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बुधवार, 8 अप्रैल 2020

उमर मेरा बेटा है


उमर मेरा बेटा है

वह कितना दुर्भाग्यशाली राष्ट्र होगा जिसके पास युवाओं के रूप में बस आज्ञाकारी, अनुयायी दिमाग भर होंगे

Hindi translation — 'Umar Khalid, my son' the article by Apoorvanand in 'Indian Express' — by Bharat Tiwari

“उमर मेरा बेटा है”, मैं यह कहना चाहता हूँ। मैं कभी उससे मिला नहीं हूँ। मैं उसे जानता नहीं हूँ। लेकिन फिर भी उसको अपना बेटा होने का दावा करना चाहता हूँ। मेरा कोई बेटा नहीं है।
वो एक विद्रोही ही होता है जो मानवता की मरम्मत करता है, उसे जंग लगने से बचाता है
मेरी सिर्फ एक बेटी है। बेटी जो जल्द ही उस उम्र की होने वाली है जहाँ सोच स्वतन्त्र हो जाती है। उमर ख़ालिद इस उम्र के आगे निकल गया है। उसकी सोच तो अब स्वतन्त्र और स्वायत्त हो चुकी है।  और दिल खून बहा रहा है दुनिया के सताये गयों पर, जल रहा है उनके साथ हुए अन्यायों पर, रो रहा है उनके साथ न्याय पर।

उमर वो बेटा है जिसकी इच्छा हर माँ-बाप को होनी चाहिए, जिस पर गर्व होना चाहिए। क्योंकि वो ही ऐसा है जो असहमत हो सकता है, जो उनसे विद्रोह कर सकता है और परिवार या समाज या धर्म की बनायी पहचान की चहारदीवारी तोड़ के बाहर आ सकता है – जिन सीमाओं को पार करने से लोग डरते है उनसे ऊपर उठ-के वो अपनी इंसानियत साबित कर सकता है।

और अगर उमर जैसा नहीं तो फिर युवाओं को कैसा होना चाहिये ? वह कितना दुर्भाग्यशाली राष्ट्र होगा जिसके पास युवाओं के रूप में बस आज्ञाकारी, अनुयायी दिमाग भर होंगे – युवक जो सिर्फ मोटी तनख्वाह की नौकरी के लिए लड़ें, जो उस मशीनरी के कलपुर्जे बनने को तैयार हों जो चन्द लोगों को फ़ायदा दे और बाकी मानवजाति को कुचल दे।

यह वही तबका है – जिसने अपनी आत्मा को आरामतलबी के हाथों बेच दिया है - जो फेसबुक और ट्विटर पर अपना राष्ट्रवाद दिखा रहा है। यही उन्हीं की भीड़ है, जो उमर से नाराज़ है क्योंकि उसने उनमें शामिल होने से इनकार कर दिया।

मुझे ग़लत न समझिएगा। मैं उमर को उसकी राजनीति या विचारधारा के कारण अपना नहीं कह रहा हूँ। वो मेरा ज़बरदस्त विरोध करेगा, मेरे सुधारवादी विचारों पर ताने मारेगा और लोकतंत्र से जुड़ी मेरी भोली उम्मीदों पर हंसेगा। मुझे बताया गया है कि वो एक परा-माओवादी है। मैं एक संशोधनवादी हूँ। एक संसदीय-दल का पूर्व कार्ड-धारक। मैं उसे उसके आंतरिक-विद्रोही के कारण स्वीकार करूँगा। विद्रोह करना अपनी इंसानियत की पड़ताल होती है। वो एक विद्रोही ही होता है जो मानवता की मरम्मत करता है, उसे जंग लगने से बचाता है।

