबसे पहले कृष्ण और सुदामा की कथा को ही देखें . यह कथा बताती है कि कृष्ण और सुदामा संदीपन गुरु के आश्रम में सहपाठी थे. और आप तो जानते ही हैं कि सहपाठी की मित्रता सबसे भरोसे की होती है. जब सुदामा के जीवन काल में बुरा वक्त आया,उसके घर भुखमरी की नौबत आ गई तो उसकी पत्नी ने यह कह कहकर उसकी नाक में दम कर दिया कि रोज आँगन में बैठकर डींगे मारते रहते हो कि श्रीकृष्ण मेरा मित्र है, श्रीकृष्ण मेरा मित्र है, जब तुम्हारा मित्र राजमहलों में रहता है तो एक बार जाकर उससे अपने लिए थोडा धन क्यूँ नहीं माँग लाते हो ? ऐसे क्या भूखे मरने की ठान ली है. सुदामा ने बहुतेरा समझाया कि भागवान भ्रम बना रहने दे क्यूँ पोल खुलवाती है। इस भ्रम की बदौलत ही अपने दिन कट रहे हैं । नही तो तू नहीं जानती आजकल कैसी मारामारी मची है। सब को ये पता न चले कि कृष्ण और सुदामा गुरूकुल के साथी हैं तो हमारा जीना हराम हो जाये। आज ऐसे ऐसे गुन्डे बदमाश हैं जो दिनदहाड़े घर में घुस आयेंगें और मुझे बाहर सडक पर खडा करके कहेंगे चल भाग यहॉं से ये घर हमारा है। ज्यादा चूॅ चॉं करूॅगा तो वो घरवाली को भी अपनी बता देंगे। कमजोर की जर,जमीन, जोरू पर सदा से सबकी निगाह रही है। पर एक दिन का फाका हो तो चुप भी रहा जाये, जहॉं रोज का यही हाल हो तो कोई कैसे बरदाश्त कर सकता है? सुदामा की पत्नि रोज द्वारिका जाओ, द्वारिका जाओ की रट लगाने लगी। सुदामा रोज समझाता। क्या करूॅगा द्वारिका जाकर ? वहॉं कोई मुझे पहचानेगा भी नहीं। अरे बावली बाभन को तो भिक्षा मॉंगकर पेट भरने का वरदान मिला है तू काहे दुखी होती है? मैं और चार गॉंव भीख मॉंग आया करूॅगा। ये पैसे धेले की बात छोड दे, मेरे तेरे लिये भीख काफी है। पर जैसे भूखे नगों को सरकार की बात समझ में नहीं आती है, उसी प्रकार सुदामा की पत्नि को सुदामा की बात समझ में नहीं आती थी। आखिर एक दिन सुदामा को उसकी पत्नि ने सुबह ही सुबह चावलों की एक पोटली थमा कर कहा कि अब सीधे द्वारका चले जाओ और घर में तभी घुसना जब कृष्ण से मिल आओ। .अब सुदामा के सामने द्वारिका जाकर द्वारिकाधीश से अपनी दीनता का बखान करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। सुदामा ने पोटली बगल में दबायी और अपनी लाठी टेकता हुआ द्वारका पथ पर पैदल ही चल पडा। रास्ते में सोचता जाता वह कृष्ण से कैसे अपनी बात कहेगा? कृष्ण उसे पहचानेगा भी या नहीं ? वो पहचाने भी लेगा तो जिसके साथ बराबर का सम्बन्ध रहा हो उसके आगे कैसे हाथ पसारेगा? सुदामा पथ में आगे पैर बढाता पर उसका शिथिल तन मन उसे पीछे की ओर खींचता था. उसके पॉंव मन मन भारी हुये जाते थे। रास्तें में भव्य रथों और हाथी, घोडों पर सवार यात्री धूल उडाते चले जा थे लेकिन किसी ने नहीं कहा कि आ मुसाफिर हमारे साथ आ हम तुझे तेरी मंजिल पर छोड देगें। जैसे तैसे गिरते पडते सुदामा द्वारिका तक पहुच गया। .