सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

अथातो महाकवि जिज्ञासा (व्यंग्य)-कुमार पंकज



(सत्य घटनाओं और अनुभवों पर आधारित महा एपीसोड)
मैं एक महाकवि हूँ। आप पूछेंगे कि मुझे महाकवि की ये ‘उपाधि’ या ‘पदवी’ किस घटिया संस्थान से मिली है ? पूछना आपका अधिकार है, आप पूछ सकते हैं लेकिन न बताना मेरी निजी स्वतन्त्रता है। जब हमारे पुरखे ‘अहम् ब्रह्मस्मि’ की घोषणा कर सकते हैं, बुद्ध जब बुद्धत्व की घोषणा कर सकते हैं तो मैं महाकवि होने की घोषणा क्यों नहीं कर सकता भाई ? महाकवि होने के लिए, ये ज़रूरी  नहीं है कि कोई संस्थान या व्यक्ति मुझे महाकवि घोषित करे, या मैं पहले दस-बीस महान ग्रन्थ लिखूँ तभी महाकवि कहला सकूंगा। दरअसल ये ‘अन्दर से फील करने की बात’ है। वैसे केवल फील करने से ही काम नहीं चलता, दरअसल इसके लिए कुछ  ज़रूरी  नुस्ख़े भी हैं। अगर उन नुस्ख़ों को कोई भी ऐसा कवि प्रयोग करे, जिसे ये भी न पता हो कि बेर का प्रष्ठभाग किधर होता है, वो भी महाकवि बन सकता है। वैसे तो ये रहस्य देव-दुर्लभ है लेकिन देवताओं को तो वैसे भी कविता का कोई ख़ास ज्ञान नहीं। अगर आप पूरा देवलोक भी छान मारें तो आपको पाँच-छह देव-कवि भी हाथ नहीं आने के। लेकिन अगर कवियों के द्वारा दिए गए पुराने आँकड़ों और काव्य-किवदंतियों पर दृष्टि डालें तो अपने शहर में लगभग 200 से 300 कवि हैं (हालांकि ये आँकड़े पाँच से दस वर्ष पुराने हैं, इस बीच गंगा में बहुत पानी बह चुका) तो इस देव-दुर्लभ रहस्य को मानव के लिए इतना सुलभ बनाने की मुझे क्या ज़रूरत है, जितना सुलभ शौचालय ? मेरे मित्र कहते हैं कि मैं शुरू से ही बहुत उत्पाती बहुत उपद्रवी रहा हूँ..........हो सकता है ये बात भी उसी का एक हिस्सा हो। जब अपने अम्बानी भाई मोबाइल को इतना सुलभ बना सकते हैं कि भिखारी भी ये कहने लगें कि-‘बहन जी जब रोटी बन जाए, मेरे मोबाइल पर मिस काल दे देना, मैं रोटी माँगने आ जाउफँगा।’ तो मैं इस महान रहस्य को आम आदमी के लिए इतना सहज-प्राप्य क्यों नहीं बना सकता कि हर वो व्यक्ति, जिसने अपने जीवन में ज़्ारा-सी तुकबन्दी भी की है, वो भी महाकवि होने के विलासितापूर्ण आनन्द को महसूस कर सके।
तो मैं कह रहा था कि महाकवि बनने के लिए अंदर से फील करना तो ज़रूरी है ही, साथ ही ये भी ज़रूरी है कि आप कुछ गुप्त नुस्ख़ों का प्रयोग करें। आइये उन युक्तियों और तरीकों पर विस्तार से चर्चा करते हैं, जिन्हें अपनाकर कोई भी तुकबाज ग़ज़लक़ार  या फिर प्यार, हार, उपहार, संसार के काफिया मिलाकर, केवल एक कविता लिखने वाला कवि भी महाकवि होने का स्वर्गिक आनन्द अनुभूत कर सकता है-
(1) पुराने महाकवियों की आलोचनाः- देखिए, नई सरकार तब आती है, जब पुरानी को हटा दिया जाता है। अगर आपको महाकवि बनना है तो पुराने महाकवियों की आलोचना करके आप ख़ुद को कविता का महान ज्ञाता तो साबित कर ही सकते हैं साथ ही अपने लिए सीट भी खाली कर सकते हैं। अब आप कहेंगे कि पुराने महाकवियों की आलोचना करने के लिए तो कविता, शिल्प, व्याकरण, वर्तनी और अलंकार, बहर, वज़न , फाइलुन, फाइलातुन की डीप नालिज होना बहुत ज़रूरी  है...........नहीं रे! यहीं तो मात खा गए। कोई ज़रूरत नहीं है, दुनिया का सबसे आसान काम बताया है तुम्हें। आलोचना करना दुनिया में सबसे सरल काम है। अगर आपको महाकवि बनना है तो बस एक नुस्खा पकड़ लो, आपके सामने जिस भी महान कवि या शायर का भी ज़िक्र  हो, तुरन्त क्रोध में आ जाईये और गुस्से में लाल-पीले होकर कहिये-‘‘फलां........फलां भी साला कोई कवि था, उसने कौन-सा तीर मारा कविता में ? 
