रास्ता किधर है ?
विख्यात कामेडियन जसपाल भटटी की सड़क दुर्घटना में मौत होने का समाचार सुनकर सबको बडा सदमा लगा है। वे टी0 शो के लोकप्रिय अभिनेता और निर्माता थे। जैसा कि समाचारों से पता चला है कि भट्टी अपनी नयी फिल्म पावर कट के प्रचार के लिए जालंधर जा रहे थे तभी हाईवे पर उनकी कार एक पेड से टकरा गयी । सडक पर ऐसी दुर्घटनायें अक्सर होती रहती हैं। लेकिन जब कोई चर्चित या अजीज व्यक्ति ऐसी दुर्घटना का शिकार हो जाता है तो मन गहरे विषाद में डूब जाता है और कई प्रश्न मन को मथने लगते हैं।
सडक दुर्घटनाओं के जहॉं अन्य बहुत से कारण होते हैं वहीं एक बडा कारण सडक यातायात में अवरोधक बने वृक्ष भी होते हैं। जिसका आसान समाधान यह है कि ऐसे पेडों को तुरन्त काटा जाये। लेकिन पर्यावरण के प्रति जागरूकता के कारण कठोर वन संरक्षण अधिनियम के चलते सरकारी अधिकारी झमेले से बचने के लिये ऐसे वृक्षों के काटने की कार्यवाही नहीं करते और ऐसे वृक्ष यात्रियों के लिये जानलेवा साबित होते रहते हैं। यद्यपि यही अधिकारी कीमती सरकारी पेडों को चोरी छिपे कटवाने के कारनामें खूब करते हैं । लेकिन ये सब निजी हित में होता है जनहित में काम करने के लिये पूरे कायदे कानूनों का पालन किया जाता है जो ज्यादातर किसी काम को न करने के लिये अडगेंबाजी के लिये जाने जाते हैं।
ये समस्या पैदा ही क्यों हाती है? आईये इस पर थोडा ठहरकर विचार करें। मुझे याद है कि जब हमारे गॉंव को शहर से जोडने वाला सम्पर्क मार्ग बनाया गया तो गॉंव के संकरें रास्ते की पैमाइश की गई। उस रास्ते के अगल बगल के खेतों की जमीन हडपी गयी। खेतों की मेड पर खडे जामुन और शीशम के पेड काट डाले गये। खेतो के सिरों को काटकर मिटटी उठायी गयी और एक उची सडक बना दी गई। उस सडक पर गॉंववालों की बैलगाडियॉं और साईकिले सहूलियत से चलने लगीं। शहर से इक्का- दुक्का मोटर भी आने -जाने लगी। दस बारह बरस बाद सडक का पेट फैलने लगा | उसे चौडा कर दिया गया । फुटपाथ की जगह सिकुड गयी। सडक के किनारे सामाजिक वानिकी योजना के तहत जो यूके लिप्टस के पेडों की तीन तीन पंक्तियॉं लगायी गयी थी,सडक उससे सट गयी। यू के लिप्टस के पेड इसलिये लगाये गये थे कि वे बिना ज्यादा देखभाल के बहुत जल्दी बढ जाते थे। यद्यपि बहुत से लोगों ने कहा कि ये पर्यावरण को हानि पहुचाते हैं,पानी बहुत पीते हैं लेकिन इमारती और ईधन की लकडी की मॉंग के अनुरूप पूर्ति उनके बिना संभव ही नहीं है, इसलिये वे रोपे गये । बाद में तो कृषि वानिकी में उसका सहोदर पापुलर भी उगाया जाने लगा, जो पर्यावरण के लिये इतना ही हानिकारक है। खैर
कुछ ही बरसों के बाद सडक पर स्कूटर, मोटर, साईकिल कार, ट्रक और बसों की इतनी रेलमपेल हो गयी की सडक पर जीवन बिल्कुल असुरक्षित हो गया। दुर्घटनाओं का तॉंतो लग गया। तब सडक को जरासंध की तरह दो हिस्सों में चीर दिया गया। उसकी छाती पर डिवाईडर तन गया। सडक के किनारे की एक एक पंक्ति उसकी भेंट चढ गयी। फुटपाथ वह पहले ही हजम कर चुका था। अब साईकिल वालो,पैदल चलने वालो, बच्चों, बूढो, विकलॉंगों के चलने के लिये सडक पर कोई जगह नहीं बची थी। वाहन वालों के लिये कुछ दिन आराम रहा। आमने सामने की टक्कर बन्द हो गयी लेकिन कुछ दिन में उनकी तादाद बढते बढते यह नौबत आ गयी कि अब वो एक लाईन में चलते चलते भी दूसरे से आगे निकलने के चक्कर में एक दूसरें पर चढ जाते। समस्या ज्यूँ की त्यूँ थी । सडके हॉंप रहीं थीं सरकारे भी व्यवस्था बनाये रखने में हॉंप रही थीं। अत: सड़क किनारे के पेड़ों की अंतिम कतार का भी कटान किया कर सड़क को ओर चौड़ा किया गया . लेकिन यातायत में राहत फिर भी नहीं है.