“विद्रोही क्या होता है? एक इंसान जो ‘ना’ कहता है, लेकिन उसके इनकार में नामंज़ूरी नहीं होती। विद्रोह के अपने पहले क्षण से वो हाँ कहने वाला इंसान भी है” —  अल्बर्ट कामू1 विद्रोही में गुस्सा होता है असंतोष नहीं; वो व्यक्तिगत अभाव की भावना से ग्रस्त नहीं होता। असंतोष से ईर्ष्या उपजती है — वो ईर्ष्या जो तब होती है - जब कोई यह सोचता है कि दूसरे के पास ऐसा कुछ है जो उसके पास नहीं है। विद्रोही की भावनाओं में ईर्ष्या और असंतोष नहीं दर्द और पीड़ा होती है। विद्रोही में “दूसरों” से जुड़ जाने की क्षमता होती है, वह उनकी पीड़ा में डूब के ख़ुद पीड़ित होता है। वो आंसूओं की नदी में तैर कर अपने अपनी सलीब को वृहत कर लेता है। लेकिन उसमें कटुता नहीं होती क्योंकि वह स्वार्थी नहीं होता है, वह व्यक्तिगत अभाव की भावना से प्रेरित नहीं होता है।

उमर नाम से उमर है, लेकिन वह एक मुसलमान नहीं है। उसके पिता और परिवार मुसलिम धर्म को मानने वाले हैं। कभी उसके पिता स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के सदस्य थे। लेकिन उमर ने अपने पिता की राह नहीं चुनी। वह राजनीति उसकी नहीं है जो सिर्फ मुसलमानों की चिंता करती हो। परिवार से नाता तोड़ वो एक नास्तिक और एक परा-माओवादी बन गया। यहाँ तक कि उसने लैंगिक समानता और दलितों के प्रति असंवेदनशीलता के चलते अपने संगठन तक से इस्तीफा दे दिया।

उमर निरंतर वाम-गामी इंसान बन के उभरा है।

मगर वाम, एक मायावी विचार और एक न-हासिल होने वाला अंत है। उमर इसी विचार की खोज में है। मैं उसे रोकूंगा नहीं, क्योंकि हो सकता है ये खोज कुछ नया पैदा कर दे, कुछ ऐसा जो शायद हम नहीं बना पाए हों। यह खोज हमारे लिए मूल्यवान है क्योंकि यह किसी पुरानी उम्मीद तक सीमित नहीं है।

विद्रोही की ‘हाँ’ उसके प्यार से नज़र आती है, प्यार उनके लिए जिन्हें वह व्यक्तिगत रूप से जानता भी नहीं, प्यार उनके लिए जिनके साथ अन्याय हुआ हो, जिन्हें सताया गया हो, जो इतिहास के गलत वाले हिस्से के हों। कामु इसे अजब-प्यार कहते हैं। ये नफ़ा नुकसान नहीं देखता। इसमें शक़ की गुंजाइश नहीं होती। ऐसा प्यार करने वाला विद्रोही अपने भविष्य की परवाह नहीं करता। दार्शनिकों के अनुसार सिर्फ मानव ही भविष्य की कल्पना कर सकता है।लेकिन एक विद्रोही अपने कल के लिए योजना बना कर नहीं चलता। वो अपना सब कुछ आज को दे देता है, वर्तमान में ज़िन्दा लोगों को । विद्रोही पर अपने शोध के निष्कर्ष में कामु कहते हैं कि वर्तमान को अपना सब कुछ दे कर हम भविष्य के प्रति अपनी “असली उदारता” दिखा सकते हैं।

उमर एक सुरक्षित भविष्य चुन सकता था। वो यह तर्क दे कर अपनी बात को जायज सिद्ध कर सकता था कि ऐसा करने से ही वो अपनी-राजनीति को ठीक से आगे बढ़ा पायेगा। लेकिन उसने असुरक्षा चुनी।

