आज आदमी एक किताब सा, बस ऊपर से सजा हुआ है ।
भीतर, जो भी हो, जैसा भी,पर बाहर से सधा हुआ है।।
कथ्य, कथानक रहा उपेक्षित ,
भाव, भावना, शिल्प अलक्षित,
किसको फुर्सत ,पढे खोलकर,इसमें क्या- क्या लिखा हुआ है।
आज आदमी एक किताब सा ,बस ऊपर से सजा हुआ है । 1।
जाने कितने दर्द सम्भाले,
मन में नये-नए भ्रम पाले
रिश्तों -रिश्तों, गुणा- भाग की, एक इकाई बना हुआ है ।
आज आदमी एक किताब सा, बस ऊपर से सजा हुआ है । 2।
जिल्द न जाने कब खुल जाये
एक -एक पन्ना उड जाये,
कैसे इसे समेटे रक्खूं , इसी जुगत में लगा हुआ है ।
आज आदमी एक किताब सा, बस ऊपर से सजा हुआ है। 3।
टूट रहे रथ संकल्पों के,
खोकर तेज हवा के झोंके,
फिर भी ऑंखों में उम्मीदों का, एक तॉंता लगा हुआ है।
आज आदमी एक किताब सा,बस ऊपर से सजा हुआ है ।4।
-यशपाल कौत्सायन
Alpha
اندر، جو بھی ہو، جیسا بھی، پر باہر سے سدھا ہوا ہے ..
كتھي، كتھانك رہا محروم،
احساس کمتری شلپ الكشت
کس کو فرصت، پڑھے کھول کر، اس میں کیا - کیا لکھا ہوا ہے.
آج آدمی ایک کتاب سا، بس اوپر سے سجا ہوا ہے. 1.
جانے کتنے درد سنبھالے،
من میں نئے - نئے بھرم پالے
رشتوں - رشتوں، گنا - حصہ کی ایک یونٹ بنا ہوا ہے.
آج آدمی ایک کتاب سا، بس اوپر سے سجا ہوا ہے. 2.
جلد نہ جانے کب کھل جائے
ایک - ایک پاس اڈ جائے
کس طرح اسے سمیٹے رككھو، اسی جگت میں لگا ہوا ہے.
آج آدمی ایک کتاب سا، بس اوپر سے سجا ہوا ہے. 3.
ٹوٹ رہے رتھ وعدوں کے،
کھو تیز ہوا کے جھونکے
پھر بھی آنکھوں میں امیدوں کا، ایک تتا لگا ہوا ہے.
آج آدمی ایک کتاب سا، بس اوپر سے سجا ہوا ہے .4.
- یشپال كوتسياين


जवाब देंहटाएं1-Vinod Passy bahut sundar hai yeh rachna. share karne ke liye dhynavad
2-Amit Raaj like this
Rekha Gupta bahut khoob