द्वारिका की जगमग देखकर उसकी ऑंखें फटी रह गयी । उसे समझ ही नहीं आया कि यहॉं कृष्ण कौन से महल में रहता है। वो जिस भवन को देखता वही महल नजर आता। आखिर द्वारिका राजधानी था और हर राजधानी में रहने वालों के जैसे ठाट बाट हुआ करते हैं वैसे ही वहॉं थे। खैर पूछताक्ष कर सुदमा श्रीकृष्ण के राजमहल के द्वार पर जा पहॅुचा। लेकिन उसकी हिम्मत अन्दर जाने की न हुई । वह महल के चारों और चक्कर लगाता कि कही से श्रीकृष्ण नजर आयें तो उन्हें आवाज दूँ और फिर मुख्य द्वार के सामने आकर खडा हो जाता। द्वार रक्षकों ने देखा ये कौन आदमी है जो बार बार आकर द्वार के सामने खडा हो जाता है? हुलिये से कोई निर्धन भिकारी मालूम होता है।शायद याचना करने आया है । उन्होंने आवाज दी -कौन हो भाई ? क्या चाहते हो ? सुदामा को उम्मीद तो न थी कि प्रहरी इतनी शिष्टता से पेश आयेंगें. लेकिन उसने सोचा प्रभु का प्रताप है। सुदामा ने द्वार रक्षकों से कहा मैं कृष्ण से मिलना चाहता हूँ । द्वार रक्षक बोले - कौन कृष्ण? सुदामा ने कहा- मेरे मित्र कृष्ण जो द्वारिकाधीश हैं ? प्रहरी हॅंस दिये - हा हा हा कृष्ण के मित्र? दर्पण में सूरत देखी है अपनी ?बडे आये द्वारिकाधीश के मित्र, चलो भागो यहॉं से। सुदामा का रूऑंसा हो गया। वह घर वापिस हो लेता लेकिन क्या करे ? पत्नि जी ने तो कहा है घर तब घुसना जब श्रीकृष्ण से कृष्ण माल मत्ता ले आओ। अब माल मत्ता तो क्या मिलता ये यमदूत दर्शन भी नहीं करने दे रहे हैं। सुदामा करे तो क्या करे ? उसके आगे कुआ था पीछे खाई ? उसने कुयें में कूद जाने का निश्चय किया । उसने अपना सारा साहस बटोरा और द्वार रक्षकों पर चिल्लाते हुये कहा कि तुम क्या इसलिये रखे गये हो कि किसी को कृष्ण भगवान से मिलने ही न दो. मैं यही द्वार के सामने धरने पर बैठ जाता हूँ. कभी तो कृष्ण महल से बाहर आवेगा। देखना मैने भी अगर तुम्हारे ये बल्लम तुरही ना रखवाये तो मेरा नाम सुदामा नहीं. कृष्ण का मित्र हॅं कोई ऐसा वैसा मत समझाना। ये बात मेरे सारे गॉंव को मालूम है. कोई बडे से बडा शठ भी मेरे से नहीं उलझता है । और तुम तो राजा के चाकर हो। तुम्हारी औकात ही क्या है? मैंने जरा सा बोला और कृष्ण ने तुम्हें राजकीय सेवा से अलग किया। राजकीय सेवकों का हौसला ही कितना होता है ? किसी ने जरा कड़ी सी दांत लगाई और उन्हें तुरंत अपनी नौकरी की फ़िक्र हुई. द्वार रक्षको का माथा ठनका हो ना हो ये द्वारिकाधीश का वाकई बचपन का कोई मित्र हो। श्रीकृष्ण भी तो पहले गायें ही चराया करते थे। उनका मित्र ऐसा कोई भी आदमी हो सकता है। लेकिन ये आदमी और श्रीकृष्ण का मित्र ? चलो मान लिया ये गुरबत में है और इसलिये इसका ये हाल है, लेकिन इसकी भाषा तो दीनता की भाषा नहीं है. ये कोई शत्रु का भेदिया भी तो हो सकता है ? द्वार रक्षक द्वन्द्व में फॅंसा था लेकिन सुदामा के तेवर देख उसने महाराज को खबर करने का निश्चय किया। सुदामा को प्रतीक्षा करने के लिये कहकर द्वाररक्षक महल के भीतर गया और महाराज