उमर ख़ुद को असीम देखता है। वो राष्ट्रीयताओं में कैद नहीं रहना चाहता। वो मुझे राशल कोरीकी याद दिलाता है, अमरीका की वो युवती, जो अपने घर कोलंबिया से दूर, बहुत दूर, एक फिलिस्तीनी घर को बुलडोज़र से बचाने के लिए इसरायली टैंक के सामने आ खड़ी हुई थी। वह अपने देश के हितों के खिलाफ काम कर रही था। जिसकी क़ीमत उसे अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी। इजरायली टैंक ने अपने सहयोगी राष्ट्र के नागरिक को भी नहीं बख्शा। भले ही हम उनसे डरें, साधारण राष्ट्रीय अस्तित्वता के शुद्धिकरण के लिए हमें और बहुत उमर और कोरी के होने की आवश्यकता है।

उमर जेएनयू में अपने दोस्तों के बीच वापस आ गया है। आप उसे, स्पष्ट सुन सकते हैं। वह कोई कायर नहीं है; उसमें इस ख़फा राष्ट्र का सामना करने की हिम्मत है। यहाँ सवाल यह है, क्या हम उसकी आँख से आँख मिला कर उसे देख सकते हैं? हम जो पिछले दस दिनों से अंतरजाल-जगत में उसको अपमानित होता और मारा जाता देख रहे हैं?

हम ऐसा नहीं कर सकते कि हम गाएं काज़ी नज़रूल इस्लाम की ‘बिद्रोही’ और उमर से दूर भागें। उमर, कन्हैया और उनके दोस्तों को, भारत की “देशभक्ति” के जीवित रहने का मोल, अपने खून से चुकाना है। अगर हमारी आवाज़ों में सच्चाई है, हमें उनको अपना कहने की ऐलान करना होगा।

उस देश के लिए यह शोक की बात होगी जो अपने हर उमर और कन्हैया का साथ नहीं देता, जो उनके द्वारा दी गयी चुनौती न सह सके, जो उनको सवालों के पूछने के कारण सज़ा दे। हम उनका बलिदान न करें।

ख़ुद को उनसे दूर न करें। अपने बच्चों की हत्या न करें।

Translation : Bharat Tiwari
अनुवाद: भरत तिवारी

'प्राफुल चाकी' और 'खुदिराम बोस' 30 अप्रैल 1908

भगत सिंह पर चले मुकदमे (जिसमे उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी थी ) को "लाहौर षड्यंत्र केस -१९२९ के नाम से भी जाना जाता है ,, इस मामले को त्वरित गति से निपटाने के लिए तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन ने ०१ मै १९३० को आपातकाल की घोषणा के साथ एक अध्यादेश भी जारी किया था ,जिसे लाहौर षड्यंत्र मामला अध्यादेश संख्या-३ -१९३० के नाम से जाना जाता है I 'लाहौर षड़यंत्र केस' पाँच मई 1930 को शुरू हुआ ये मुकदमा 11 सितंबर 1930 तक चला था और ०७ अक्तूबर १९३० को सजा सुनाई गयी थी Iपहले से तय समय के अनुसार भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव को फांसी देने का दिन 24 मार्च 1931 तय था किन्तु अचानक इसे बदल कर ११ घंटे पहले ही फांसी दे दी गयी थी ( २३ मार्च १९३१ , शाम को ७.३० बजे ,लाहौर जेल में )