दरअसल मैं ख़ुद ऐसे कई ‘महाकवियों’ को जानता हूँ, जिनकी आज तक दो पंक्तियाँ भी आम आदमी की ज़बान  पर नहीं चढ़ सकीं लेकिन उनके सामने आप किसी भी महान कवि या शायर का ज़िक्र  करिये और तुरन्त उनकी प्रतिक्रिया महज़् एक होती है.........अजी, ये साले (ऽऽऽऽऽ जातिऽऽऽऽऽ) क्या जाने कविता क्या होती है। आप कहिए ओके, ठीक है ये नहीं जानता लेकिन फलाना ? वो तो कवि था साहब, सारी दुनिया उसके शेरों को आज कोट करती है, उसे तो आप नहीं नकार सकते ? दूसरी प्रतिक्रिया--इमरजेंसी में चार शेर लिखकर मशहूर हो गया, ये कोई ग़ज़ल  होती है। ग़ज़ल  क्या होती है, ये मेरे अलावा दुनिया में केवल एक आदमी जानता है, जिसका पता मैं भी पिछले कई सालों से ढूँढ रहा हूँ मगर अब तक मिला नहीं। आप कहिए, ठीक है साहब लेकिन गालिब और मीर को तो कम से कम आप नहीं नकार सकते। तीसरी प्रतिक्रिया-‘गालिब!!!!! गालिब के तो कई शेरों का वज़न , मैंने ख़ुद अब आकर ठीक किया है और मीर....मीर ने कौन सा तीर मारा आज तक ग़ज़ल  में ? आप कहो कि इट्स ओके, इट्स ओके लेकिन एक और कवि हैं जो अपनी ओजस्वी रचनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं, कहते हैं उनकी आवाज़् में तलवार जैसी धार  है। चौथी  प्रतिक्रिया--चीखने-चिल्लाने को कविता कह रहे हैं आप ? गला फाड़कर चिल्लाना कविता हो गई ? कविता क्या होती है ये मैं आपको बताता हूँ, सुनिये।’ 
तो लब्बोलुबाब ये है कि अपनी अयोग्यता को छुपाने के लिए किसी भी समकालीन कवि की शोहरत को, किसी प्राचीन महान सृजन और रचना को आप दो टके का साबित करने की योग्यता रखें। 
(2) कवि-सम्मेलन और कविता में अत्यधिक व्यस्त दिखने का पाखण्ड रचेंः- दूसरा मन्त्र-जब भी आपके पास किसी कवि का फोन आए तो उसका नाम मोबाइल के डिस्प्ले पर आते ही कव्वे की तरह सतर्क हो जाएँ। उधर से जैसे ही हैलो हो.......आप भी हैलो कहिए लेकिन सावधन ! हाल मत पूछियेगा। धैर्य बनाए रखें, हाल उसे पूछने दें, एक मिनट रुकें। जैसे ही वो ये ग़लती  करे...........तुरन्त लपक लें। तो उसने पूछा-‘‘और सुनाईये क्या हाल हैं ?’’ बस अब उसने अपनी मौत को दावत दे दी। आप शुरू हो जाइये-और इन तीन में से कोई एक वाक्य कहिए-
1. थकान बहुत हो रही है।
2. गले में दर्द है।
3. नींद पूरी नहीं हो पा रही।
आप निश्चिंत रहिये इन तीरों की काट नहीं कर पाएगा वो। अब शिष्टाचारवश उस बलि के बकरे को पूछना ही पड़ेगा कि-‘क्या हुआ इतनी थकान क्यों ? या गले में इतना दर्द कैसे हो गया ? या नींद क्यों पूरी नहीं हो पा रही ? बस.....समझिये हो गया काम। फिर आप बताईये.....दरअसल, निरन्तर चार-पाँच कवि-सम्मेलन थे। दस दिन से लगातार यात्रा में हूँ। राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल और आज बिहार था कल मैं रूड़की हूँ और परसों सहारनपुर प्रोग्राम है, नरसों बरेली जाना है।’’ इससे पहले कि वो संभले, ताबड़तोड़ हमले जारी रखिये। 