से निवेदन किया राजन एक भिखारी सी वेशभूषा वाला आदमी द्वार पर खडा है और आपको अपना मित्र बताकर अन्दर आना चाहता है। श्रीकृष्ण ने तुरन्त सुदामा को अन्दर बुलवा भेजा। कहने वाले तो कहते हैं कि सुदामा रूकमणि को छोडकर नंगे पैर दौडे चले आये और आकर सुदामा के गले से लिपट गये। लेकिन ऐसा कही होता है? लोगों का क्या है उन्हें तो बढा चढाकर कहने की आदत होती है तो चलो माने लेते हैं, श्रीकृष्ण ने अपने बचपन के मित्र सुदामा को सम्मान के साथ अपने महल में अन्दर बुलवा लिया. कथा कहती है कि श्रीकृष्ण ने सुदामा का खूब आदर सत्कार किया. जब कई दिन हो गये तो श्रीकृष्ण को अपना गॉंव, अपनी झोंपडी, अपनी पत्नि और सबसे ज्यादा अपना भिक्षाटन याद आने लगा। आप कहेंगें ये क्या बात हुई। कहॉं महलों के मोहन श्रोग और कहॉं भीख की रूखी सूखी रोटी? लेकिन कभी आपने लगतार शादी विवाहों में दावतें खायी है? इन लगतार की दावतों से मन कैसे मिचलाता है पेट कैसा गडबडाता है और जिहवा कैसे घर के सादे खाने को तरसती है ? ये सब आपको जरूर पता होगा। फिर भीख की रोटी को तो मधुकरी कहा जाता है। उसमें भॉंति भॉंति का अनाज भी होता है । आजकल बाबा रामदेव जिस मिक्स अनाज की रोटी को सेहत के लिये फायदेमन्द बताते हैं वो भीख में हमेशा मिलती है। तो किस्सा कोताह ये कि सुदामा को अपने आजादी के दिन याद आने लगे । महल के सेवक उसे यमदूत से लगने लगे। उसे अपनी ब्राहमणी की चिन्तो सता रही थी और इधर कृष्ण था कि खानंे पीने और इधर उधर की बाते बनाने के अलावा कभी ये नहीं पूछता था कि सुदामा तू क्या काम करता है? तेरे घर पर सब ठीक तो हैं। एक दिन सुदामो ने श्रीकृष्ण से विदा करने के लिये कहा। श्री कृष्ण ने सुना अनसुना कर दिया । श्री कृष्ण ने एक दो दिन बाद फिर कहा । श्रीकृष्ण ने कहा कौन जन्दी है? यही ,खाओ पियों और मस्त रहो? कुछ दिन बाद सुदामा ने फिर कहा। श्रीकृष्ण ने फिर टाल दिया। अब ये रोज की बात हो गयी सुदामा विदा मॉंगता और श्रीकृष्ण हॅंसकर टाल देते । एक दिन सुदामा ने जिद पकड ली कि अब बहुत हो गया आज तो विदा कर ही दो। श्रीकृष्ण ने बहुत कहा अभी रहने दो क्या करोगे वहाँ जाकर कौन तुम्हारी गैया रंभाती हैं ? यहीं रहो . लेकिन आखिर में श्रीकृष्ण ने सुदामा की हाथ देखकर कह ही दिया अच्छा तुम्हारा यही मन है तो जाओ। उन्होने अपने सारथी को आवाज दी सारथी !जाओ मित्र सुदामा को विदा कर आओ। सुदामा हैरान कि ये कैसा मित्र है, इसने एक बार भी नहीं पूछा मेरे लायक कोई काम तो नही है? अब ऐसे कैसे कहूँ कि मेरी कुछ मदद करो? उसने श्रीकृष्ण से कहा कि मैं जाऊं ? श्रीकृष्ण ने कहा हॉं जाओ ? सुदामा चलने के लिये मुडा और फिर पलटकर श्रीकृष्ण से कहा कि मैं जाऊँ ? श्रीकृष्ण ने कहा हॉं मित्र जाओ? सुदामा ने दिल पे पत्थर रखकर द्वार की ओर पैर बढाये, दो कदम चला और मुडकर बोला तो मैं जाऊँ कान्हा ? श्रीकृष्ण ने कहा हॉं जाओ भैया? सुदामा परेशान हो गया। ये तो झूठे को भी नहीं पूछ रहा है कि कुछ बात है क्या? पहले कैसे नहीं जाने देता थ अब एक बार भी नहीं कहता रूक जाओ? द्वार से बाहर निकलकर एक बार फिर सुदामा बोला मै जाऊँ कन्हैया ? श्रीकृष्ण ने मुस्काते हुये कहा- हॉं हॉं जाओ भी अब क्यूँ देर करते हो मित्र ?