लड़कियों के बारे में फैसला करने के लिए हरियाणा में सर्व खाप पंचायत बैठी है.कई सवाल खड़े हो गए हैं. सबसे पहला सवाल तो यही है कि क्या ये वाकई में सर्व खाप पंचायत है ? वस्तु स्थिति तो यही है कि यह जात विशेष की महा पंचायत है जो जोर जबरदस्ती से सारे समाज पर अपने फैसले थोपती है.बाकी जातियों को उनके फैसले के अनुसार सर झुकाकर जीना है.एन डी टी वी पर इस विषय पर बहस में कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाये गए .ये सवाल खाप पंचायतों के प्रतिनिधि ने भी उठाये लेकिन माहौल इस तरह का रहा कि उन्हें अपनी बात ठीक से रखने ही नहीं दी गयी. उन्होंने कहा कि जो लोग संविधान और विधान कि दुहाई देती हैं उन्हें ये समझ लेना चाहिए कि संविधान और विधान समाज के लिए होते हैं, समाज उनके लिए नहीं हैं. वक्त के साथ उसमें परिवर्तन होते रहते हैं .अगर ऐसा न होता तो संविधान में इतने सारे संशोधन नहीं होते |अगर समाज को कुछ गलत लगता है तो वो उसे नकार देगा भले ही आप कुछ भी क़ानून बना लीजिये .उनहोंने उदाहरण देते हुए कहा कि लव इन रिलेशन शिप का क़ानून है, हमारा समाज उसे नहीं मानता है. समलैंगिकता को अवैध न मानने का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है हमारा समाज नहीं मानता है. आप इसे सही माने या गलत हम अपने समाज को अपनी परम्पराओं से चलायेंगें.
لڑکیوں کے بارے میں فیصلہ کرنے کے لئے ہریانہ میں سرو کھاپ پنچایت بیٹھی ہے. کئی سوال کھڑے ہو گئے ہیں. سب سے پہلا سوال تو یہی ہے کہ کیا یہ واقعی میں سرو کھاپ پنچایت ہے؟ چیز حالات تو یہی ہے کہ یہ ذات خاص کی مہا پنچایت ہے جو زور زبردستی سے سارے سماج پر اپنے فیصلے تھوپتي ہے. باقی ذاتوں کو ان کے فیصلے کے مطابق سر جھکا کر جینا ہے. این ڈی ٹی وی پر اس موضوع پر بحث میں کچھ بہت ہی اہم سوال اٹھائے گئے. یہ سوال کھاپ پنچایتوں کے نمائندے نے بھی اٹھائے لیکن ماحول اس طرح کا رہا کہ انہیں اپنی بات ٹھیک سے رکھنے ہی نہیں دی گئی. انہوں نے کہا کہ جو لوگ آئین اور قانون ساز کہ دہائی دیتی ہیں انہیں یہ سمجھ لینا چاہئے کہ آئین اور قانون ساز سماج کے لئے ہوتے ہیں، سماج ان کے لئے نہیں ہیں. وقت کے ساتھ اس میں تبدیلی ہوتے رہتے ہیں. اگر ایسا نہ ہوتا تو آئین میں اتنے سارے ترمیم نہیں ہوتے | اگر سماج کو کچھ غلط لگتا ہے تو وہ اسے رد کر دے گا چاہے آپ کچھ بھی قانون بنا لیجیے. انهونے مثال دیتے ہوئے کہا کہ لو ان رلیشن والی کا قانون ہے، ہمارا سماج اسے نہیں مانتا ہے. ہم جنس پرستی کو غیر قانونی نہ ماننے کا سپریم کورٹ کا فیصلہ ہے ہمارا سماج نہیں مانتا ہے. آپ اسے درست مانے یا غلط ہم اپنے سماج کو اپنی پرمپراو سے چلايےگے.