कुछ शहरों में हालत यह हो गयी है कि पेडों या फुटपातों का कोई नाम निशान बाकि न रहा है। सडके घर की चौखट तक सट गयीं। अनेक बार सडक पर चलते वाहन अनियंत्रित होकर घरों में घुस गये और सोते हुये लागों की छाती पर जा चढे। आदमी जो सोये थे सोये के सोये रह गये।
जहॉं सडकों के किनारे पर कुछ पेड किसी कारण से बचे हुये थे, वे अक्सर ऐसी विपदाओं को अपने उपर झेल लेते और वाहन चालक की मौत की घन्टी बजा देते थे। अब सवाल ये है कि कसूर किसका है सडक पर खडे पेडो का या वाहन चालको का है? पर्यावरणवादी डटे हैं कि पेडों को नहीं काटने देंगें चाहे कुछ हो जाये। कुछ क्या हो जाये? आदमी इसी तरह यदा कदा मरते रहेंगें।
अभी कुछ बरस पहले हमारे शहर के सर्किट हाउस में खडा एक पुराना नीम का पेड अचानक गिर गया और उसके नीचे कुछ ही देर पहले आकर खडा हुआ जिला वन संरक्षण अधिकारी अपनी गाडी में ही बैठा हुआ दब कर मर गया। लोगों ने चुटकी ली इस अधिकारी ने बहुत पेड चोरी से कटवायें होंगें तभी पेड ने इसकी जान ले ली। लेकिन मामला एक अधिकारी की मौत का था किसी कामेडियन की मौत का नहीं था इसलिये तत्काल जर्जर पेडों की पहचान के लिये सर्वे का काम शुरू करा दिया गया। अखबारों में भी जहॉं तहॉं से खोखले पेडों के नीचे दबकर मरने की घटनाओं की झडी लग गयी। पेडों की शामत आ गयी । पेड करें तो क्या करें? पूरा माहौल उनके खिलाफ था। लौग हाथों में कुल्हाडे उठाये उनका काम तमाम करने के लिये सर उठाये घूम रहे थे। पेड थे जड। वे कही आ जा भी नहीं सकते थे कि अपनी हिफाजत के लिये सरकार को दरख्वास्त ही दे आयें। यूॅ भी उन्हें कहॉं मालूम था कि वे जिनके यहॉं दरख्वास्त लगाने की सोच रहे हैं वही तो उनके सफाये का आदेश दे रहें हैं। वे अपने बचाव के उपाय सोचते रहे उनके हितचिन्तक अखबारों और दूरदर्शनों पर चीखते चिल्लाते रहे, इधर उधर दौडते रहे और पेड बेचारे कटते रहे। जब इधर उधर भागने से जंगल के जानवर नहीं बच सके तो पेड कैसे बच सकते थे? वे सब काट डाले गये। हॉं हरियाली बचाओ का ज्यादा हंगामा हुआ तो उन्होंने ऐसे देशी और विदेशी पेड पौधे रोप दिये जिनसे लकडी के नाम पर कुछ ना मिलता था। पंछी जिस पर घोसला तो क्या बनाते बैठकर गा भी नहीं सकते थे। जानवर जो थोडे बहुत आदमी ने अपने खाने के लिये पाल लिये थे उनकी पत्तियाँ न खा सकते थे। हॉं उनसे कुछ लौग दूसरी तरीके से मुनाफा खूब कमा रहे थे।
