'गणित'
प्राईमरी कक्षाओं में शिक्षा के बुनियादी विषय भाषा,गणित और इतिहास में गणित का स्थान दूसरा है। यह विषय जहॉं दैनिक जीवन में बराबर काम आने वाला है लेकिन बहुत महत्वपूर्ण होने के साथ -साथ छात्रों के अध्ययन के लिये सबसे कठिन भी माना जाता है। हिन्दी के महान कथाकार मुन्शी प्रेमचन्द गणित की शिक्षा को अपने लिये एवरेस्ट शिखर की चढाई के समान कठिन बताते थे।शिक्षा पद्धति को लेकर जहां अनेक विषयों की विषय सामग्री और प्रस्तुतीकरण को लेकर गहरा मतभेद है वहाँ गणित विषय सबसे कम विवादास्पद है, क्योंकि चाहे कैसे भी पढायें गणित में दो और दो चार ही होते हैं और उन्हें ज्यादा लाल पीला भी नहीं किया जा सकता है। लेकिन अगर आप गौर से देखें तो यह पायेंगें वर्गीय स्वार्थ इस विषय के साथ भी इस प्रकार गुम्फित हैं कि वे बाल मन को अपने अनुरूप जैसा ढालना चाहते हैं वैसा आसानी से ढाला जा रहा है। कुछ उदाहरण देंखें तो बात स्पष्ट हो जायेगी।
आप सबने गणित में लाभ हानि और काम के सवाल किये होंगें। ये सवाल कुछ इस तरह के होते हैं - किसी काम को 10 आदमी या 20 औरते 7 दिन में करते हैं तो उसी काम को 5 औरतें तथा 10 आदमी कितने दिन में पूरा करेंगें? उत्तर है -7 दिन में।
यह केवल सवाल नहीं हैं। आप देंखेगें कि अबोध मन के अन्दर लिंगभेद के संस्कार रोपित किये जा रहे हैं साथ ही शोषण की बुनियाद भी डाली जा रही है। जब यह बताया जा रहा है कि औरत पुरूष से आधा काम करती है तो जाहिर सी बात है कि वह पुरूष की तुलना में कमतर है इसलिये उसे मजदूरी भी आधी ही मिलेगी या उससे पूरा काम कराने के लिये ज्यादा वक्त तक काम लिया जायेगा। यह लडके और लडकियॉं उस उम्र में सीख रहे हैं जब उन्हें ठीक से अपनी शारीरिक भिन्नता का भी एहसास नहीं है।
ये लडके बडे होकर व्यापार,उद्योग,प्रशासन,राजनीति,समाज और धर्म कर्म अर्थात हर क्षेत्र में बहुतायत से शीर्ष पर होंगें और लडकियॉं बहुतायत में घर,गृहस्थी, खेत, खलिहान संभाल रहीं होगीं। पुरूष हर जगह निर्णायक स्थिति में होंगें और स्त्रियॉं आज्ञापालक । ये लडके बडे होकर इसी शिक्षा के कारण स्त्री के साथ होने वाले दोयम दर्जे के व्यवहार को, जिसमें कम मजदूरी का भुगतान से लेकर महत्वहीन समझे जाने तक की स्थिति शामिल है, उचित बल्कि न्यायोचित ठहरायेंगें। अगर कानून में स्त्रियों के संरक्षण को लेकर कोई प्राविधान किये भी गये हैं तो उनको लागू करने के प्रति उदासीन रहेंगें और यदि कोई उन्हें लागू करवाने की लडाई लडेगा भी तो उसे दबाना अपना फर्ज समझेंगें। स्त्रियों के इस दमन और उत्पीडन के लिये उन्हें कोई ग्लानि नहीं होगी बल्कि कई बार एक सन्तोष सा अनुभव करेगें क्योंकि उन्हें जो स्त्री को दोयम दर्जे का मानने की शिक्षा दी गई हैं वह समानता के अधिकार को भारतीय संस्कृति के उपर पश्चिमी की अपसंस्कृति का हमला मानेगी और उसका विरोध कर अपनी महान संस्कृति की रक्षा करना अपना कर्त्तव्य समझेगा ।
यही स्थिति बच्चों के शोषण की है। बाल श्रम कानूनों के होते हुये भी उद्योगों और व्यवसायों में खतरनाक परिस्थितियों में बच्चों से सस्ते मूल्य पर बेरोकटोक काम कराये जाने का राज यही है| स्कूल में सिखाया जाता है कि 'एक मजदूर या दो औरतें या चार बच्चे किसी काम को 6 दिन में करते हैं तो उसी तो उस काम को दो दिन में खत्म करने के लिये कितने बच्चें या कितनी औरतें चाहिये?'