کھاپ پنچایت کے نمائندے نے اپنے دلائل مؤثر طریقے سے رکھیں اور تمام مقرر صرف تمتماكر چلانے کے علاوہ کچھ نہیں بول سکے. تمام لوگ ایک ہی بات کہے جا رہے تھے کہ کیا پندرہ سال کی لڑکی کی شادی کر دینے کی عصمت دری بند ہو جايےگے؟ کیا شادی شدہ عورتوں کے ساتھ زیادتی نہیں ہوتے ہیں؟ کیا الپويسك بچیوں کے ساتھ عصمت دری نہیں ہوتے ہیں؟ شادی کی عمر کو کس حد تک کم کریں گے؟ سب سے بڑی دلیل ہے کہ کیا شادی ہی اہم ہے؟ کیا لڑکی کو قابل ہونے کے لئے ایک بڑی عمر کہ ضرورت نہیں ہے؟
کھاپ کے نمائندے نے کہا کہ وہ یہ نہیں کہہ رہے کہ شادی کی عمر کم کر دو لیکن یہ ایک طریقہ ہو سکتا ہے. اس پر غور کرنے میں کوئی برائی نہیں ہے. آخر اٹھارہ برس کی عمر بھی تو کچھ سوچ کر ہی طے کہ گئی ہے. کھاپ نمائندوں کہ اس بات میں بھی دم نظر اتا ہے.
آخر یہ عمر کی حد کس بنیاد پر طے کہ گئی ہے؟ کیا اسے اور بڑھایا جا سکتا ہے؟اگر بڑھایا جا سکتا ہے تو گھٹايا بھی جا سکتا ہے. لیکن اس کے گھٹانے بڑھانے سے جو دوسرے اثرات دکھائی دینے ہوں گے ان کا بھی جائزہ ضروری ہے. میں مزید تفصیل میں نہ جاکر کھاپ پنچایتوں کے تعلق سے صرف دو مسائل پر اپنی بات رکھنا چاہتا ہوں.
پہلا یہ کہ عورتوں کی زندگی کے بارے میں فیصلہ کرنے کا حق صرف مردوں کو ہو یہ کہاں کا انصاف ہے؟ کیا اس سب کھاپ پنچایت میں سامان تعداد میں یا کم از کم ایک تہائی تعداد میں عورتوں کو بلایا گیا ہے؟ نہیں بلایا گیا. انصاف تو یہ کہتا ہے کہ اورتے اپنے فیصلے خود کریں. خود نہ کریں تو مردوں کے ساتھ بیٹھ کر کریں. یہ بھی نہ ہو سکے تو کم از کم انہیں اپنی بات کہنے کا مناسب موقع دیا جائے جو کھاپ پنچایتیں نہیں دے رہیں ہیں.
دوسری اور سب سے اہم بات عصمت دری کے بارے میں ہے. عصمت دری کیسے رکے گا تب تک؟ اس پر جو تجاویز آرہے ہیں کہ بلاتكاري کو سخت سزا دیں، اس کا سماجی بائیکاٹ کریں. میں سمجھتا ہوں وہ بہت کارگر نہیں ہیں. کھاپ پنچایتوں کا کم عمر میں شادی کا مشورہ تو مضحکہ خیز ہے. اس پر کچھ کہنا بیکار ہے. عصمت دری روکنے کہ کوئی کارروائی تجویز کرنے سے پہلے یہ سمجھنا ضروری ہے کہ عصمت دری کیوں ہوتے ہیں؟ میں سمجھتا ہوں کہ عصمت دری کے وہ بنیادی وجہ نہیں ہیں جو بتائیں جا رہے ہیں، جیسے فلمیں، ٹی وی پھےسن. کم کپڑے وغیرہ. اس میں سب مزید اشتعال انگیز کپڑوں یا کم کپڑوں کو ذمہ دار مانا جاتا ہے. میں پوچھتا ہوں کہ اگر ایسا ہوتا تو قبائلی جو نیم عریاں رہتے ہیں ان کے یہاں عصمت دری کی وارداتیں سب سے زیادہ ہوتی. لیکن وہاں نہیں ہوتی ہیں. اسی طرح غیر ملکی جو ساحلوں پر عریاں لیٹے رہتے ہیں ان کے درمیان عصمت دری خوب ہوتے، لیکن وہاں بھی نہیں ہوتے ہیں. اس کا مطلب ہے کہ عصمت دری حصہ دیدار سے نہیں ہوتا ہے. عصمت دری دل کہ وكرت سے ہوتا ہے.وكرت ذہنیت کا جنسی كٹھت شخصیت عصمت دری کرتا ہے. اس لئے سب سے ضروری اس ذہنی اسوستھتا کو ٹھیک کرنا ہے. یہ اسوستھتا کیسے پنپتي ہے. یہ اسوستھتا ہمارے بند معاشرے کے ماحول سے پنپتي ہے. ایک سماج جہاں عورت کو عجوبہ سمجھا جاتا ہے، جہاں ایک خاص عمر کے بعد عورت مرد کے درمیان فاصلہ بنا دی جاتی ہے، جہاں پیدائش سے جنس بھید ہے، وہاں وكرت مانسكتا اور کام جلن جنمتي ہی ہے. قبائلیوں، پہاڑ اہل میں ایسے واقعات اگر نہیں کم ہوتی ہیں تو اس کی وجہ یہی ہے کہ ان کے درمیان عورت اور مرد کی تفریق کم ہے اور جنس پر بدشے بھی کم ہیں. شمال مشرقی کے قبائلیوں میں آج بھی کشور وي کے لڑکے لڑکیوں کی گاؤں سے باہر الگ اجتماعی سهواس کا انتظام ہے جہاں وہ اپنے مستقبل کے ساتھی کا آزادی پوروك انتخاب کرتے ہیں. دوسری طرف عام بھارتی معاشرے ہیں جہاں کشور وي آنے پر لڑکے اور لڑکی کو الگ طرح کی بندشوں سے جكڈ دیا جاتا ہے جو ان میں اجنبيپن اور غیر ضروری توجہ کا احساس پیدا کرتا ہے. کیا یہ جذبات کو ایک بڑی وجہ ہے. وہ سارے وجہ سے جو گنايے جاتے ہیں اس کی ایک وجہ کی وجہ سے پنپتے ہیں. اس کا علاج یہی ہے کہ لڑکوں اور لڑکیوں کے درمیان کہ دوریاں ختم ہونی چاہئیں. اسی کے ساتھ سیکس کو لے کر جرم جذبات کا بھی خاتمہ ہونا ضروری ہے. اس کو لے کر اخلاق کے جو پرانے جالے تنے ہیں انہیں ایک جھٹکے سے ختم کر دینا ضروری ہے. اس بارے میں لڑکے اور لڑکے کے کسی بھی پہل قدمی کو ان کی رضامندی کے ساتھ آسانی سے تسلیم کیا جانا چاہیے اور اس کے ساتھ تامر کے بندھن والی بات کو سرے سے خارج دینا چاہئے. جب ہم اتنے كھلےپن کو قبول کر لیں گے اور اسے سہنے کے وغیرہ ہو جايےگے تو ہم دےكھےگے کہ اور چاہے جو مسائل پیدا ہو گئی ہوں لیکن عصمت دری کہ واقعات نگي ہو گئیں ہیں. باقی جو مسائل ہوں وہ اتنی وکٹ نہ هوگي جو حل نہ ہو سکے یا جن کے ساتھ ہم جی نہ سکیں. آج جس مسئلے کا حل کولہو کے بیل کی طرح چکر لگا کر تلاش کیا جا رہا ہے اسے سرے سے الٹا کر دینی کی ضرورت ہے مسئلہ کا حل ممکن نہیں ہے لیکن ہمیں فیاضی دکھانی ہوگی اور سماجی تبدیلی کو تسلیم کرنا ہوگا.