अब पेड मुनाफे के लिये थे, सजावट के लिये थे, बनावट के लिये थे । ऐसे ही जैसे आदमी के पास कारें थीं, टीवी था, मोबाईल था, पिज्जा, बर्गर था। लेकिन कहीं शान्ति न थी । एक जंग थी आदमी रहे या जानवर और पेड । गरीब आदमी था तो उसका जीना गैर जरूरी माना जाने लगा। उसे जंगल से चीता आकर खा सकता था हाथी रोंद सकता था। गरीब आदमी कुछ करे तो उस पर तुरन्त कानूनी कार्यवाही होती थी। आदमी अमीर होता तो फिर कोई कानून न था। जानवर और पेड तो क्या पहाड, नदी यहॉं तक की गरीब आदमी को भी उसके लिये मरना पडता था। शहरी चालाक आदमी सब जगह जीत रहा था फिर भी दुखी था। लेकिन किसी को कोई समाधान ना सूझता था। किसी की समझ में न आता था कि ऐसा कैसे हो कि मोबाईल की टोन भी सुनायी दे और पंछी भी पेडों पर चहचहायें? ये कैसे हो कि रेल भी दौडती रहे और चीता भी दौड लगाता रहे ? ये कैसे हो कि मल्टी स्टोरी इमारते भी खडी होती रहें और देवदार के पेड भी आकाश चूमते रहें? मनुष्य ने विकास का जो पैमाना स्वीकार किया उसमें आदमी के लिये तो जगह रखी गयी लेकिन बाकि सब के अस्तित्व को अनावश्यक माना गया ।
इस विकास के दुष्चक्र से आदमी दुखी था। उसे ये विकास अब अपना विनाश दिखता था। इससे कोई निजात न थी। ये आदमी कौन था? जिसने इस विनाश की राह को विकास का नाम दिया। खोजो वो वही है जिसे हमने सभ्यता और संस्कृति का प्रणेता माना है। नही तो आदमी जब जंगली था अपनी आवश्यकता भर शिकार करता था या कन्द मूल खा लेता था। बाकि समय वह भी शेर की तरह सोता था या बन्दरों की तरह उछलता कूदता था। उसे कल की चिन्ता न थी अतः संग्रह की भी आवश्यकता न थी। ये सब नहीं था तो प्रकृति को भी उससे कोई खतरा नहीं था। लेकिन विपरीत परिस्थितियों से बचने के लिये सुरक्षित आवास और भोजन के संरक्षण की आवश्यकता हुई और एक बार इसका प्रबन्ध कर लेने पर उसे इसमें सहूलियत महसूस हुई और वह इसके विस्तार में लग गया ।
मनुष्य की इस प्रवृत्ति से ही सभ्यता और संस्कृति का विकास हुआ जो प्रकृति का विनाश सिद्ध हो रहा है तथा मनुष्य के भी विनाश का हेतु बन रहा है। तो क्या मनुष्य जंगली बना रहे? नहीं यह नहीं हो सकता। तो फिर क्या विकास और विनाश की यह रप्तार जारी रहे? यह गम्भीर प्रश्न है जिस पर जरूर सोचा जाना चाहिये। ऐसा विकास जो अन्य जीवधारियों के अस्तित्व को मिटा रहा है, हमारे हित में नहीं है। कई देशों ने पर्यावरण अनुकूलित विकास का रास्ता अपनाया है बाकि देशों को भी यही राह अपनाने के लिये कहा जा रहा है। लेकिन वास्तविकता यही है कि उन देशों ने प्रदूषण फैलाने वाले उत्पाद अपने यहॉं ना उत्पादित कर दूसरे देशों से खरीदे हैं इस प्रकार दूसरे देशों के पर्यावरण की कीमत पर उन्होने स्वयं को इको फ्रेंडली रखा है। वे भूल गये की पृृथ्वी के किसी भी हिस्से में प्रकृति को नुकसान पहुॅचे उसका वैश्विक प्रभाव पडता है। इसलिये जब तक मानव अपनी आवश्यकताओं का विस्तार करता रहेगा तब तक र्प्यावरण की रक्षा संभव नहीं है। पर्यावरण को सबसे ज्यादा हानि स्वयं जनसंख्या में बेरोकटोक वृद्धि से हो रही है। इस पर रोक जरूरी