किसी कवि का फोन आए और आप खटारा सिटी बस में सफर कर रहे हों और बस का छकड़ा टेप, फिल्मी गीत का खरखर करके शोर कर रहा हो तो चिल्लाईये-‘हैलो..........हैलो....आवाज़् नही आ रही....यहाँ शोर बहुत है। कवि-सम्मेलन में हूँ। बाद में बात करता हूँ।’’ किसी के ‘क्रियाक्रम’ में जा रहे हों और दूसरे कवि का फोन आ जाए तो बताईये-‘‘कार्यक्रम में जा रहा हूँ, बस शुरू होने वाला है, पहुँच गए सब लगभग।’’ जब भी अपने शहर से किसी दूसरे शहर जाएँ तो याद करके एस-टी-डी बूथ से, उन कवियों को फोन मिलायें जिन्हें आप बताना चाहते हैं कि मैं खाली नहीं हूँ....मेरे पास भी बाहर के प्रोग्राम होते हैं। आप कहेंगे कि एस-टी-डी बूथ से ही क्यों ? मोबाइल से भी तो किया जा सकता है ? नहीं रे भोलूराम........मोबाइल से किया तो उस शहर का एस-टी-डी कोड कैसे आएगा उसके मोबाइल पर ? वो कोड ही तो कन्फर्म करेगा कि तुम इस वक्त किस शहर में हो। अगर किसी दूसरे कवि के सामने किसी आयोजक का फोन आ जाए तो सोने पर सुहागा, न भी आए तो आप खुद ऐसा नाटक कर सकते हैं जैसे किसी आयोजक से बात कर रहे हैं। लेकिन बात केवल, बात करने तक ही सीमित नहीं है, उससे कहीं उच्चतर है। आपके आसपास जो कवि हों उनका सामान्य बाजार-भाव तो आपको मालूम होता ही है। बस.........उसके चार गुने से फोन पर शुरू कीजिए। अगर आपके आसपास दस हज़ार  तक लेने वाले कवि हैं तो आप फोन पर चालीस मांगिए। अगर आप पाँच में भी चले जाते हैं तो भी पैंतीस कहिए....कई-कई बार कहिए, बार-बार दोहराइये। ताकि वो ढंग से सुन ले कि आप आजकल उससे ज़्यादा पैमेण्ट ले रहे हैं। अगर आप सड़क पर खड़े हैं और पास से कोई खटारा ट्रक घुरघुर करता जा रहा है और किसी कवि का फोन आ जाता है तो बताइये-‘‘हवाई अड्डे पर हूँ, अभी कवि-सम्मेलन से लौटा हूँ, यहाँ प्लेन का बहुत शोर है, थोड़ी देर में बात करूँगा।’’
अगर आप अगले एक महीने तक बिल्कुल खाली हैं और कोई कवि-सम्मेलन आपकी झोली में नहीं है और किसी कवि या आयोजक का फोन आता है कि फलां तारीख को आप फ्री हैं क्या ? तो नादानी मत कर देना....कभी एकदम कह दो कि हाँ मैं प्रफी हूँ। धैर्य बनाए रखना, महाकवि होने की पहली शर्त है। उससे कहिए-‘‘मैं अपनी डायरी में डेट देखकर बता पाऊंगा कि ये तारीख खाली है या नहीं। आप बस दस मिनट बाद फोन कर लें।’’ या अपने मोबाइल के पास किसी पुरानी मैग्जीन के पन्ने पलटकर भी आप दूसरी तरफ वाले को ये अहसास करा सकते हैं कि आप डायरी में तारीख देख रहे हैं। अगर आप कवि-सम्मेलन में रेल से गए हैं और आयोजक आपको लेने आने वाले हैं तो बेशक आपने थर्ड क्लास में सफर किया हो। इससे पहले कि आयोजक प्लेटफार्म पर नज़र  आएँ, दौड़कर चुपके से ‘एसी फस्र्ट क्लास’ के डिब्बे के बाहर खड़े हो जायें ताकि उस मूर्ख को पता लग सके कि उसने कितने महान कवि को काव्यपाठ के लिए बुलाया है।
(3) उपाधियाँ और सम्मानों का जुगाड़ः- अगर आप सही मायनों में कवि बनना चाहते हैं तो आपको कुछ उपाधियों और सम्मानों का भी जुगाड़ करना पड़ेगा। इसके लिए आप आयोजकों और मित्रों को टोकते रहिये। जब भी उनसे बात हो तो कुछ सूत्र-वाक्य याद रखिये। जैसे-