खाप पंचायत के प्रतिनिधि ने अपने तर्क प्रभावशाली ढंग से रखें और तमाम वक्ता केवल तमतमाकर चिल्लाने के अलावा कुछ नहीं बोल सके. तमाम लोग एक ही बात कहे जा रहे थे कि क्या पंद्रह साल कि लड़की की शादी कर देने से बलात्कार बंद हो जायेंगें ? क्या शादी शुदा औरतों के साथ बलात्कार नहीं होते हैं ? क्या अल्पवयस्क बच्चियों के साथ बलात्कार नहीं होते हैं ? शादी की उम्र को किस सीमा तक का कम करेंगे? सबसे बड़ा तर्क था कि क्या शादी ही मुख्य है ? क्या लड़की को योग्य होने के लिए एक बड़ी उम्र कि आवश्यकता नहीं है ?
खाप प्रतिनिधि ने कहा कि वो नहीं कह रहे कि शादी कि उम्र कम कर दो लेकिन ये एक उपाय हो सकता है. इस पर विचार करने में कोई बुराई नहीं है. आखिर अट्ठारह बरस कि उम्र भी तो कुछ सोचकर ही तय कि गयी है. खाप प्रतिनिधियों कि इस बात में भी दम दिखता है.
आखिर ये उम्र सीमा किस आधार पर तय कि गयी है ? क्या इसे और बढ़ाया जा सकता है ? अगर बढ़ाया जा सकता है तो घटाया भी जा सकता है. लेकिन इसके घटाने बढाने से जो दूसरे प्रभाव परिलक्षित होंगें उनका भी आकलन जरुरी है . मैं ज्यादा विस्तार में न जाकर खाप पंचायतों के सन्दर्भ में केवल दो मुद्दों पर अपनी बात रखना चाहता हूँ.
पहला ये कि औरतों की जिंदगी के बारे में फैसला करने का हक़ केवल पुरुषों को हो ये कहाँ का न्याय है ? क्या इस सर्व खाप पंचायत में सामान संख्या में या कम से कम एक तिहाई संख्या में औरतों को बुलाया गया है ? नहीं बुलाया गया . न्याय तो यह कहता है कि औरते अपने फैसले खुद करें. खुद न करें तो पुरुषों के साथ बैठकर करें. ये भी न हो सके तो कम से कम उन्हें अपनी बात कहने का पर्याप्त अवसर दिया जाए जो खाप पंचायतें नहीं दे रहीं हैं .
दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात बलात्कार के सम्बन्ध में है. बलात्कार कैसे रुकेगा? इस पर जो सुझाव आ रहें हैं कि बलात्कारी को कठोर दंड दें, उसका सामाजिक बहिष्कार करें. मैं समझता हूँ वो बहुत कारगर नहीं हैं . खाप पंचायतों का कम उम्र में शादी का सुझाव तो हास्यास्पद है. उस पर कुछ कहना बेकार है. बलात्कार रोकने कि कोई कार्यवाही सुझाने से पहले ये समझना जरुरी है कि बलात्कार क्यों होते हैं ? मैं समझता हूँ कि बलात्कार के वो मुख्य कारण नहीं हैं जो बतायें जा रहें हैं, जैसे फ़िल्में, टी वी. फैसन. कम कपडे आदि . इसमें सब ज्यादा भड़काऊ कपड़ों या कम कपड़ों को जिम्मेदार माना जाता है . मैं पूछता हूँ कि अगर ऐसा होता तो आदिवासी जो अर्ध नग्न रहते हैं उनके यहाँ बलात्कार की वारदातें सबसे ज्यादा होती .लेकिन वहाँ नहीं होती हैं .इसी प्रकार विदेशी जो समुद्र तटों पर नग्न लेटे रहते हैं उनके बीच बलात्कार खूब होते, लेकिन वहाँ भी नहीं होते हैं .इसका मतलब है कि बलात्कार अंग दर्शन से नहीं होता है. बलात्कार मन कि विकृति से होता है. विकृत मानसिकता का सेक्स कुंठित व्यक्ति बलात्कार करता है. इसलिए सबसे जरुरी इस मानसिक अस्वस्थता को ठीक करना है .