है। लेकिन एक आदर्श जनसंख्या क्या हो ? यह तय करना बहुत मुश्किल है। अपने आसपास उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों को बिना स्थायी रूप से नष्ट या विकृत किये अपने उपयोग में लाते हुये सहज ढंग से जीवन यापन कर सकने वाली जनसंख्या ही आदर्श जनसंख्या होगी। यह समयानुसार बढती रहेगी और प्रकृति को कुछ बली देनी ही पडेगी इससे बचने का कोई उपाय नही हो सकता है। सभ्यता, संस्कृति और विकास सब इसी का नाम है।
विख्यात कामेडियन जसपाल भटटी की सड़क दुर्घटना में मौत होने का समाचार सुनकर सबको बडा सदमा लगा है। वे टी0 शो के लोकप्रिय अभिनेता और निर्माता थे। जैसा कि समाचारों से पता चला है कि भट्टी अपनी नयी फिल्म पावर कट के प्रचार के लिए जालंधर जा रहे थे तभी हाईवे पर उनकी कार एक पेड से टकरा गयी । सडक पर ऐसी दुर्घटनायें अक्सर होती रहती हैं। लेकिन जब कोई चर्चित या अजीज व्यक्ति ऐसी दुर्घटना का शिकार हो जाता है तो मन गहरे विषाद में डूब जाता है और कई प्रश्न मन को मथने लगते हैं।
सडक दुर्घटनाओं के जहॉं अन्य बहुत से कारण होते हैं वहीं एक बडा कारण सडक यातायात में अवरोधक बने वृक्ष भी होते हैं। जिसका आसान समाधान यह है कि ऐसे पेडों को तुरन्त काटा जाये। लेकिन पर्यावरण के प्रति जागरूकता के कारण कठोर वन संरक्षण अधिनियम के चलते सरकारी अधिकारी झमेले से बचने के लिये ऐसे वृक्षों के काटने की कार्यवाही नहीं करते और ऐसे वृक्ष यात्रियों के लिये जानलेवा साबित होते रहते हैं। यद्यपि यही अधिकारी कीमती सरकारी पेडों को चोरी छिपे कटवाने के कारनामें खूब करते हैं । लेकिन ये सब निजी हित में होता है जनहित में काम करने के लिये पूरे कायदे कानूनों का पालन किया जाता है जो ज्यादातर किसी काम को न करने के लिये अडगेंबाजी के लिये जाने जाते हैं।
ये समस्या पैदा ही क्यों हाती है? आईये इस पर थोडा ठहरकर विचार करें। मुझे याद है कि जब हमारे गॉंव को शहर से जोडने वाला सम्पर्क मार्ग बनाया गया तो गॉंव के संकरें रास्ते की पैमाइश की गई। उस रास्ते के अगल बगल के खेतों की जमीन हडपी गयी। खेतों की मेड पर खडे जामुन और शीशम के पेड काट डाले गये। खेतो के सिरों को काटकर मिटटी उठायी गयी और एक उची सडक बना दी गई। उस सडक पर गॉंववालों की बैलगाडियॉं और साईकिले सहूलियत से चलने लगीं। शहर से इक्का- दुक्का मोटर भी आने -जाने लगी। दस बारह बरस बाद सडक का पेट फैलने लगा | उसे चौडा कर दिया गया । फुटपाथ की जगह सिकुड गयी। सडक के किनारे सामाजिक वानिकी योजना के तहत जो यूके लिप्टस के पेडों की तीन तीन पंक्तियॉं लगायी गयी थी,सडक उससे सट गयी। यू के लिप्टस के पेड इसलिये लगाये गये थे कि वे बिना ज्यादा देखभाल के बहुत जल्दी बढ जाते थे। यद्यपि बहुत से लोगों ने कहा कि ये पर्यावरण को हानि पहुचाते हैं,पानी बहुत पीते हैं लेकिन इमारती और ईधन की लकडी की मॉंग के अनुरूप पूर्ति उनके बिना संभव ही नहीं है, इसलिये वे रोपे गये । बाद में तो कृषि वानिकी में उसका सहोदर पापुलर भी उगाया जाने लगा, जो पर्यावरण के लिये इतना ही हानिकारक है। खैर