हमें भी अबकी बार याद रखना।
हमारा नम्बर कब लगेगा आपकी संस्था में।
इस बार तो सम्मानित करवा ही दो।
हम तो चादर और मूवमैण्टो भी घर से ले आएँगे, आप हामी तो भरो
अगर आप निरन्तर लोगों को जलील करते रहेंगे तो एक न एक दिन शर्मिन्दा होकर वो आपको सम्मानित करेंगे। आज नहीं कल, बस शर्त वही है, धैर्य बनाए रखें। इसके अलावा ‘डाक्टर’ की उपाधि का जुगाड़ करना भी आवश्यक है। दरअसल, आजकल लोग उसे कवि मानने को तैयार ही नहीं होते जिसके नाम के आगे ‘डाक्टर’ न लगा हो। इसलिए अपने शहर से बाहर की किसी भी संस्था को पकड़िये और अगर कुछ ले-देकर भी बात बनती हो तो उनसे ‘काव्य-शिरोमणि’, ‘गीत-सागर’, ‘छन्द वाचस्पति’ या ऐसी ही कोई भी उपाधि झटक लें और अपने शहर में आकर धड़ल्ले से ‘डाॅक्टर’ अपने नाम के आगे लगाना शुरू कर दें। पीएच-डी दरअसल बहुत मंहगी भी है, मेहनत भी ज़्यादा है  इसलिए हल्दी लगे न फिटकरी रंग चोखा।
(4) व्याकरण, छन्द, मात्रा, वज़्ान या बहर न सीखें, बस लिखें :- पुराने लोग कह गए हैं कि कविता एक तपस्या है, साधना है। लेकिन आपको साधना-वाधना करने की ज़रूरत नहीं है। आप तो बस लिखना शुरू कर दीजिए, जो मन में आए, जैसा मन में आए। काफिया क्या है, मिसरा और मतला क्या है, रदीफ किस चिड़िया का नाम है, छन्द, अलंकार, शिल्प क्या है, इस सब में समय बर्बाद न करें। अगर आप ये सब बकवास सीखने में लग गए तो कविता कब लिखी जाएगी। दरअसल कविता सीखने में ज़्यादा मेहनत करने की इसलिए भी ज़रूरत नहीं है क्योंकि कविता अब सुनता कौन है। अगर आप मंच पर कविता पढ़ना शुरू करेंगे तो हूट और हो जाएँगे। इसलिए जितना घटिया लिख सकते हैं उतना घटिया लिखिये। अगर आपने घटिया लेखन में अपना सर्वश्रेष्ठ उड़ेल दिया तो इसकी गारण्टी है कि आप मंच पर सुपरहिट कवि साबित होंगे। अगर पाँच-सात किताबें लिख-लिखकर छपवा सकें तो बढ़िया है, न भी छपवा सकें तो जितनी रचनाएँ आपने कुल लिखी हैं, उन्हें 2800 से भाग दे दें और जो भी संख्या आए, उसे लोगों को बताएँ कि आपने इतनी ग़ज़लें  या कविताएँ लिखी हैं। या फिर इतनी कठिन और दुर्लभ शब्दावली में कविता लिखें कि लोगों को उनका अर्थ जानने के लिए शब्दकोश उठाना पड़े। 
(5)चरण-वन्दनाः- कवि होने की बारीकियों में ये सबसे महत्वपूर्ण चरण है। अगर आपकी रीढ़ की हड्डी सीधी है और झुकती कम है तो पक्का समझिये कि आप कवि होने के लिए ‘डिस्क्वालीफाई’ हैं। कवि होने के लिए आपको अपनी कमर में थोड़ा लचीलापन चाहिए। अर्थात....ये मामला सीनियरटी और जूनियरटी का है। आपसे सीनियर जो भी कवि मिले..............तुरन्त झुककर उसकी चरण-वन्दना कीजिए-‘‘दादा, पालागू, दादा, चरणस्पर्श।’’ आदि-आदि। यदि इससे भी ज़्यादा बेहतर और चापलूसीभरा कोई वाक्य इजाद कर सकते हैं तो और बढ़िया। अब मेरे सामने ये कहकर धर्म-संकट मत खड़ा कर दीजियेगा कि ‘सीनियरटी’ की परिभाषा क्या है ? सीनियरटी कविता में या उम्र में ? कविता-वविता का कोई मामला नहीं है....मामला उम्र का है। उम्र में जो भी बड़ा मिले तुरन्त झुककर उसके चरण छुएँ, उसके अहम को सहलाकर ये बताए कि मैंने आपको बड़ा स्वीकार किया है। बेशक नीचे झुकते वक्त  आप अपने मन में उसे, सामाजिक रूप से न बोली जाने वाली साहित्यिक भाषा में गालियाँ दे रहे हों, नो प्राब्लम, चलेगा। 