क्या यह सवाल ऐसे नहीं हो सकते कि समान कार्य के लिये समान वेतन का कानून होते हुये भी एक फैक्ट्री मालिक 500 महिला श्रमिको को पुरूषों से आधी मजदूरी का भुगतान करता है ,यदि पुरूष श्रमिको का वेतन 4000रू0 प्रति माह हो तो वह इस प्रकार महिला श्रमिकों के शोषण से कितना मुनाफा कमाता है? यह भी बतायें कि यदि एक श्रमिक के कम वेतन भुगतान के लिये मालिक पर 5000रू0 अर्थ दण्ड तथा तथा 5000रू0 प्रति श्रमिक मानसिक क्षति पूर्ति किये जाने का प्राविधान हो तो मुनाफाखोर व्यवसायी को कितनी हानि प्रतिमाह होगी?
आपने ऐसी भाषा में लाभ हानि या काम के सवाल नहीं देखें होंगे। आपने ऐसे सवाल देखें होंगें - 'अरहर की एक किस्म की दाल 50 रू0 कि0ग्रा0 तथा दूसरी 60 रूप्ये कि0ग्रा0 है| दुकानदार उन्हें किस अनुपात में मिलाये कि 58 रू0 कि0ग्रा0 बेचने पर 5रू0 कि0ग्रा0 का लाभ हो?'
स्पष्ट हैं कि यह केवल लाभ हानि का सवाल नहीं है। यह वह शिक्षा है जो सिखाती है कि मिलावट करके माल बेचना जुर्म नहीं व्यापार है। यह कि बिना मिलावट के व्यापार में लाभ नहीं हो सकता। यह कि भले ही जनता का स्वास्थय खराब हो जाये, लेकिन व्यापार में लाभ अवश्य होना चाहिये। मुझे तो गणित की कितावों में एक सवाल भी नहीं मिला जिसमें पूछा गया हो कि यदि 'मिलावट का सामान बेचने पर एक वर्ष का कारावास और 10000रू0 का अर्थ दण्ड हो तो एक मिलावटखोर व्यापारी जिसकी दुकान से आय 20000रू0 मासिक है मिलावटी सामान बेचने के तुर्म में तीन महीने जेल में बन्द रहा हो तो उसे कितनी हानि हुई?
एक लघु व्यवसायी बहुत पढा लिखा नहीं होता। अमूमन हाईस्कूल या उससे भी पहले स्तर तक की शिक्षा प्राप्त करके वह अपने धन्धे में आ जाता है। इसी स्तर तक उसे यह लाभ हानि और शोषण की शिक्षा और संस्कार मिलते हैं, जिसके अनुरूप वह अपनी जिन्दगी का सफर तय करता है। बाद में उससे यह अपेक्षा करना कि वह श्रम कानूनों या उपभोक्ता कानूनों का पालन करे कुछ बहुत सही नहीं है। उसे पहले से ही ऐसी शिक्षा क्यों नहींे दी जाती जिससे वह गलत काम करते हुये नैतिक, कानूनी और सामाजिक रूप से अपने को अपराधी महसूस करे। महात्मा गॉंधी से लेकर अन्ना हजारे तक के आन्दोलन को वित्तपोषित करने वाला व्यवसायी वर्ग कही भी ऐसे अनैतिक और असामाजिक कार्य के लिये स्वयं को अपराधी अनुभव नहीं करता। सॉंस्कृतिक मूल्यों की रक्षा का दम्भ भरने वालों की शिक्षा तो और भी खतरनाक है। संघ के शिशु मन्दिरों में दी जाने वानी गणित की पाठय पुस्तके देखें उनमें ऐसे सवालों की भरमार मिलेगी। एक उदाहरण देखें -
'श्याम के पिता ने धर्मशाला के लिये 500रू0 गौशाला के लिये 1000रू0,शिशु मन्दिर के लिये 5000रू0 तथाराम मन्दिर निर्माण के लिये 10000रू0 दान दिये ।बताओ कुल कितनी धनराशि दान में दी गई?'