कुछ ही बरसों के बाद सडक पर स्कूटर, मोटर, साईकिल कार, ट्रक और बसों की इतनी रेलमपेल हो गयी की सडक पर जीवन बिल्कुल असुरक्षित हो गया। दुर्घटनाओं का तॉंतो लग गया। तब सडक को जरासंध की तरह दो हिस्सों में चीर दिया गया। उसकी छाती पर डिवाईडर तन गया। सडक के किनारे की एक एक पंक्ति उसकी भेंट चढ गयी। फुटपाथ वह पहले ही हजम कर चुका था। अब साईकिल वालो,पैदल चलने वालो, बच्चों, बूढो, विकलॉंगों के चलने के लिये सडक पर कोई जगह नहीं बची थी। वाहन वालों के लिये कुछ दिन आराम रहा। आमने सामने की टक्कर बन्द हो गयी लेकिन कुछ दिन में उनकी तादाद बढते बढते यह नौबत आ गयी कि अब वो एक लाईन में चलते चलते भी दूसरे से आगे निकलने के चक्कर में एक दूसरें पर चढ जाते। समस्या ज्यूँ की त्यूँ थी । सडके हॉंप रहीं थीं सरकारे भी व्यवस्था बनाये रखने में हॉंप रही थीं। अत: सड़क किनारे के पेड़ों की अंतिम कतार का भी कटान किया कर सड़क को ओर चौड़ा किया गया . लेकिन यातायत में राहत फिर भी नहीं है.
कुछ शहरों में हालत यह हो गयी है कि पेडों या फुटपातों का कोई नाम निशान बाकि न रहा है। सडके घर की चौखट तक सट गयीं। अनेक बार सडक पर चलते वाहन अनियंत्रित होकर घरों में घुस गये और सोते हुये लागों की छाती पर जा चढे। आदमी जो सोये थे सोये के सोये रह गये।
जहॉं सडकों के किनारे पर कुछ पेड किसी कारण से बचे हुये थे, वे अक्सर ऐसी विपदाओं को अपने उपर झेल लेते और वाहन चालक की मौत की घन्टी बजा देते थे। अब सवाल ये है कि कसूर किसका है सडक पर खडे पेडो का या वाहन चालको का है? पर्यावरणवादी डटे हैं कि पेडों को नहीं काटने देंगें चाहे कुछ हो जाये। कुछ क्या हो जाये? आदमी इसी तरह यदा कदा मरते रहेंगें।
अभी कुछ बरस पहले हमारे शहर के सर्किट हाउस में खडा एक पुराना नीम का पेड अचानक गिर गया और उसके नीचे कुछ ही देर पहले आकर खडा हुआ जिला वन संरक्षण अधिकारी अपनी गाडी में ही बैठा हुआ दब कर मर गया। लोगों ने चुटकी ली इस अधिकारी ने बहुत पेड चोरी से कटवायें होंगें तभी पेड ने इसकी जान ले ली। लेकिन मामला एक अधिकारी की मौत का था किसी कामेडियन की मौत का नहीं था इसलिये तत्काल जर्जर पेडों की पहचान के लिये सर्वे का काम शुरू करा दिया गया। अखबारों में भी जहॉं तहॉं से खोखले पेडों के नीचे दबकर मरने की घटनाओं की झडी लग गयी। पेडों की शामत आ गयी । पेड करें तो क्या करें? पूरा माहौल