मंगलवार, 17 जुलाई 2018

भीड़ तंत्र के भेड़िये



देश विदेश की महत्वपूर्ण घटनाओं को देखने समझने के लिए नियमित न्यूज चैनल देखने सुनने का शौक है। पहले एन डी टी वी के रवीश कुमार  को जरूर सुनता था । रवीश के विचारों से सहमति रहती है तो भक्तों ने एकतरफा सोचने लिखने का आरोप मेरे उपर भी जड़ दिया। मैने सोचा कुछ दिन रवीश को नहीं सुनेगें और बाकि न्यूज चैनल को देखते.हैं, शायद कुछ बेहतर देखने सुनने को मिले। लेकिन कहीं किसी अन्य  न्यूज चैनल को सुनकर सन्तुष्टि नहीं मिलती है। इसलिए बेहतर बहस  की खोज में चैनल बदलता रहता हूँ। आज ऐसे ही चैनल बदल रहा था तो 'आज तक' पर देखा कि 'भगवा ब्रिगेड' द्वारा स्वामि अग्निवेश को पीटने का वीडियो दिखाया जा रहा है। ये देखकर बहुत डर लगने लगा, क्यूँकि स्वामि अग्निवेश गैरिकवेशी सन्यासी जरूर है लेकिन उस तरह के योगी सन्यासी नहीं है जिस तरह के सन्यासी आज जाने पहचाने जाते हैं। इसलिये उनके साथ जो बदसलूकी होती दिखाई दी वो शर्मनाक और दुखद है।


   दूसरे चैनल 'जी हिन्दूस्तान' पर देखा कि एक मौलाना चर्चा में शामिल महिलाओं से मारपीट कर रहा है। कुछ देर रुककर उसे देखा कि जनाब मौलाना अहमद नदीम काजमी सहाब ने बहस में शामिल मोहतरमा को अपशब्द बोले जिस पर उन्होंने मौलाना काजमी को तडाक से थप्पड़ जड़ दिया| बस फिर क्या था जबाब में जनाब काजमी ने हाथापाई शुरू कर दी। ये जो बड़े दानिश्वर बनाते हैं और टी वी डिबेट में घूम घूम कर लोगों को नसीहत देते रहते हैं उन्हें इतनी समझ नहीं थी कि वो महिला के थप्पड़ के जबाब में हाथापाई करने की बजाये कानूनी कार्यवाही करते ? लेकिन इतनी समझ की अपेक्षा आम आदमी से ही की जाती है जो ख़ास लोग हैं वो स्वयं को कानून से ऊपर समझते हैं और अपने निजी मसलें गैरकानूनी तरीके से अपने पक्ष में सुलटा लेते हैं| मौलाना काजमी ने यही किया |आखिर उनके पास भी मजहब कि बड़ी ताकत है जो देश के किसी कानून को नहीं मानती है |

     टी वी चैनल पर ये सब लाइव देखकर दहशत होने लगी कि अब जनता के मसले मुल्क में ऐसे निपटाये जायेंगें? शुक्र है फेसबुक पर कोई थप्पड़ नहीं मार पाता है वरना यहाँ तो थप्पड़ क्या लोग गोली मार देते। यूँ घर आकर ठोक देने की धमकियाँ यहाँ भी खूब मिलती है। लेकिन ऐसी हरकतों की यहाँ  मजमम्त भी खूब होती है जिसके कारण सही बात कहने का हौसला  बना रहता है। मेंरा मत है कि सन्यासी हो या मौलाना, औरत हो या मर्द किसी को भी जुबानी या शारीरिक हिंसा की छूट नहीं होनी चाहिये। बडे़ से बड़े मसले बातचीत से हल हो जाते है। जिन्हें पहले बलपूर्वक हल करने की कौशिश हो चुकी होती हो वो मसले भी अन्ततः बातचीत से ही हल होते हैं। लोकतंत्र भी संवाद से बढता है, जोर जबरदस्ती से ज्यादा दिन ज्यादा कुछ हासिल नही होता है । इसलिए हिंसा कभी नहीं होनी चाहिये। उक्त दोनों घटनाओं में जो लोग हिंसा के दोषी हों उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए वरना मुल्क में कायदे कानून होने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा |