बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

आदमी एक किताब



आज आदमी एक किताब सा,  बस पर से सजा हुआ है ।
भीतर, जो भी हो, जैसा भी,पर बाहर से सधा हुआ है।।

कथ्य, कथानक रहा उपेक्षित ,
भाव, भावना, शिल्प अलक्षित,

किसको फुर्सत ,पढे खोलकर,इसमें क्या- क्या लिखा हुआ है।
आज आदमी एक किताब सा ,बस पर से सजा हुआ है । 1।

जाने कितने दर्द सम्भाले,
मन में नये-नए  भ्रम पाले

रिश्तों -रिश्तों, गुणा- भाग की, एक इकाई बना हुआ है ।
आज आदमी एक किताब सा, बस पर से सजा हुआ है । 2।

जिल्द न जाने कब खुल जाये
एक -एक पन्ना उड जाये,

कैसे इसे समेटे रक्खूं , इसी जुगत में लगा हुआ है ।
आज आदमी एक किताब सा, बस पर से सजा हुआ है। 3।

टूट रहे रथ संकल्पों के,
खोकर तेज हवा के झोंके,

फिर भी ऑंखों में उम्मीदों का, एक तॉंता लगा हुआ है।
आज आदमी एक किताब सा,बस पर से सजा हुआ है ।4।
                                      -यशपाल कौत्सायन  


Alpha
آج آدمی ایک کتاب سا، بس اوپر سے سجا ہوا ہے.
اندر، جو بھی ہو، جیسا بھی، پر باہر سے سدھا ہوا ہے ..

كتھي، كتھانك رہا محروم،
احساس کمتری شلپ الكشت
کس کو فرصت، پڑھے کھول کر، اس میں کیا - کیا لکھا ہوا ہے.
آج آدمی ایک کتاب سا، بس اوپر سے سجا ہوا ہے1.

جانے کتنے درد سنبھالے،
من میں نئے - نئے بھرم پالے
رشتوں - رشتوں، گنا - حصہ کی ایک یونٹ بنا ہوا ہے.
آج آدمی ایک کتاب سا، بس اوپر سے سجا ہوا ہے2.

جلد نہ جانے کب کھل جائے
ایک - ایک پاس اڈ جائے
کس طرح اسے سمیٹے رككھو، اسی جگت میں لگا ہوا ہے.
آج آدمی ایک کتاب سا، بس اوپر سے سجا ہوا ہے3.

ٹوٹ رہے رتھ وعدوں کے،
کھو تیز ہوا کے جھونکے
پھر بھی آنکھوں میں امیدوں کا، ایک تتا لگا ہوا ہے.
آج آدمی ایک کتاب سا، بس اوپر سے سجا ہوا ہے .4.
                                       - یشپال كوتسياين

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