लोग गुस्सें में हैं, लोग सडकों पर हैं सबके लबों पर एक ही पुकार है बलात्कारियों को फांसी दो, फांसी दो, फांसी दो. कुछ समझदार लोगों ने कुछ समझदारी भरी माँगें सरकार से की हैं .जनसंख्या के अनुपात में पुलिस बल कम है पुलिस के सिपाहियों की संख्या बढाई जाए. अदालतों में न्यायधीशों की संख्या कम है न्यायधीशों की संख्या बढाई जाए. अदालतों की संख्या कम है त्वरित न्याय के लिए अदालतों खासतौर से फास्ट ट्रैक कोर्टों की की पर्याप्त स्थापना में की जाए. जेल में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जाए. जाहिर है जेलों की संख्या भी बढानी पड़ेगी क्यूंकि हमारी जेलें पहले ही कैदियों से ठसाठस भरी हुई हैं. ये अलग बात है जेलों में ज्यादातर बेक़सूर लोग या कम कसूरवार लोग बंद हैं बड़े गुनाहगार तो जेलों से बाहर ही रहते हैं और अगर मजबूरी में जेल चले भी जाएँ तो जेल उनके लिए जेल नहीं रहती ऐशगाह बन जाती है. लेकिन यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या प्रस्तावित सुधार कर देने से जनता सुरक्षित हो जायेगी ? गुजरात,छत्तीस गढ़. मणिपुर और दूसरे राज्यों में भी पुलिस सहित काफी सुरक्षा बल है लेकिन वहाँ आम जनता सुरक्षित महसूस नहीं करती है और रसूख वालों को कोई असुरक्षा नहीं है. सरकार तो चाहती ही है कि वो मिलिटरी, पुलिस, कोर्ट और जेल के अलावा अपने ऊपर कोई जिम्मेदारी का काम न रखे बाकी जनता के सर डाल दे वो जाने और बाजार के दरिंदें जाने.एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए सरकार को अपने सामाजिक दायित्वों को पूरा करना चाहिए जिसमें जनता को बेहतर शिक्षा, बेहतर चिकित्सा, बेहतर रोजगार को उपलब्ध कराना मुख्य काम है. जिसके लिए सरकार को आवश्यक व्यवस्थाओं में बढ़ोत्तरी करनी होगी. ये ऐसी चीजें हैं जो दूरगामी, सकारात्मक और स्थायी बदलाव लाती हैं. लेकिन ये माँगें आज सभी के एजेंडें से गायब हैं. फांसी दो फांसी दो की रट लगाने वाले बतायेंगें कि फांसी से किस किस समस्या को सुलझायेंगें? हत्या, लूट, बलात्कार, आतंकवाद.वेश्या वृत्ति, समलैंगिकता, बाल शोषण, गऊ हत्या, प्रदूषण, मिलावट खोरी, चोर बाजारी ये सब अपराध बड़े भयानक रूप दिखला सकते हैं लेकिन सवाल यही है कि म्रत्यु दंड इनका हल कैसे कर सकता है? पहले जिन अपराधियों को दंड दिया गया क्या फिर वैसे अपराध नहीं हुए ? बलात्कार के मामले में ही धनंजय चटर्जी को फांसी दी गयी थी लेकिन उसके तत्काल बाद ही ऐसे अपराधों की संख्या यकायक ही बढ़ गयी थी. इससे भी दुखद यह रहा कि कई अबोध बच्चों ने धनजंय चटर्जी को फांसी दिए जाने की घटना की नक़ल करते हुए ही अपने प्राण दिए . ये कैसा सबक है जिससे अपराधी नहीं डरे और अबोध अपने प्राण दे बैठे ? क्या सजाय ए मौत मासूमों को डराने के लिए है ? वैसे भी सजाय ए मौत से अपराधी पर क्या फर्क पड़ता है ? उसे थोडा बहुत पछातावे का तात्कालिक एहसास हुआ भी हो वह ख़त्म हो जाता है . जब प्राण ही नहीं रहे तो गुनाह का एहसास ही कैसा ? मुर्दों को कोई तकलीप होती है क्या ? हम क्या चाहते हैं अपराधी को कुछ दर्द कुछ तलालीप कुछ पछतावा या शर्मिंदगी हो या वो इन सबसे आजाद हो जाए ? अगर हम वाकई में अपराधी को दंड देना चाहते हैं तो उसका जिन्दा रहना बहुत जरूरी है . उसका ज़िंदा रहते हुए किस तरह से सजा दी जाए जो सबको उदाहरण के रूप में ध्यान रहे ये सोचा जाना चाहिए . उसके लिए बहुत सी सजाएं हो सकती हैं मेरी निगाह सश्रम कठोर आजीवन तनहा कारावास एक सजा हो सकती है बाकी कुछ लोग और सजा भी सुझा सकते हैं. हाँ अगर आँख के बदले आँख हाथ के बदले हाथ बलात्कार के बदले बलात्कार सही सजा नहीं है तो म्रत्यु दंड वो कितना भी क़ानून सम्मत क्यूँ न हो. हरगिज उपयुक्त नहीं है.