बिहार कि राजधानी अज़ीमाबाद(पटना) के मुजाहिदे आज़ादी 'अहमदुल्लाह' से प्रेरित होकर पंजाब के मुजाहिदे आज़ादी 'अबदुल्लाह' ने कलकत्ता हाई कोर्ट के जज 'JP नारमन' का क़त्ल 1871 मे कर दिया , और ख़ैबर का एक पठान 'शेर अली अफ़रीदी' ने तो 8 फ़रवरी 1872 मे 'र्लाड मायो' को क़त्ल कर डाला जो उस वक़्त का 'वाईसराय' था और इनसे प्रेरित होकर बंगाल के 2 लाल 'प्राफुल चाकी' और 'खुदिराम बोस' 30 अप्रैल 1908 को मुज़फ़्फ़रपुर(बिहार) मे जज 'किँगर्फोड' को क़त्ल करने निकले पर ग़लत जगह हमला करने कि वजह कर जज बच गया और उसकी बेटी और पत्नी मारी गईं. खुदीराम बोस तो मुज़फ्फरपुर में पकडे गए पर प्रफुल्ला चाकी रेलगाड़ी से भाग कर मोकामा पहोंच गए. पर पुलिस ने पुरे मोकामा स्टेशन को घेर लिया था दोनों और से गोलियां चली पर जब आखिरी गोली बची तो प्रपुल्ला चाकी ने उसे चूमकर ख़ुद को मार लिया और शहीद हो गए , पुलिस ने उनके शव को अपने कब्जे लेकर उनके सर को काटकर कोलकत्ता भेज दिया ,वहां पर प्रफुल्ला चाकी के रूप में उनकी शिनाख्त हुई । ये बात उस वक़्त की है जब चंद्रशेखर आजाद सिर्फ 2 साल के थे. 'प्रफुल्ल चाकी' से ही प्रेरित हो कर 'चंद्रशेखर आज़ाद' ने ख़ुद को अंग्रेज़ो के हवाले ना करके 27 फ़रवरी 1931 को ख़ुद को गोली मार ली और शहीद हो गए पर अंग्रेज़ के हाथ नही आए frown emoticon

कमाल अतातुर्क पाशा  ने 1920 में टर्की की    सत्ता   संभाली  और  इस्लाम  को   राज   धर्म   से   खारिज   कर   देश   को   धर्म   निरपेक्ष राष्ट्र    घोषित   कर   दिया   .
बहुविवाह ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही पतियों से यह कहा गया कि वे अपनी पत्नियों के साथ ढोरों की तरह-व्यवहार न करके बराबरी का बर्ताव रखें।
वो सन उन्नीस बीस से सैंतीस का समय था जब विश्व समानता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व् की राह पर डगमगाता हुआ बढ़ रहा था लेकिन कमाल अतातुर्क पाशा  के नेतृतव में तुर्की ने ऐसी सरपट दौड़ लगाई कि वो इस्लामी कट्टरवाद तथा अंध आस्था कि अंधी गलियों से निकलकर विश्व के प्रगतिशील आधुनिक राष्ट्रों की कतार में खड़ा हो गया .
लेकिन आश्चर्य की देखिये टर्की उस सुनहरे पथ को छोड़कर फिर उन्हीं अंधी गलियों में लौट रहा है जिसने उसे यूरोप के 'बीमार राष्ट्र' का तमगा दिया था.
 तुर्की के राष्ट्रपति तैय्यप एरदोगन ने महिलाओं के संबंध में एक विवादित बयान दिया है। लैंगिक समानता और परिवार नियोजन कार्यक्रमों को इस्लाम विरोधी बताते हुए तैय्यप ने कहा कि महिलाएं बच्चा पैदा करने के लिए ही होती हैं। एरदोगन ने मुसलमानों से परिवार नियोजन या जनसंख्या नियंत्रण के कार्यक्रमों में शामिल नहीं होने की बात भी कही।

एरदोगन ने ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने को मुसलमानों के लिए पवित्र कार्य बताया। उन्होंने कहा कि परिवार नियोजन की पश्चिम की देन है। इसमें किसी भी मुस्लिम परिवार को शामिल नहीं होना चाहिए। यह अल्लाह का काम है और इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।

महिलाओं ने की आलोचना
महिला संगठनों और विपक्षी नेताओं ने एरदोगन के इस बयान की आलोचना की है। सभी का कहना है एरदोगन का यह बयान लैंगिक समानता के खिलाफ है। एरदोगन इसतरह के बयान पहले भी दे चुके हैं, उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को राजद्रोह करार दिया था।