सफ़र भी लम्बा है अब तुम जाओ . .अब श्रीकृष्ण के सामने लौट के बुद्ध घर को आये कहावत को साकार करने के अलावा को चारा न था। .उसका मन ऐसा उचाट हुआ कि उसने श्रीकृष्ण के रथ को द्वारिका से निकलते ही वापिस लौटा दिया। वैसे भी जब पहले जैसा ही भूखा नंगा वापिस जाना था तो रथ पर बैठकर जाने की क्या तुक थी? रथ जल्दी घर पहुॅचा देता और सुदामा की हिम्मत अपनी ब्राहणी की लाल लाल ऑंखों को सामना करने की नही थी। सुदामा चाहता था कि वह आराम से चलकर घर पहुचे ताकि सफ़र में ठन्डे दिमाग से कृष्ण से कुछ न मिलाने का कोई सन्तोषजनक बहाना सोच सके । अभी तो दिमाग इतना गरम था कि कुछ का कुछ सोचता था। कहॉं तो उसके सपने लहलहा रहे थे कि उसका बडा सा मकान होगा, गैया होगी, चाकर होंगे सारे गॉंव वाले उसे झुककर प्रणाम करेंगें। कहॉं अब ये डर कि सबको पता चल जायेगा श्रीकृष्ण से मित्रता की बात कोरी गप्प है। ले आये द्वारिका से खजाना अब करेंगें बणज। ये सब सोचते सोचते सुदामा अपने घर के द्वार तक आ पहुचे। लेकिन वहॉं उनकी झोपडी का कही नामो निशान न था। उन्हें लगा कि किसी दबंग ने उनकी झोपडी उजाडकर अपना महल बना लिया है। लेकिन अपनी ब्राहमणी का क्या हुआ? उसके मन के अन्दर से ही जबाब आया होना क्या है ? सेठ के बर्तन मॉंजती होगी? ये भी हो सकता है उसका भी मन बदल गया हो ? और वो भी सेठ से सट गयी हो। तिरिया चरित्र को कौन समझ सकता है ?तभी संयोग से सुदामा की पत्नि किसी काम से घर से बाहर आयी उसने देखा एक भिखारी नुमा आदमी दूर खडा उसे ही देखे जा रहा है। वो उसे गौर से देखने लगी। इधर सुदामा का दिमाग गरम हो रहा था। वो सोचने लगा कि देख कुलटा कैसे दीदे फाड फाड कर देख रही है जेसे मुझे जानती ही न हो ? मैं न कहता था कि स्त्री के चरित्र को ब्रहमा भी नहीं जान सकते? कैसे गहनों में लदी फदी है जैसे इसके बाप ने लाकर दिये हों ? कम्बख्त मुटिया भी खूब रही है । चर्बी देह पर ही नहीं ऑंखों पर भी चढ़ी है। तभी मुझे घूरे जा रही है। सोचती होगी ये मुआ कहॉं से आ गया ? ये अभी तक जिन्दा है? चलूॅ कहीं मुझे अपने यारों से बुलाकर पिटवाने ना लगे। सुदामा ने अपने घर की ओर से मुँह मोडा ओर तेजी से वापिस लौटने लगा? उधर सुदामा के मुडते ही उसकी पत्नि को होश आया अरे ये तो पण्डित जी हैं .