सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

कविता -पर्यावरण सरंक्षण

पेड़ ना कटे कहीं पे
लोग ना बटें कहीं पे
आफतें जहाँ कहीं हों
मिल सभी डटें वहीं पे |
पेड़ ना कटे कहीं पे .....लोग ना बटें कहीं पे |

आसमां का कहर हो तो
झेल लेगें पेड़ सिर पे |
गर कुल्हाड़े काट देंगे
क्या करेंगे पेड़ गिर के ?
रो पड़ेंगे बस चिपट के
माँ सरीखी वो जमीं पे |
पेड़ ना कटे कहीं पे .....लोग ना बटें कहीं पे |

जो जहर भरा मनुज की
देह में है, गेह में है
बादलों के संग बहा
वो नेह में है मेंह में है |
और हवा पुरवा सुहानी
गीत जाती है यहीं पे |
पेड़ ना कटे कहीं पे .....लोग ना बटें कहीं पे |







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