रविवार, 25 अप्रैल 2021

जनवादी गीत संग्रह : 'लाल स्याही के गीत' 34-अहमद फराज

 


                              अहमद फराज 

ये खेत हमारे ,ये खलिहान हमारे |                                                                                                                       पूरे हुए एक उम्र के अरमां हमारे |


हम वो जो कड़ी धूंप में जिस्मों को जलाएं 

हम वो हैं जो सहराओं को गुलज़ार बनाएं 

हम अपना लहू ख़ाक के तोड़ों को पिलायें 

इस पर भी घरोंदे रहे वीरान हमारे  |



हम रोशनी लाये थे लहू अपना बहाकर 

हम फूल उगाते थे पसीने में नहाकर 

ले जाता मगर और कोई फसल उठाकर 

रहते थे हमेशा तही-दामान हमारे  |



अब देश की दौलत नहीं जागीर किसी की 

अब हाथ किसी के नहीं तकदीर किसी की 

पांवों में किसी के नहीं जंजीर किसी की 

भूलेगी ना दुनिया कभी एहसान हमारे |


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