इस्लाम  में औरतों     के अधिकारों     को सबसे      बेहतर     बताने    वाले  और  छाती पीट पीट कर   इस्लाम   की हिमायत  करने  वाले मुसलमान  इस सनकी राज नेता को इस्लाम से खारिज क्यों नहीं कर देते हैं ? 
मथुरा में भूमाफियाओं द्वारा पुलिस वालों की हत्या किये जाने के बाद जमीन पर अवैध कब्जे की समस्या को जानने समझने की बहुत जरुरत है. अगर ये भूमाफियां इतने शक्तिशाली हो गए हैं कि सरकारी सशस्त्र बलों को सीधे चुनौती दे रहे हैं तो इससे उस हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है जिसमें आम आदमी इन दबंगों से त्रस्त रहते हुए अपनी जिंदगी गुजारता है .कीमती जमीन वो सरकारी हो या निजी उस पर कानून व्यवस्था को अपनी रखैल समझने वाले भूमाफिया गिद्ध दृष्टि रखते हैं . यूँ बेघर गरीब लोग भी यहाँ वहाँ सरकारी जमीन पर अवैध तरीके से अपनी झुग्गी झोंपड़ी डालकर गुजर बसर करते हैं लेकिन उन्हें साल छ महीने में उजड़ते बसते रहना पड़ता है. स्थायी कब्ज़ा वो तभी कर पाते हैं जब कोई वोटों का सौदागर उन्हें शह देता है .जमीन पर कब्जे का काम बाहुबलियों और सत्ता के नजदीकी छोटे बड़े नेताओं का काम है. इसके पीछे भ्रष्ट अफसरों की भी पूरी सपोर्ट रहती है .पीड़ित इनसे इतना परेशान रहता है कि उसकी जान माल हमेशा खतरे में रहती है .
लेकिन भूमाफियों की एक और भी किस्म है जो अपने कारोबार को धर्म की ओट में आगे बढाती है .ये जो सडकों, चौराहों, तिराहों पर या किसी मोड़ पर या किसी पेड़ के तले मजार, दरगाह, भूमाता, काली माई का चौबारा या लाल सिंदूर लिपटे बजरंग बली या त्रिशूल उठाये जटाजूट बढ़ाये महादेव मिलते हैं इनमें ज्यादातर भूमि पर अवैध रूप से काबिज हैं .इनकी आड़ में तमाम तरह के कारोबारी भी अवैध कब्ज़ा किये हैं .ये विकास का रास्ता रोककर बैठ जाते हैं .इनकी वजह से सड़क चौड़ी और सीढ़ी नहीं होती है चाहें ऐसा न होने के कारण कितने ही एक्सीडेंट हों, कितने ही लोगों की जान चली जाए लेकिन क्या मजाल जो बजरंग बली जरा से टस से मस हो जाएँ . क्या मजाल जो मजार में चैन से सोते हुए की नींद में खलल पड़ जाए . भला कोई पूछे इतने शौर शराबें में कहीं सोया जाता है या भक्ति की जाती है ? लेकिन नहीं हजरते दाग जहाँ बैठ गए बैठ गए .
सरकार को चाहिए इन पीरों, फकीरों की मजारों और दरगाहों, इबादतगाहों ,मठों, चौबारों ,मंदिरों, गुरुद्वारों की जमीनों की वैधता की जांच कराये और जहाँ भी अतिक्रमण पाये तत्काल इन्हें ध्वस्त कर दे. ये मंदिर, ये मस्जिद, ये दरगाह, ये इबादतगाह इंसान को जिंदगी देने के लिए हैं, इंसान की जान लेने के लिए नहीं हैं, इसलिए अगर कहीं भी इनके होने से इंसान की जान पर बन आती है तो इनकी वहाँ कोई जरुरत नहीं है .इन्हें तत्काल हटा देना चाहिए .इंसान काम इनके बगैर भी मजे में चल सकता है .