यह अस्वस्थता कैसे पनपती है .ये अस्वस्थता हमारे बंद समाज के वातावरण से पनपती है. एक समाज जहां स्त्री को अजूबा माना जाता है, जहाँ एक निश्चित उम्र के बाद स्त्री पुरुष के बीच दूरी बना दी जाती है, जहाँ जन्म से लिंग भेद है, वहाँ विकृत मानिसिकता और काम कुंठा जन्मती ही है . आदिवासियों,पर्वत वासियों में ऐसी घटनाएँ अगर नहीं घटती हैं तो इसका कारण यही है कि उनके बीच स्त्री और पुरुष का भेदभाव कम है और सेक्स पर बंदिशें भी कम हैं. पूर्वोत्तर के आदिवासियों में आज भी किशोर वय के लडके लड़कियों की गाँव से बाहर अलग सामूहिक सहवास की व्यवस्था है जहां वे अपने भावी साथी का स्वतंत्रता पूर्वक चुनाव करते हैं. दूसरी तरफ आम भारतीय समाज हैं जहाँ किशोर वय आने पर लडके और लड़की को अलग तरह की बंदिशों से जकड दिया जाता है जो उनमें अजनबीपन और अनावश्यक आकर्षण का भाव पैदा करता है . क्या यह भाव ही एक बड़ा कारण है . वो सारे कारण जो गिनाये जाते हैं इस एक कारण के कारण पनपते हैं . इसका इलाज यही है कि लड़कों और लड़कियों के बीच कि दूरियाँ ख़त्म होनी चाहियें. इसी के साथ सेक्स को लेकर अपराध भावना का भी खात्मा होना जरुरी है. इसको लेकर नैतिकता के जो पुराने जाले तने हैं उन्हें एक झटके से ख़त्म कर देना जरुरी है. इस बारें में लडके और लडके के किसी भी पहल कदमी को उनकी सहमति के साथ सहजता से स्वीकार किया जाना चाहिए और उसके साथ ताउम्र के बंधन वाली बात को सिरे से नकार देना चाहिए . जब हम इतने खुलेपन को स्वीकार कर लेगें और उसे सहने के आदि हो जायेंगें तो हम देखेंगें कि और चाहे जो समस्याएं उत्पन्न हो गयीं हों लेकिन बलात्कार कि घटनाएँ नगण्य हो गयीं हैं .बाकी जो समस्याएं होंगी वो इतनी विकट न होंगीं जिनका समाधान न हो सके या जिनके साथ हम जी न सकें. आज जिस समस्या का समाधान कोल्हू के बैल की तरह चक्कर लगाकर खोजा जा रहा है उसे सिरे से उल्टा कर देनी की जरुरत है समस्या का समाधान असंभव नहीं है लेकिन हमें उदारता दिखानी होगी और सामाजिक बदलाव को स्वीकार करना होगा .
عورت اسمتا کے سوال
Alpha
کھاپ پنچایت کے نمائندے نے اپنے دلائل مؤثر طریقے سے رکھیں اور تمام مقرر صرف تمتماكر چلانے کے علاوہ کچھ نہیں بول سکے. تمام لوگ ایک ہی بات کہے جا رہے تھے کہ کیا پندرہ سال کی لڑکی کی شادی کر دینے کی عصمت دری بند ہو جايےگے؟ کیا شادی شدہ عورتوں کے ساتھ زیادتی نہیں ہوتے ہیں؟ کیا الپويسك بچیوں کے ساتھ عصمت دری نہیں ہوتے ہیں؟ شادی کی عمر کو کس حد تک کم کریں گے؟ سب سے بڑی دلیل ہے کہ کیا شادی ہی اہم ہے؟ کیا لڑکی کو قابل ہونے کے لئے ایک بڑی عمر کہ ضرورت نہیں ہے؟
کھاپ کے نمائندے نے کہا کہ وہ یہ نہیں کہہ رہے کہ شادی کی عمر کم کر دو لیکن یہ ایک طریقہ ہو سکتا ہے. اس پر غور کرنے میں کوئی برائی نہیں ہے. آخر اٹھارہ برس کی عمر بھی تو کچھ سوچ کر ہی طے کہ گئی ہے. کھاپ نمائندوں کہ اس بات میں بھی دم نظر اتا ہے.