लेकिन इस हाल में कैसे हैं? जरूर रास्ते में डाकुओं ने लूट लिया होगा? लेकिन ये कहॉं चले जा रहे है? वो चिल्लायी ए जी सुनो? सुदामा को ये आवाज अपने लिये संकट की चेतावनी सी लगी. उसने और तेज कदम कर लिये। यह देख सुदामा की पत्नि ने लोगों को चिल्लाकर इकटठा कर लिया और भागते सुदामा की ओर उॅगली का ईशारा किया। लोगों ने सोचा कोई कोई उठाईगीर घर की कोई चीज उठाकर भाग रहा है या कोई आवारा छेडखानी कर भाग गया है ? लोग सुदामा को पकड़ने के लिये उसके पीछे दौडने लगे। सुदामा ने लोगों को अपने पीछे आते देखा तो सिर पर पैर रखकर भागा। अब आगे आगे सुदामा था और पीछे पीछे ले लो की आवाजे करता लोगों का हजूम। भागते भागते रास्ते में एक नाला आ गया। नाला खूब गहरा और चौडा था। जब तक सुदामा उसे कूदकर भागने की कुछ जुगत लगाता लोगो ने उसे जा पकडा। फिर जो ले दे हुई उसने सुदामा को हुलिया बिगाड कर रख दिया। सुदामा ने बहुत कहा कि मै तो सुदामा हूँ. मैने सेठ की नौकरानी से कुछ नहीं कहा है। लेकिन लौग क्यू उसकी बात सुनने लगे। उन्हें पता था कि सुदामा तो द्वारिका गया है और ये कोई बहरूपिया है जो सुदामा बनकर सुदामा के घर में घुसना चाहता है। तभी तो सुदामा की पत्नी को सेठ की नौकरानी बता रहा है . सुदामा को क्या हम नहीं पहचानते हैं? सुदामा की पत्नि नहीं पहचानती है? या सुदामा अपनी पत्नी को नहीं पहचानता है ? गरीब के अब जाकर थोडा दिन बहुर गये हैं तो कोई भी उसके घर और उसकी घरवाली को अपना बता देगा? अभी कोई कलयुग थोडा ही आया है ? ऐसा अन्याय न होने देंगें । लोगों ने सुदामा को गंगाडोली कर अपने कंधें पर लादा और उसकी की पत्नि के आगे लाकर पटक दिया गया और बोले लो देखो बदमाश खुद को तुम्हारा पति बताता है। वैसे हमने अच्छी खबर ली है लेकिन दो चार हाथ तुम भी जमा दो तो फिर अच्छे से इसकी खबर लें। सुदामा की पत्नि बहुत हैरान परेशान हुई कि आखिर ये तमाशा क्या है?सुदामा पडे पडे कराह रहा था। उसने कनखियों से अपनी पत्नि की ओर देखा और ऑंखों ही ऑंखों में जैसे दया याचना की कि हे भागवान मुझे क्षमा कर दे मैं कहीं दूर भीख मॉंगकर पेट भर लूँगा, तेरे सामने कभी नही आऊँगा, बस अब की बार छोड दे। सुदामा की पत्नि चिल्लायी अरे कम्बख्तो क्या तुम्हारी ऑंखें फूट गयी हैं? ये तुम्हारे पण्डित जी नहीं तो ओर कौन है? लौग भुनभुनाये चार पैसे क्या आ गये दिमाग खराब हो गया है। ऑंख हमारी क्यों फूटेंगी ?ऑंख तो तुम दोनों की फूटी हैं जो बेकार में नौटंकी कर रहे हैं । चलो भई अपने घर चलो ये मिया बीबी का झगडा है, अपने आप सुलझ लेंगें। लोग अपने अपने घर लगे. इधर दोनों में कहना सुनना शुरू हो गया । सुदामा की पत्नि बोली ये तुम क्या जग हॅंसाई करा रहे हो? मुझे छोडकर कहॉं भागे जाते हो ? सुदामा गुर्राया मैं जग हँसाई करा रहा हूँ ? छिनाल पहले ये बता किसके साथ गुलछर्रे उडा रही है ? सुदामा की स्त्री रोने लगी हाय राम क्या पागल हो गये ऐसा बोलते तुम्हें जरा भी लाज नही आती है ? सुदामा ने कहा मुझे लाज नहीं आती ? तुझे आती है ? ये किसके बैठ गयी है? मेरी झोंपडी कहॉं है ? सुदामा की पत्नि बोली क्या बात करते हो ? तुम्हीं ने तो सब कारीगर भेजकर ये महल बनवाया है ? सुदामा बोला मैने बनवाया है? यही कहानी पडौसियों को सुनाती होगी? मुझे ये पटटी मत पढा मैं सब समझता हूँ । सुदामा की पत्नि हैरान परेशान हो गयी। उसकी समझ में नहीं आया कि माजरा क्या है ? फिर अचानक उसकी समझ में आया कि ये जरूर श्रीकृष्ण भगवान का किया धरा है। वो जरूर चुपके से मदद करना चाहते होंगे। अब आप सब समझ सकते हैं कि जब कोई अचानक अमीर होता है तो लोग यही कहते हैं सब भगवान की कृपा है वो जिसकी मदद करता है छप्पर फाडकर करता है। से अलग बात है कि लोग दबे जबान उसके काले कारनामों की भी चर्चा करते रहते हैं जिसमें उसका चाास चरित्र चित्रण होेेेता है। खैर हम किसी के चरित्र चित्रण के चक्कर में नहीं पडना चाहते हैं बस इतना बताते हैं कि हर समझदार पति की तरह सुदामा ने भी ये मान लिया की ये सब कृष्ण की लीला है। लीला करने में उसका पहले से ही बडा नाम था, एक लीला ये भी सही। ये अलग बात है कि सुदामा को उसने फूटी कोडी देना भी उचित नहीं समझा। लीला कोई सबके साथ थोडा की जाती है? फिर ये सब भगवान की कृपा है भगवान की मर्जी है आड़े वक्त में जो जैसे मदद कर दे वही भगवान होता है. इसलिए चुपचाप मान लेने में ही भलाई है .चुप रहूँगा तो समाज में इज्जत होगी रॉब दाब होगा .ज्यादा सवाल जबाब करूँगा तो घर से बाहर कर दिया जाऊँगा .आखिर ऐसा करने में परेशानी ही क्या है ? गाँव वाले पहले ही मुझे सुदामा नहीं मानते हैं .स्त्री कहेगी वो भी सुन्दर और पैसे वाली स्त्री तो फिर सबकी उसकी ही हाँ में हाँ मिलायेंगे मेरी कौन सुनेगा ? ज़माना इतना खराब है कि स्त्री के दो बूँद आंसू देखे और लोगों ने उसकी बातों को सच माना .कुछ तो ऐसे हराम होते हैं कि अपनी स्त्री को चाहे रोज पीटते हों लेकिन पराई औरत की नज़रों में आने के लिए नाहक ही भले आदमी को भी मरने पीटने लगते हैं .सुदामा ने चारों तरफ का खूब सोचा और समझदार आदमी की तरह चुप हो गया . .अब भक्तजनों सवाल ये है कि जब कृष्ण सुदामा के मित्र थे तो उसकी मदद खुलकर क्यूँ नहीं की? छुपकर क्यूँ की? वो तो खैर मनाओ उस जमाने में आयकर विभाग नहीं था नहीं तो काला धन रखने के आरोप में पकडकर ले जाते। माना आयकर विभाग नहीं था लेकिन कुछ गरीब सुदामा के बारे में तो सोचना था कि नही? बेचारा भुखमरी के कारण अपने आत्म सम्मान को मारकर तुम्हारे सामने हाथ फैलाने आया था लेकिन तुमने उसे अपना दुख बयान करने के दो बोल बोलने का भी मौका न दिया?कभी सोचा उस पर क्या गुजरी होगी? वो कितने तनाव में आ गया होगा? अगर कही हाईपर टेंशन से उसके दिमाग की नस फट जाती या हताश होकर कहीं नदी नाले में कूद कर आत्म हत्या कर लेता तो तुम्हारी गुमनाम मदद किस काम आती? मैं तो कहता हूँ कि जिसकी मदद करो भैया खुलकर करो, सबको बताकर करो। क्यों किसी के परिवार में चरित्र हनन के बीज बोते हो। सुन रहे हो ना मेरे मेहरबान। |
मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019
कृष्ण सुदामा की मैत्री कथा का पुनर्पाठ
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