अब आप ये मत कहने लगना कि-‘पाँव तो गोडसे ने भी गाँधी जी के छुए थे लेकिन सीधा होते ही क्या किया सारी दुनिया जानती है। या कभी ऐसा कहने लगो कि-मेरे गाँव में एक गधा उम्र में मुझसे दो साल बड़ा है, क्या मैं उसके भी पाँव छूकर आऊं ?’’ वहाँ की तो मैं नही जानता मगर यहाँ आपको ऐसा करने में हुज्जत नहीं करनी चाहिए। आपके मन में उन साहब के लिए सम्मान हो न हो, दिखावा पूरा करिये। वैसे जानते दोनो हैं, पाँव छुआने वाला भी और छूने वाला भी कि इसकी सच्चाई क्या है। लेकिन भ्रम का ये बुलबुला जब वो नहीं तोड़ना चाहते तो आप भी उसे ब्रेक न करें।
कविता सुनाने की बीमारीः- लोग कहते हैं कि बीमारियों से बचो। लेकिन अगर आप महाकवि होना चाहते हैं तो ईश्वर करे आपको एक बीमारी लग जाए.....कविता सुनाने की बीमारी। इसके लिए दो तरीके हैं। पहला तो ये कि जितना कूड़ा-करकट आप लिख रहे हैं, उस सब को कंठस्थ कर लें। दूसरा जो कंठस्थ होने से रह जाए उसकी एक छोटी डायरी तैयार कर लें जो हर समय आपकी जेब में हो। जो भी मिले, जहाँ भी मिले, उसे कविता सुनाने का मौका न चूकें। शुरूआत ये कहकर करें कि-‘‘दो नई पंक्तियाँ लिखी हैं, अगर आपकी इजाजत हो तो सुना दूँ।’’ और जैसे ही वो किस्मत का मारा, शिष्टाचार के फंदे में फँसकर ‘हाँ सुनाईये’ कहे। जितना भी काव्य-वमन आपके कंठ में रुका हुआ है, उसे तुरन्त उसके ऊपर कर दें। जब कंठस्थ मैटिरियल खत्म हो जाये फिर आहिस्ता से नज़्ार बचाकर डायरी निकाल लीजिये। जब तक उसकी रूह का रेशा-रेशा थरथर न काँपने लगे, तब तक मत छोडिये। 
दूसरी बात जब भी कोई नई रचना लिखें, पहले तो इंतजार करिये कि किसी कवि का फोन हालचाल पूछने को आ जाए। अगर इस तरह कोई फंस जाये तो बढ़िया है। आपके पैसे भी बचेंगे और कविता सुनाने की भूख भी शान्त हो जाएगी। फोन न आए तो पिफर रिस्क लेना पड़ता है थोड़े खर्चे का। जिसे भी फोन करें, उससे यही कहें-सबसे पहले श्रोता हो आप मेरे, मैं जो भी कविता लिखता हूँ, या लिखती हूँ, सबसे पहले आपको सुनाती हूँ।’’ उसको ‘विशेष’ होने का अहसास दिलायें। फिर वो बिना किसी हीलाहवाली के आपकी कविता सुनेगा। 
महाकवि बनने के फुटकर नुस्खेः 
1- आपको ये पता हो या न हो कि बेर का पृष्ठभाग किधर होता है लेकिन दूसरे कवियों की रचनाओं में व्याकरण-दोष, छन्द-दोष, मात्रिक-दोष, उच्चारण-दोष आदि-आदि तलाशते रहें।
2-  यदि कोई कवि अच्छा लिख रहा है तो उसकी रचनाओं को चर्बा, प्रभावित, नकल, चुराई हुई, जोड़-तोड़ करके लिखी गई बताएँ।
3- महीने में एकाध बार अपने पुराने आयोजकों को फोन करके टोकते रहें कि कब बुला रहे हो हमें ?