آخر یہ عمر کی حد کس بنیاد پر طے کہ گئی ہے؟ کیا اسے اور بڑھایا جا سکتا ہے؟اگر بڑھایا جا سکتا ہے تو گھٹايا بھی جا سکتا ہے. لیکن اس کے گھٹانے بڑھانے سے جو دوسرے اثرات دکھائی دینے ہوں گے ان کا بھی جائزہ ضروری ہے. میں مزید تفصیل میں نہ جاکر کھاپ پنچایتوں کے تعلق سے صرف دو مسائل پر اپنی بات رکھنا چاہتا ہوں.
پہلا یہ کہ عورتوں کی زندگی کے بارے میں فیصلہ کرنے کا حق صرف مردوں کو ہو یہ کہاں کا انصاف ہے؟ کیا اس سب کھاپ پنچایت میں سامان تعداد میں یا کم از کم ایک تہائی تعداد میں عورتوں کو بلایا گیا ہے؟ نہیں بلایا گیا. انصاف تو یہ کہتا ہے کہ اورتے اپنے فیصلے خود کریں. خود نہ کریں تو مردوں کے ساتھ بیٹھ کر کریں. یہ بھی نہ ہو سکے تو کم از کم انہیں اپنی بات کہنے کا مناسب موقع دیا جائے جو کھاپ پنچایتیں نہیں دے رہیں ہیں.
دوسری اور سب سے اہم بات عصمت دری کے بارے میں ہے. عصمت دری کیسے رکے گا تب تک؟ اس پر جو تجاویز آرہے ہیں کہ بلاتكاري کو سخت سزا دیں، اس کا سماجی بائیکاٹ کریں. میں سمجھتا ہوں وہ بہت کارگر نہیں ہیں. کھاپ پنچایتوں کا کم عمر میں شادی کا مشورہ تو مضحکہ خیز ہے. اس پر کچھ کہنا بیکار ہے. عصمت دری روکنے کہ کوئی کارروائی تجویز کرنے سے پہلے یہ سمجھنا ضروری ہے کہ عصمت دری کیوں ہوتے ہیں؟ میں سمجھتا ہوں کہ عصمت دری کے وہ بنیادی وجہ نہیں ہیں جو بتائیں جا رہے ہیں، جیسے فلمیں، ٹی وی پھےسن. کم کپڑے وغیرہ. اس میں سب مزید اشتعال انگیز کپڑوں یا کم کپڑوں کو ذمہ دار مانا جاتا ہے. میں پوچھتا ہوں کہ اگر ایسا ہوتا تو قبائلی جو نیم عریاں رہتے ہیں ان کے یہاں عصمت دری کی وارداتیں سب سے زیادہ ہوتی. لیکن وہاں نہیں ہوتی ہیں. اسی طرح غیر ملکی جو ساحلوں پر عریاں لیٹے رہتے ہیں ان کے درمیان عصمت دری خوب ہوتے، لیکن وہاں بھی نہیں ہوتے ہیں. اس کا مطلب ہے کہ عصمت دری حصہ دیدار سے نہیں ہوتا ہے. عصمت دری دل کہ وكرت سے ہوتا ہے.وكرت ذہنیت کا جنسی كٹھت شخصیت عصمت دری کرتا ہے. اس لئے سب سے ضروری اس ذہنی اسوستھتا کو ٹھیک کرنا ہے. یہ اسوستھتا کیسے پنپتي ہے. یہ اسوستھتا ہمارے بند معاشرے کے ماحول سے پنپتي ہے. ایک سماج جہاں عورت کو عجوبہ سمجھا جاتا ہے، جہاں ایک خاص عمر کے بعد عورت مرد کے درمیان فاصلہ بنا دی جاتی ہے، جہاں پیدائش سے جنس بھید ہے، وہاں وكرت مانسكتا اور