रविवार, 5 अप्रैल 2020

हमारे कस्बे की रामलीला

हमारे कस्बे में बहुत पहले से रामलीला होती रही है। मैंने रामकथा की बेसिक जानकारी रामलीला देखकर ही प्राप्त की है।महाभारत की कथा का ज्ञान महाभारत सीरीयल से मिला  है। यद्यपि साहित्य की बहुत सी किताबें पढकर भी इन धार्मिक कथाओं को जानने समझने का प्रयास किया है लेकिन मैं समझता हूँ मेरी तरह ही ज्यादातर आम आदमियों ने रामायण और महाभारत की महागाथा को ऐसे ही देख सुनकर जाना है। मूल ग्रन्थों का अध्ययन कर जानने समझने वाले लोग चन्द विद्वान  ही रहे हैं, आम जनता नही है। मैं समझता हूँ इस दृष्टि से रामलीला का मंचन बहुत सार्थक है। महाभारत,रामायण टी वी सीरियल हो या रामलीला इसके सरस और जीवंत प्रदर्शन के दर्शन कर अहिन्दू भी इन महान गाथाओं से उतना ही परिचित हो जाता  है जितना एक हिन्दू  होता है।
  हमारे यहाँ बरसों तक एक खास मुस्लिम परिवार द्वारा ही भगवान श्रीराम की आरती कर रामलीला का शुभारम्भ किया जाता रहा है। कभी भी किसी ने भी उनके अहिन्दू म्लेच्छ होने पर ध्यान नहीं दिया और एक पारिवारिक सदस्य की तरह ही उन्हें मान दिया जाता है।
 मेरे मन में बराबर ये सवाल उठता रहा है कि जिस तरह हम महाभारत और रामायण की महागाथा से सहज रूप से परिचित हैं उसी प्रकार इस्लाम धर्म और कर्बला, हुसैन और यजीद की मूल गाथा से क्यूँ परिचित नहीं हैं?  यह कितने शर्म की बात है कि इस्लाम के मानने वाले हमारे पड़ौसी अपने धार्मिक त्यौहार परम्परागत तरीके से मनाते आ रहे हैं और हम उस परम्परा और विश्वाश से नितान्त अपरीचित हैं। मौहर्रम और ताजिये क्या हैं ? ईद और बकराईद के मनाने का क्या कारण है क्या सही इतिहास  है?इमाम हुसैन और अन्य इस्लामिक महापुरूषों और इस्लामी रीति रिवाजों का क्या मूल रूप और इतिहास है? ये हम नहीं जानते हैं| क्या इस सर्वत्र व्यापि  अज्ञानता और अजनबीपन को खत्म नहीं किया जाना चाहिये ?
 अगर हम इस्लाम सहित सभी धर्मों की सही और पूर्ण जानकारी रखेंगे तो समाज में परस्पर नासमझी से होने वाले अन्तरकलह से मुक्ति मिल जायेगी। कम से कम अपने पड़ोसियों के धार्मिक विश्वाश, आस्था और गाथा का तो हमें ज्ञान  होना ही चाहिये।