उनके खिलाफ था। लौग हाथों में कुल्हाडे उठाये उनका काम तमाम करने के लिये सर उठाये घूम रहे थे। पेड थे जड। वे कही आ जा भी नहीं सकते थे कि अपनी हिफाजत के लिये सरकार को दरख्वास्त ही दे आयें। यूॅ भी उन्हें कहॉं मालूम था कि वे जिनके यहॉं दरख्वास्त लगाने की सोच रहे हैं वही तो उनके सफाये का आदेश दे रहें हैं। वे अपने बचाव के उपाय सोचते रहे उनके हितचिन्तक अखबारों और दूरदर्शनों पर चीखते चिल्लाते रहे, इधर उधर दौडते रहे और पेड बेचारे कटते रहे। जब इधर उधर भागने से जंगल के जानवर नहीं बच सके तो पेड कैसे बच सकते थे? वे सब काट डाले गये। हॉं हरियाली बचाओ का ज्यादा हंगामा हुआ तो उन्होंने ऐसे देशी और विदेशी पेड पौधे रोप दिये जिनसे लकडी के नाम पर कुछ ना मिलता था। पंछी जिस पर घोसला तो क्या बनाते बैठकर गा भी नहीं सकते थे। जानवर जो थोडे बहुत आदमी ने अपने खाने के लिये पाल लिये थे उनकी पत्तियाँ न खा सकते थे। हॉं उनसे कुछ लौग दूसरी तरीके से मुनाफा खूब कमा रहे थे।
अब पेड मुनाफे के लिये थे, सजावट के लिये थे, बनावट के लिये थे । ऐसे ही जैसे आदमी के पास कारें थीं, टीवी था, मोबाईल था, पिज्जा, बर्गर था। लेकिन कहीं शान्ति न थी । एक जंग थी आदमी रहे या जानवर और पेड । गरीब आदमी था तो उसका जीना गैर जरूरी माना जाने लगा। उसे जंगल से चीता आकर खा सकता था हाथी रोंद सकता था। गरीब आदमी कुछ करे तो उस पर तुरन्त कानूनी कार्यवाही होती थी। आदमी अमीर होता तो फिर कोई कानून न था। जानवर और पेड तो क्या पहाड, नदी यहॉं तक की गरीब आदमी को भी उसके लिये मरना पडता था। शहरी चालाक आदमी सब जगह जीत रहा था फिर भी दुखी था। लेकिन किसी को कोई समाधान ना सूझता था। किसी की समझ में न आता था कि ऐसा कैसे हो कि मोबाईल की टोन भी सुनायी दे और पंछी भी पेडों पर चहचहायें? ये कैसे हो कि रेल भी दौडती रहे और चीता भी दौड लगाता रहे ? ये कैसे हो कि मल्टी स्टोरी इमारते भी खडी होती रहें और देवदार के पेड भी आकाश चूमते रहें? मनुष्य ने विकास का जो पैमाना स्वीकार किया उसमें आदमी के लिये तो जगह रखी गयी लेकिन बाकि सब के अस्तित्व को अनावश्यक माना गया ।
इस विकास के दुष्चक्र से आदमी दुखी था। उसे ये विकास अब अपना विनाश दिखता था। इससे कोई निजात न थी। ये आदमी कौन था? जिसने इस विनाश की राह को विकास का नाम दिया। खोजो वो वही है जिसे हमने सभ्यता और संस्कृति का प्रणेता माना है। नही तो आदमी जब जंगली था अपनी आवश्यकता भर शिकार करता था या कन्द मूल खा लेता था। बाकि समय वह भी शेर की तरह सोता था या बन्दरों की तरह उछलता कूदता था। उसे कल की चिन्ता न थी अतः संग्रह की भी आवश्यकता न थी। ये सब नहीं था तो प्रकृति को भी उससे कोई खतरा नहीं था। लेकिन विपरीत परिस्थितियों से बचने के लिये सुरक्षित आवास और भोजन के संरक्षण की आवश्यकता हुई और एक बार इसका प्रबन्ध कर लेने पर उसे इसमें सहूलियत महसूस हुई और वह इसके विस्तार में लग गया ।