کام جلن جنمتي ہی ہے. قبائلیوں، پہاڑ اہل میں ایسے واقعات اگر نہیں کم ہوتی ہیں تو اس کی وجہ یہی ہے کہ ان کے درمیان عورت اور مرد کی تفریق کم ہے اور جنس پر بدشے بھی کم ہیں. شمال مشرقی کے قبائلیوں میں آج بھی کشور وي کے لڑکے لڑکیوں کی گاؤں سے باہر الگ اجتماعی سهواس کا انتظام ہے جہاں وہ اپنے مستقبل کے ساتھی کا آزادی پوروك انتخاب کرتے ہیں. دوسری طرف عام بھارتی معاشرے ہیں جہاں کشور وي آنے پر لڑکے اور لڑکی کو الگ طرح کی بندشوں سے جكڈ دیا جاتا ہے جو ان میں اجنبيپن اور غیر ضروری توجہ کا احساس پیدا کرتا ہے. کیا یہ جذبات کو ایک بڑی وجہ ہے. وہ سارے وجہ سے جو گنايے جاتے ہیں اس کی ایک وجہ کی وجہ سے پنپتے ہیں. اس کا علاج یہی ہے کہ لڑکوں اور لڑکیوں کے درمیان کہ دوریاں ختم ہونی چاہئیں. اسی کے ساتھ سیکس کو لے کر جرم جذبات کا بھی خاتمہ ہونا ضروری ہے. اس کو لے کر اخلاق کے جو پرانے جالے تنے ہیں انہیں ایک جھٹکے سے ختم کر دینا ضروری ہے. اس بارے میں لڑکے اور لڑکے کے کسی بھی پہل قدمی کو ان کی رضامندی کے ساتھ آسانی سے تسلیم کیا جانا چاہیے اور اس کے ساتھ تامر کے بندھن والی بات کو سرے سے خارج دینا چاہئے. جب ہم اتنے كھلےپن کو قبول کر لیں گے اور اسے سہنے کے وغیرہ ہو جايےگے تو ہم دےكھےگے کہ اور چاہے جو مسائل پیدا ہو گئی ہوں لیکن عصمت دری کہ واقعات نگي ہو گئیں ہیں. باقی جو مسائل ہوں وہ اتنی وکٹ نہ هوگي جو حل نہ ہو سکے یا جن کے ساتھ ہم جی نہ سکیں. آج جس مسئلے کا حل کولہو کے بیل کی طرح چکر لگا کر تلاش کیا جا رہا ہے اسے سرے سے الٹا کر دینی کی ضرورت ہے مسئلہ کا حل ممکن نہیں ہے لیکن ہمیں فیاضی دکھانی ہوگی اور سماجی تبدیلی کو تسلیم کرنا ہوگا.


1-परवेज़ अहमद - अमरनाथ भाई , ये मौलवी क्या लिख रहे हो . सिर्फ तालिबानी लिखो . समझे .
जवाब देंहटाएं2-अमरनाथ मधुर - परवेज भाई आप ठीक कहते हैं लेकिन ये कार्टून मेरा नहीं है और मैंने तालिबान और खाप पंचायतों की समानता के अर्थ में ही इसे लिया है. मैं इसे ठीक करना नहीं जानता आप इसे अन्यथा न लें .
3-परवेज़ अहमद - जी अमरनाथ भाई .
4-फरीद अहमद - अभूतपूर्व लेख
बहुत मामूली तरमीम के साथ मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ.
5-अमरनाथ मधुर - मैं आपका खैर मकदम करता हूँ .आप तरमीन और नुक्ताचीनी दोनों कीजिये .