لوگ گسسے میں ہیں، لوگ سڑکوں پر ہیں سب کے لبوں پر ایک ہی پکار ہے بلاتكاريو کو پھانسی دو، پھانسی دو، پھانسی دو کچھ سمجھدار لوگوں نے کچھ سمجھداری بھری ماگے حکومت سے کی ہیں. آبادی کے تناسب میں پولیس فورس کم ہے پولیس کے سپاہیوں کی تعداد بڈھائی جائے. عدالتوں میں نيايدھيشو کی تعداد کم ہے نيايدھيشو کی تعداد بڈھائی جائے. عدالتوں کی تعداد کم ہے فوری انصاف کے لئے عدالتوں خاص طور سے فاسٹ ٹریک كورٹو کی کی کافی قیام میں کی جائے. جیل میں سکیورٹی انتظامات سخت کی جائے. ظاہر ہے جیلوں کی تعداد بھی بڈھاني پڑے گی کیونکہ ہماری جےلے پہلے ہی قیدیوں سے ٹھساٹھس بھری ہوئی ہیں. یہ الگ بات ہے جیلوں میں زیادہ تر بے قصور لوگ یا کم كسوروار لوگ بند ہیں بڑے گناہ گار تو جیلوں سے باہر ہی رہتے ہیں اور اگر مجبوری میں جیل چلے بھی جائیں تو جیل ان کے لئے جیل نہیں رہتی ےشگاه بن جاتی ہے. لیکن یہاں قابل غور سوال یہ ہے کہ کیا مجوزہ اصلاح کر دینے سے عوام محفوظ ہو جائے گی؟ گجرات، چھتیس گڑھ. منی پور اور دوسری ریاستوں میں بھی پولیس سمیت کافی سیکورٹی فورس ہے لیکن وہاں کی عام عوام محفوظ محسوس نہیں کرتی ہے اور رسوخ والوں کو کوئی عدم تحفظ نہیں ہے. حکومت تو چاہتی ہی ہے کہ وہ فوجی، پولیس، عدالت اور جیل کے علاوہ اپنے اوپر کوئی ذمہ داری کا کام نہ رکھے باقی عوام کے سر ڈال دے وہ جانے اور مارکیٹ کے دردے جانے. ایک بہتر سماج کی تعمیر کے لئے حکومت کو اپنی سماجی ذمہ داریوں کو مکمل کرنا چاہئے جس میں عوام کو بہتر تعلیم، بہتر علاج، بہتر روزگار فراہم کرانا اہم کام ہے. جس کے لئے حکومت کو ضروری انتظامات میں اضافہ کرنا ہوگا. یہ ایسی چیزیں ہیں جو دوررس، مثبت اور پائیدار تبدیلی لاتی ہیں. لیکن یہ ماگے آج تمام کے اےجےڈے سے غائب ہیں. پھانسی دو پھانسی دو کی رٹ لگانے والے بتايےگے کہ پھانسی سے کس کس مسئلہ کو سلجھايےگے؟ قتل، لوٹ، عصمت دری، دہشت گردی. جسم فروشی انداز، ہم جنس، بال استحصال، گو قتل، آلودگی، ملاوٹ کھانا، چور بازاری یہ سب جرم بڑے بھیانک طور دكھلا سکتے ہیں لیکن سوال یہ ہے کہ مرتي سزا ان کا حل کیسے کر سکتا ہے؟ پہلے جن مجرموں کو سزا دی گئی کیا پھر ویسے جرم نہیں ہوئے؟ عصمت دری کے معاملے میں ہی ایسے چٹرجی کو پھانسی دی گئی تھی لیکن اس کے فورا بعد ہی ایسے جرائم کی تعداد یکایک ہی بڑھ گئی تھی. اس سے بھی افسوسناک یہ رہا کہ کئی معصوم بچوں نے دھنجي چٹرجی کو پھانسی دیے جانے کے واقعہ کی نقل کرتے ہوئے ہی اپنی جان دی. یہ کیسا سبق ہے جس سے مجرم نہیں ڈرے اور معصوم اپنی جان دے بیٹھے؟ کیا سجاي اے موت ماسومو کو ڈرانے کے لئے ہے؟ ویسے بھی سجاي اے موت سے مجرم پر کیا فرق پڑتا ہے؟ اسے تھوڑا بہت پچھاتاوے کا فوری احساس ہوا بھی ہو وہ ختم ہو جاتا ہے. جب جان ہی نہیں رہے تو گناہ کا احساس ہی کیسا؟ مردوں کو کوئی تكليپ ہوتی ہے کیا؟ ہم کیا چاہتے ہیں مجرم کو کچھ درد کچھ تلاليپ کچھ پچھتاوا یا شرمندگی ہو یا وہ ان سب سے آزاد ہو جائے؟ اگر ہم واقعی میں مجرم کو سزا دینا چاہتے ہیں تو اس کا زندہ رہنا بہت ضروری ہے. اس کا زندہ رہتے ہوئے کس طرح سے سزا دی جائے جو سب کو مثال کے طور پر یاد رہے یہ سوچا جانا چاہیے. اس کے لئے بہت سی سجاے ہو سکتی ہیں میری نگاہ سشرم سخت عمر تنہا قید ایک سزا ہو سکتی ہے باقی کچھ لوگ اور سزا بھی تجویز کر سکتے ہیں. ہاں اگر آنکھ کے بدلے آنکھ ہاتھ کے بدلے ہاتھ عصمت دری کے بدلے زیادتی صحیح سزا نہیں ہے تو مرتي سزا وہ کتنا بھی قانون سممت کیوں نہ ہو. ہرگز مناسب نہیں ہے.

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