4- 10 रूपये से लेकर इससे ऊपर की जितनी भी धनराशि का कवि-सम्मेलन मिले, उसे ‘संकोचपूर्ण चतुराई’ के साथ स्वीकार कर लें। 
5- मौका मिलने पर प्रतिद्वन्द्वी कवियों की टाँग खींचने से न चूकें। यानि अगर उनके कवि-सम्मेलन में कहीं भाँजी मारी जा सकती है तो टाँग मार ही दें।
6- केवल उन कवियों को अपने प्रोग्राम में बुलाएँ, जो आपको कोई प्रोग्राम दिला सकते हैं। 
7- जिस मंच पर आप हैं, उस मंच पर कोई ऐसा कवि न हो, जो आपकी विधा में आपसे अच्छा लिखता हो। वरना लोगों को पता चल जाएगा कि असली माल कौन सा है। 
8- अगर आप पुराने हैं तो नए आने वाले कवियों को हतोत्साहित करें और अगर नए हैं तो पुराने कवियों का झूठा सम्मान करके अपने लिए जगह तलाशते रहें। 
9- गुरूओं के वेश में घूमने वाले गुरूघण्टालों से सावधन रहें। कुछ कवियों को दूसरों को अपना चेला बनाने की बीमारी होती है, ताकि वो गोरखनाथ बनकर सोलह हजार शिष्यों की फौज तैयार कर सकें। उनके ऐसे प्रयासों को विनम्र चालाकी से असफल कर दें।
10- फेसबुक जाइन कर लें और अपने से जुड़े बाकी कवियों की वाल पर ताबड़तोड़ अपनी रचनाएँ पोस्ट करें। साथ ही अपने हर कवि-सम्मेलन, काव्य-गोष्ठी, काव्य-वमन, काव्य-कुण्ठा, पेट खराब, कब्ज़् आदि की सूचनाएँ भी अपनी वाल पर डालते रहें। जो भी कविता फेसबुक पर लिखे, तुरन्त बाकी सबसे विनम्रता से कहें-‘‘कृपया, अपना अनमोल सुझाव या बहुमूल्य प्रतिक्रिया अवश्य प्रेषित करियेगा।’’ अगर तब भी वो प्रतिक्रिया न भेजे तो एकाध दिन में टोकते रहिये-‘‘आपने अभी तक प्रतिक्रिया नहीं दी.....क्या व्यस्तता के कारण मेरी कविता पढ़ नहीं पाए ?’’
11- शातिर शिष्यों से होशियार............कुछ लोग आपको गुरू बनाकर आपका भी शोषण कर सकते हैं। अतः गुरू बनें मगर अपने साहित्य को छुपाकर, या उनकी नज़रों  से दूर संदूक-वंदूक में रखें। वरना कभी पता चले कि गुरू जी घर पड़े हैं और चेला उनकी कविता सुनाकर मंचों से रूपया बटोर रहा है।
सूत जी बोले-‘हे मुनियों महाकविपुराण का ये अध्याय अब यहीं समाप्त होता है। इससे आगे की कथा अगले माह की मावस को फिर सुनाऊंगा। एक छोटे से ब्रेक के बाद वापस लौटूंगा। तब तक के लिए नारायण.....नारायण।

-कुमार पंकज

1 टिप्पणी:



  1. -Ashok Verma अमरनाथ जी पढकर मजा आ गया।

    2-Monika Sharma .क्या बात है.....उधेड़कर रख दिया... धारदार व्यंग्य है......हा हा हा...मज़ा आ गया ....हम तक पहुँचाने के लिए आभार अमरनाथ जी

    3-Amarnath Madhur बुद्ध जब बुद्धत्व की घोषणा कर सकते हैं तो मैं महाकवि होने की घोषणा क्यों नहीं कर सकता भाई ? महाकवि होने के लिए, ये ज़रूरी नहीं है कि कोई संस्थान या व्यक्ति मुझे महाकवि घोषित करे, या मैं पहले दस-बीस महान ग्रन्थ लिखूँ तभी महाकवि कहला सकूंगा। दरअसल ये ‘अन्दर से फील करने की बात’ है.


    4-Nikki Sinhg मज़ा आ गया अमरनाथ मधुर जी........कमाल की चोट की है......


    5-Sourabh Mohan Nakam वाकई इतना मज़ेदार व्यंग्य बहुत दिनों बाद पढ़ा,कुमार पंकज जी बधाई के पात्र हैं।अमरनाथ जी आपका धन्यवाद।

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