6-फरीद अहमद - रेप हिंदुस्तान में एक बहुत बड़ा मसाला बना हुआ है जिसको सुलझाने का कोई रास्ता ही नज़र नहीं आता ये क़त्ल से भी बड़ा a गुनाह है ये औरत को जिंदा लाश बना देता है बस इतना ही कहना चाहूँगा अल्लाह हम सब की बहेन बेटियों के साथ रहम का मामला फरमाए
7-मनीष कुमार - मधुर भाई आपने बहुत सही कहा .....और ऐसा लेख जो सोचने पर मजबूर करे ·
8-श्रद्धान्शु शेखर - अमरनाथ जी
100 % सहमत
.....लेकिन "महिलाओं को उनके अपने फैसलें लेने का अधिकार " वाली बात क्यूं लिखना भूल गये ?
9-अमरनाथ मधुर - शेखर भाई आप ध्यान से देखें. मैंने लिखा है कि' न्याय तो यह कहता है कि औरते अपने फैसले खुद करें.'
10-मंज़र अहमद - लफ्ज़ी बहेस से समस्या हल होने वाली नहीं है हल सिर्फ एक है की सब मिलकर एक मांग करें , ला के इम्पलीशान की .
जब तक न्यायालयों से फाईनल जजमेंट आने में १५- 20 साल लगते रहेंगे कोई भी कानून कारगर नहीं होगा .
फाईनल फैसला 2 3 साल में आ जाये तो 80 90% जुर्म अपने आप ख़तम हो जायेंगे
11-गोविन्द सिंह परमार - आदरणीय भेडिये फैसला करेगे कि हिरन ,बकरी कैसे रहे क्या खाए ,कहा जाए ,कैसे और कब प्रजनन करे?,कमाल है.
12-अतुल आनंद - जब समाज ही सर्वोपरि है तो न्यायालयों की क्या जरुरत है? अम्बेडकर को संविधान बनाने की क्या जरुरत थी? आज ये खाप पंचायत बाल विवाह को कानूनी मान्यता दिलाने की बात कर रहे है, कल को सती प्रथा को भी कानूनी मान्यता दिलवाने की बात करेंगे। इन लोगों को समझना होगा कि इनकी मान्यतायें अब पुरानी और अतर्कसंगत हो गयी हैं।
13-अमरनाथ मधुर- बिलकुल मैं यही कहता हूँ |सबसे बड़ी बात ये कि दूसरों के बारे में ये फैसला न करें|
14-कुमार पंकज --तर्कसंगत ......तथ्यसंगत .... तीखा .... समाधान और समस्या दोनों को सामने रखने वाला .......कहीं -कहीं ....अन्धेरें में दीवारें टटोलता हुआ .....प्रभावशाली .....बधाई आपको मधुर जी.
15-सिद्धार्थ वर्मा - प्रिय श्री अमरनाथ मधुर जी, मैं आपकी राय से इत्तेफाक रखता हूँ. इन पंचायतों ("खाप") के नादिरशाही फरमान, कट्टरपंथी, धर्मान्धों के विचित्र, क्रूर और मनमाने "फतवे" या धर्मग्रंथों के सन्दर्भों से परे जाकर उनकी व्याख्याओं को सुन, देख या पढ़ कर मुझे तो ऐसा लग रहा है की यदि हम अन्धयुग में हम नहीं जी रहे हैं तो निश्चित ही अन्धयुग की ओर अग्रसर अवश्य हैं.
16-अमरनाथ मधुर - सिद्धार्थ वर्मा जी आप ठीक कहते हैं ये सामाजिक परिवर्तन का संक्रमण काल है. और इस परिवर्तन के लिए जो भी युवा[ लड़कियां भी शामिल हैं ] अपनी शाहादत दे रहें हैं वो सामाजिक परिवर्तन के इतिहास लेखन में शहीद का दर्जा पायेंगें.