बुधवार, 19 सितंबर 2018

संघ प्रमुख मोहन भागवत का संबोधन एक साँस्कृतिक संगठन के प्रमुख से ज्यादा एक चतुर राजनेता का बयान नजर आता है। उनके बयान में कान्ग्रेस के प्रति जिस सदभावना का प्रदर्शन हुआ है उससे कान्ग्रेस की वापसी और भाजपा की रवानगी की आहट स्पष्ट सुनायी दे रही है।कांग्रेस के प्रति सदभाव और संविधान में निष्ठा की बात कहकर वे अपना भविष्य वैसे ही सुरक्षित करना चाहते हैं जैसे वे नेहरू पटेल और इन्दिरा गाँधी के समय में कलाबाजी करते हुये कर चुके हैं।
 किसी भी संगठन को संविधान के दायरे में रहकर काम करने का पूरा हक है और संघ अगर ऐसा करना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है| लेकिन संघ समर्थित,प्रेरित जो असंवैधानिक कुकृत्य उससे जुड़े संगठनों और व्यक्तियों द्वारा किये गये हैं उनकी जिम्मेदारी कौन  लेगा? क्या उन्हें यूँ ही भुला दिया जाएगा ?केन्द्र में बनने वाली नयी सरकार की तैयारी में जुटी कांग्रेस को इस संबध में ठोस कार्यवाही का आश्वाशन जनता को देना होगा वरना जनता के बीच कांग्रेस की विश्वश्नीयता  को संदिग्ध बनाने का दाँव संघ प्रमुख ने चल दिया है जो कांग्रेस को नुकसान जरूर पहूँचायेगा। राहुल गाँधी द्वारा वैसे भी लगातार भक्ति भाव का प्रदर्शन करते रहने से उनकी खानदानी धर्मनिरपेक्ष होने की  छवि चटक रही है। मोदी से बड़ा हिन्दू दिखने की उनकी कौशिश ने उनकी नेहरूवादी धर्मनिरपेक्ष, उदार, लोकतांत्रिक,प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच वाले युवा की बन सकने वाली छवि की संभावनाओं को समाप्त कर दिया है। आज नेहरूवादी सोच के लोग बहुत निराश हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि हमें कहाँ जाना था और हम कहाँ आ गये हैं ? क्या  हमारे स्वतत्रता सेनानियों ने ऐसा भारत  बनाने का  सपना देखा था जहां  हर बड़ा  नेता जनता  की  समस्याओं  से  मुंह  मोडकर राम, शिव  य़ा  विष्णु  भगवान का  कीर्तन करने  में  लीन  है ? हमें वैज्ञानिक सोच, उदार और धर्म निरपेक्ष, सर्वसमावेशी  समाज का निर्माण करना था दुनिया में अमेरिका रूस जापान जर्मनी फ़्रांस और ब्रिटेन जैसे प्रगतिशील देशों से आगे जाना था किन्तु हम उस रास्ते से मुँह मोड़कर पीछे की ओर सरपट दौड़ रहे हैं | मध्यकाल से होते हुए प्राचीन काल की महान संक्राति और सभ्यता की ओर जहाँ यज्ञ का धूम उठ रहा है ,राक्षसों की मृत देह अग्निदा हो रही हैं | म्लेच्छ मारे जा रहे हैं आदिवासी वनवासी कराह रहे हैं | गायों को लूटने और बचने के लिए लोग मारे जा रहे हैं ये कैसा महान भारत है जिसके निर्माण का हमें सपना दिखाया जा रहा है |
        

रविवार, 16 सितंबर 2018

'अटल चारण भाटगीरी रोजगार योजना'

सरकार द्वारा 'अटल चारण भाटगीरी रोजगार योजना' प्रारम्भ की गयी है जिसमें इच्छुक तलवा चाटू मंचीय कवि और गाल बजाऊ गज़लकार सौ दिन का रोजगार पा सकते हैं। इन तलवा चाटू कवियों और गाल बजाऊ गजलकारों को अपनी खीस निपोरू प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुये घूम घूम कर भगवा दुष्प्रचार प्रचार करना है। बिना नागा दुष्प्रचार करने वाले चारण कवि को 'भगवा भाट शिरोमणी' पुरस्कार से अपमानित किया जायेगा। साहित्य का सत्यानाश करने को उद्धत तुकबाज कभी भी इस योजना में शामिल हो सकते हैं। जनता द्वारा उनकी मोब लिचिंग से सुरक्षा की सरकार कोई गारन्टी नहीं लेती है| अत: जो भी वाग्वीर आयें वो अपने रिस्क पर आयें, अपनी आत्मा से पूछकर आयें।

रविवार, 9 सितंबर 2018

आलेख - क्या हम मनोरोगी हैं ?

