

[२३ साल पहले २२-२३ मई १९८७ को मेरठ के हाशियामपुरा में हुये साम्प्रदायिक नरसंहार को याद करते हुए श्री विभूतिराय नारायण राय ने अपनी बेबसाईट पर एक लेख लिखा है जिसे पढ़कर मुझे उसी समय लिखी हुई अपनी कविता' रोटी या राम' याद आ गई| जब दंगा हुआ तब नौचंदी का मेला था| उन दिनों मैं नौचंदी मैदान के पीछे रामबाग कालोनी में ही रहता था |कर्फ्यू में घर से निकल नहीं पाते थे|अपना आटे का कनस्स्तर खाली हो गया था | लोग सुरक्षा के लिए चन्दा मांगने तो आते थे पर आटा कोई किसी कीमत पर देने को तैयार नहीं था | एक दिन थोड़ी देर के लिए कर्फ्यू खुला तो मैं तुरंत साइकिल उठाकर अपने गाँव को भाग निकला | लेकिन रह रहकर यह ख्याल जरुर आता रहा की जिनके घर आटा ख़त्म हो गया होगा वो क्या खाकर रहेगें ? इसी चिंता और आक्रोश में यह कविता में लिखी गयी और कर्फ्यू ख़त्म होने के तत्काल बाद आयोजित साम्प्रदायिक लोगों के संगठन की सभा में ही सबसे पहले पढ़ी गयी | कविता पाठ के बाद सभा में बहस कविता पर केन्द्रित हो गयी और आयोजकों ने मुझे फिर कभी नहीं बुलाया | ]
रोटी या राम
मैं कहता हूँ उस स्थल पर बुलडोजर चलवा दो
जिसके कारण हप्तों मुझको नींद नहीं आयी है,
जिसके कारण चहल पहल आतंकित हुई शहर की,
जिसके कारण मेहनतकश बेकार हुये बैठे हैं,
रोगी बिना ओषधि के मजबूर हुये मरने को,
मुझे बताओ उन्हें राम की जन्मभूमि क्या देगी,
क्या बाबर का वारिस उनके हक में दुआ करेगा।
ओ भूखे की भाषण से ही भूख मिटाने वालो,
असल लडाई रोटी की है उससे क्यों बचते हो।
राम जन्मभूमि मुक्ति की हमको नही जरूरत
उसकी मुक्ति से तो हमको रोटी नहीं मिलेगी।
तुम हॅंसते हो धर्म कर्म की समझ नहीं है मुझको,
मुझे तुम्हारी हॅंसी जहर में बुझी हुई लगती है।
बाहर के उजलेपन से तो कालिख नही मिटेगी
मैं बाहर ही नही तुम्हारे अन्दर देख रहा हूँ ।
तुमने कब्र खोदकर मुर्दे परदेशों मे बेचे,
धर्म कर्म के नेता बनकर कैसे खडे हये तुम,
कही तुम्हारे अन्दर इसका नाम निषान है बाकी?
धर्म धुरन्धर होने का जो जितना दम भरता है
वह सभ्यता संस्कृति से उतना ही खाली है।
उसके अन्दर क्रूर राक्षस लेता है अंगडाई
हिंसा जिसका धर्म कर्म है मनुज रक्त को पीना।
इसीलिये तो कहा मार्क्स ने धर्म अफीम है भाई
असर हुआ उसका फिर हम ये जान नही पाते हैं|
पूंजीपति पुजारी कैसे ऐश किया करते हैं,
हम मेहनत करके भी रोटी जुटा नहीं पाते क्यों?
कैसे ऊँची होती जाती मस्जिद की मीनारे,
कैसे चकाचोंध महलों की बढती ही जाती है|
जबकि कुटिया के ऑंगन में दीप नही जल पाता,
टूटा छप्पर ठीक कराना मुश्किल हो जाता है।
निराकार ईश्वर के मन्दिर की खातिर लडते हो
जबकि नर नारायण खुद फुटपाथों पर सोता है|
सीता धोती फटी पहनकर कचरा बीन रही है,
लवकुश बेचारे झूठे प्याले धोया करते हैं।
यही तुम्हारा धर्म यही संस्कृति है गौरवशाली
जीवित को दें छोड मृत के अवशेषों को पूजें।
रोटी से भी बडा प्रश्न है जहॉं किसी मन्दिर का
ऐसे धर्म प्रिय समाज में हमें नहीं रहना है।
मेहनतकश के विरूद्ध यहॉं षडयन्त्र दिखायी देता,
पूजीपति पुजारी शासक का पापी गठबन्धन|
कामगार का खून चूंसकर बढता ही जाता है,
असल समस्याओं को तो वह छूने भी न देता।
सावधान सब लडने को अपने हथियार उठा लो,
इस पापी गठबन्धन को अब तहस नहस करना है।
एक लडाई लम्बी लडनी है अब हमको इससे,
क्योकि मॉंगने तो हमको कुछ भी नहीं मिलेगा।
मैं दलितों का विद्रोही स्वर बनकर गरज रहा हूँ ,
मेरी यह आवाज कोई भी दबा नहीं पायेगा।
चाहे फिर तनखैया घोषित कर दें ग्रन्थी मुझको
चाहे नक्सलवादी कहकर शासक गोली मारे।
फिर कहता हूँ उस स्थल पर बुलडोजर चलवाकर
अस्पताल या खेलो का मैदान एक बनवा दो।
कारण भरतवासी हैं कमजोर बहुत ही तन से
और स्वस्थ मन नहीं किसी बीमार बदन में रहता।
जबकि स्वस्थ मन आवश्यक है,स्वस्थ स्वच्छ चिन्तन हित
स्वस्थ स्वच्छ चिन्तन समाज को नई रौशनी देता|
जिससे वह हल करता वह अपने उलझे हुये सवाल
भूखा भजन करेगा या रोटी पहले खायेगा?
करते रहें मगजपच्ची इतिहास जानने वाले
देते रहें दुहाई धर्माचार्य धर्मरक्षा की ।
हम ऐसे पूजास्थल की नींव उखाड फेंकेंगे,
मनुज जहॉं पर मनुज नहीं हिन्दू मुस्लिम बनता है।
अपने लिये तो सारी धरती एक महामन्दिर है,
जिसका हर प्राणी देवता है स्वयं एक अपने मे।
भाग्य विधाता नहीं है जिसका कोई ऊपर वाला।
वह चाहे तो इसी धरा को स्वर्ग बना कर रह ले।
आज यही विश्वास सभी के मन में हमें जगाना
सारी जटिल समस्याओं का समाधान है ये ही
वरना ठेकेदार धर्म के लडवाते जायेंगें,
यूं शासन की ओर देखने से कुछ भी न होगा।|
अमरनाथ 'मधुर '
madhurji आज और अभी इस कविता को पढ़ा .इसे पहले भी पढ़ा था .ये कविता कैसे हर बार नए अर्थों के साथ उपस्थित हो जाती है .बधाई .
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