[एक कविता कुछ जोड़ घटाकर ]
उठो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब केशव ना आयंगे
छोडो मेहँदी, खड्ग संभालो, अब केशव ना आयंगे.
द्यूत बिछाये बैठे शकुनि, दाँव चलेंगें खूब यहाँ
कैसे गद्दी रहे सुरक्षित,धर्म रहे वनवास कहाँ ?
एक यही चिंता है उनकी, तुम पर दाव लगायेंगें.
उठो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब केशव ना आयंगे.
कब तक आस लगाओगी तुम दुशासन सरकारों से
बहुत हो गया, निकल चलो अब बिक़े हुए दरबारों से,
स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं, वे क्या लाज बचायेंगे ?
उठो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब केशव ना आयंगे .
कल तक केवल अँधा था, अब राजा गूंगा बहरा है .
तेरे दुःख और अश्रु दामिनी, इन्हें समझ न आयेंगें ?
उठो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब केशव ना आयंगे.
-डॉ सुधीर श्रीवास्तव
ایک نظم کچھ جوڑ گھٹا
اٹھو دروپدي ہتھیار اٹھا لو، اب کیشو نا ايگے
چھوڑو مےهدي، كھڈگ سںبھالو، اب کیشو نا ايگے
ديوت بچھائے بیٹھے شكن، داؤ چلےگے خوب یہاں
کیسے گدی رہے محفوظ، انصاف رہے بن باس کہاں
ایک یہی فکر ہے ان کی تم پر داو لگايےگے.
اٹھو دروپدي ہتھیار اٹھا لو، اب کیشو نا ايگے.
کب تک آس لگاوگي، تم دشاسن حکومتوں سے
بہت ہو گیا، نکل چلو اب بقے ہوئے دربارو سے،
خود جو شرم احساس پڑے ہیں، وہ کیا شرم بچايےگے
اٹھو دروپدي ہتھیار اٹھا لو، اب کیشو نا ايگے
کل تک صرف ادھا تھا، اب راجہ گوگا بہرا ہے
ہونٹ سیل دیئے ہیں عوام کے، اور کانوں پر پہرہ ہے
تیرے دکھ اور اشر دامني، انہیں سمجھ نہ ايےگے؟
اٹھو دروپدي ہتھیار اٹھا لو، اب کیشو نا ايگے.
- ڈاکٹر سدھیر شریواستو

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