मनुष्य की इस प्रवृत्ति से ही सभ्यता और संस्कृति का विकास हुआ जो प्रकृति का विनाश सिद्ध हो रहा है तथा मनुष्य के भी विनाश का हेतु बन रहा है। तो क्या मनुष्य जंगली बना रहे? नहीं यह नहीं हो सकता। तो फिर क्या विकास और विनाश की यह रप्तार जारी रहे? यह गम्भीर प्रश्न है जिस पर जरूर सोचा जाना चाहिये। ऐसा विकास जो अन्य जीवधारियों के अस्तित्व को मिटा रहा है, हमारे हित में नहीं है। कई देशों ने पर्यावरण अनुकूलित विकास का रास्ता अपनाया है बाकि देशों को भी यही राह अपनाने के लिये कहा जा रहा है। लेकिन वास्तविकता यही है कि उन देशों ने प्रदूषण फैलाने वाले उत्पाद अपने यहॉं ना उत्पादित कर दूसरे देशों से खरीदे हैं इस प्रकार दूसरे देशों के पर्यावरण की कीमत पर उन्होने स्वयं को इको फ्रेंडली रखा है। वे भूल गये की पृृथ्वी के किसी भी हिस्से में प्रकृति को नुकसान पहुॅचे उसका वैश्विक प्रभाव पडता है। इसलिये जब तक मानव अपनी आवश्यकताओं का विस्तार करता रहेगा तब तक र्प्यावरण की रक्षा संभव नहीं है। पर्यावरण को सबसे ज्यादा हानि स्वयं जनसंख्या में बेरोकटोक वृद्धि से हो रही है। इस पर रोक जरूरी है। लेकिन एक आदर्श जनसंख्या क्या हो ? यह तय करना बहुत मुश्किल है। अपने आसपास उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों को बिना स्थायी रूप से नष्ट या विकृत किये अपने उपयोग में लाते हुये सहज ढंग से जीवन यापन कर सकने वाली जनसंख्या ही आदर्श जनसंख्या होगी। यह समयानुसार बढती रहेगी और प्रकृति को कुछ बली देनी ही पडेगी इससे बचने का कोई उपाय नही हो सकता है। सभ्यता, संस्कृति और विकास सब इसी का नाम है।

1-भूपट शूट -बहुत बढ़िया आलेख व अनुभव लिखा दोस्त. आप धन्यवाद के सुपात्र हैं.
जवाब देंहटाएं2-मणि बाला - सर दुर्घटना का अधिकतर कारण पेड़ नहीं नींद आना है . अगर पेड़ नहीं रहेंगे तो गर्मी में आप उन सड़कों पर सफ़र नहीं कर सकते हैं.
3-आप ठीक कहती हैं मणि बाला जी दुर्घटना का अधिकतर कारण पेड़ नहीं नींद आना है .और ये बात सही है कि अगर पेड़ नहीं रहेंगे तो गर्मी में उन सड़कों पर सफ़र नहीं कर सकते हैं . मैं भी यही कहता हूँ कि सड़कें जब भी चौड़ी होती हैं सबसे पहले पेड़ों कि ही बलि चढ़ती है. आखिर आदमी की आवाश्यकताओं का कोई अंत है या नहीं है ? और सबसे बड़ा सवाल ये है कि प्रकृति के निशुल्क उपहारों की हमें जरूरत है या नहीं है ? हम उनके बिना जिन्दा रह सकते हैं या नहीं ? क्या हम प्रकृति का विकल्प गढ़ सकते हैं ? मेरी समझ से इसका जबाब नहीं है .