'इतने इल्जाम मुझ पर लगाए गए, बेगुनाही का अंदाज जाता रहा'


 फेसबुक ने लिखने की वास्तविक आजादी दी है | पहले कविताएं लिखते और गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में जाकर पढ़ आते थे | लेकिन उस सबसे मन उछट गया | कारण बहुत से थे लेकिन मुख्य कारण यही था कि लोग चाहते थे कि कविता के स्वर बागी न हों, वे राष्ट्रवादी हों या सिर्फ  वैयक्तिक राग विराग के हों | समाज की तल्ख़ सच्चाईयों को कविता में न लिखा जाए और न ही सांप्रदायिक और अंधराष्ट्रवादी एजेंडें का विरोध किया जाए | यही लोग कविता के कारोबारी भी हैं तो इनसे वैसे भी नहीं बनती थी | जब भी शोषित उत्पीड़ित जनों की आवाज उठाई लोगों ने कहा तुम कम्युनिष्ट  हो ? जब भी लेखकों, बुद्धिजीवियों, आदिवासियों की हत्या या उत्पीड़न का विरोध किया कहा गया तुम नक्सली हो ? जब भी रोहित वेमुला जैसे होनहार विद्यार्थियों के पक्ष में लिखा कहा गया तुम दलित हो ? अल्पसंखयकों   से   भेद भाव  के   विरुद्ध   लिखा   तो  कहा  गया  तुम  मुसलमान  हो ? फ़िलस्तानियों  के  पैकः  में  लिखा  तो  कहा  गया  तुम  अरबी  भेड़ों  के  गुलाम  हो  ? महिला और नाबालिग बच्चियों के यौन उत्पीड़न के विरोध में लिखा कहा गया तो कहा गया तुम चुप रहो तुम्हारे भी घर में बेटियाँ हैं | एल जी बी टी के अधिकारों के पक्ष में लिखा तो कहा गया तुम गे हो ? किसानों /मजदूरों के पक्ष में आवाज उठायी तो कहा गया कि तुम ए सी में बैठकर मेहनतकशों की बात करने वाले कौन होते हो ?
 उनका आशय यह है कि आप तभी किसी के पक्ष में बोल या लिख सकते हैं जब आप स्वयं वह हैं | अब ये समझ से बाहर है कि बच्चों के हक़ में लिखे तो बच्चे कैसे बनें ? औरतों के हक़ में लिखें तो औरत कैसे बने ? सरहद पर मर रहे सैनिक या मोब लिन्चिग में  मारे जा रहे व्यक्ति  के पक्ष में बोलें तो मर कैसे जाएँ और अगर मर भी जाएँ तो फिर बोलेंगे कैसे ?
 लोगों के कुतर्कों का कोई जबाब नहीं हैं | कह रहे हैं कि समलैंगिकों को उत्पीड़न से सुरक्षित करने का फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज समलैंगिक हैं | कल अगर वो किसी कथित आतंकवादी या नक्सली को  आरोपों से बाइज्जत बरी कर देंगे तो यही लोग जजों को आतंकवादी और नक्सली बता सकते हैं | न्यायपालिका इनके अनुकूल फैसला दे तो बल्ले बल्ले है वरना वो देशद्रोही, धर्मद्रोही ,समाजद्रोही है|  इसलिए  उसके फैसले को कानून बनाकर पलट देना चाहिए | हम न्यायपालिका का सम्मान करते हुए भी नक्सली, असामाजिक ,देशद्रोही और मनोरोगी हैं|  वे कानून और संविधान की धज्जियां उड़ाकर भी देशभक्त हैं? लोगों को जाति और धर्मों  के आधार पर उत्पीड़ित करके भी सामाजिक हैं? मंदिरों और मदरसों में लड़के और लड़कियों का शारीरिक शोषण करके भी धार्मिक हैं ? बेकसूर आदमी और बेजुबान  जानवरों का क़त्ल करके भी अहिंसक और दयालु हैं ? देश, धर्म, जाति ,भाषा, क्षेत्र ,वेश,खान पान को लेकर कुंठित ये लोग मनोरोगी नहीं हैं, हम मनोरोगी हैं | हम जो समाज में सबके लिए समता और सम्मान चाहते हैं | हम जो देश, धर्म, जाति ,भाषा, क्षेत्र ,वेश,खान पान को लेकर किसी से नफ़रत नहीं करते हैं | हम जो जियो और जीने दो के सिद्धांत में यकीन करते हैं| हम मनोरोगी हैं |