यह केवल जोड घटाव का सवाल नहीं है। इसके द्वारा यह बताया जा रहा है कि श्याम के पिताजी ने धर्मशाला और गौशाला की तुलना में शिशुमन्दिर और राम मन्दिर के लिये अधिक दान किया है। यानि कि सर्वोत्तम दान राम मन्दिर और शिशु मन्दिर को करना है, इन्हें पहले दान दिया जाना चाहिये। कहीं भी किसी अनाथलय या विधवा आश्रम या धर्माथ चिकित्सालय या पेय जल व्यवस्था हेतु दान देने का उदाहरण नहीं होगा। ऐसे उदाहरण उनके लिये बेकार है जिन्हें भारतीय संस्कृति की रक्षा की चिन्ता है।
एक उदाहरण यह भी मिलेगा-'विद्या भारती द्वारा संचालित विद्या मन्दिरों में गॉंधी जयन्ती 1200,लोकमान्य तिलक जयन्ती 1800 तथा हेडगेवार जयन्ती 16000 स्थानों पर मनायी गयी| बताओ किस महापुरूष की जयन्ती किस महापुरूष से कितने अधिक स्थानों पर मनायी गयी?'
देख लीजिये कितने भक्ति भाव से महापुरूषों की जयन्ती मनायी जा रही है। ये इतना ही नहीं बताता कि महापुरूष हेडगेवार की जयन्ती महात्मा गॉंधी और लोकमान्य तिलक से ज्यादा शिशु मन्दिरों ने मनायी है| वे मनाये उनके अपने स्कूल हैं| लेकिन यह प्रकारान्तर से बच्चों के मन में यह भाव पैदा कर रहा है कि महापुरूष हेडगेवार की जयन्ती सबसे ज्यादा मनायी गयी है तो जरूर हेडगेवार महात्मा गॉंधी और लोकमान्य तिलक से महान हैं? अब ये निष्कर्ष तो अपने आप ऐसे ही निकलते हैं जैसे कली से फूल या फूल से खुशबु।
एक उदाहरण और देखें सवाल है- 'संघ शिक्षा शिविर में महाराष्ट्र से 5000 गुजरात से 20000 राजस्थान से 2000 मध्य प्रदेश से 3000 उत्तर प्रदेश से 1000 बिहार से 2500 झारखण्ड से 3500 बच्चों ने भाग लेकर शस्त्र संचालन का प्रशिक्षण प्राप्त किया| बताओ कुल कितने बच्चों ने भाग लिया ? यह भी बतायें कि उत्तर प्रदेश की तुलना में गुजरात से कितनी अधिक संख्या में बच्चों ने भाग लिया?'
यह सवाल भी केवल जोड घटाव का सवाल नहीं है।यह बताता है कि संघ के शिशु मन्दिर सारे भारत में फैले है।और उनमें बडी संख्यामें बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यह भी कि बच्चों को प्रशिक्षण हेतु संघ शिविरों में भेजा जाना चाहिये| ये मत समझना कि आपको बच्चा छोटा है कौन उसे अपने से दूर भेजे? संघ शिविरों में दूर- दूर से बच्चे प्रशिक्षण प्राप्त करने आते हैं। यह बताया जा रहा है कि गुजरात में सबसे ज्यादा शिशु मन्दिरों में शिक्षा दी जा रही है, जबकि उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या कम है। मतलब कि उत्तर प्रदेश में इन सॉंस्कृतिक शिक्षा मन्दिरों की संख्या बढाये जाने की जरूरत है।
भारतीय संस्कृति की सुरक्षा के लिये स्वयंसेवक तैयार करने का काम ऐसे ही किया जाता है। ये स्वयं सेवक फिर भी बजरंग दल, शिवसेना, भगत सिंह सेना, श्रीराम सेना, दुर्गा वाहिनी आदि की कमान संभालते हैं। संस्कृति की रक्षा की बात ही इतनी सवेंदनशील है कि फिर कोई तार्किक बात नहीं सुनी जा सकती है।
भावुकता तर्क के लिये जंजीर की तरह है| पहले दसता की इन जंजीरों से स्वयं को आजाद कीजिये फिर आपकी समझ में सब बातें आ जायेंगी। आखिर संस्कृति के जिस भारी भरकम बोझ को हम अपने सिर पर लादे घूम रहें हैं, उसमें से अगर कुछ बेकार का बोझा कम कर दिया जाये तो कुछ हानि नहीं होगी|इससे हमारी पीठ सीधी हो जायेगी और अकडी हुई गर्दन को भी थोडा आराम मिलेगा।
महा पण्डित राहुल सॉंस्कृतायन ने अपनी पुस्तक 'मानव समाज' में लिखा है कि महान गणितज्ञ आर्यभटट ने हिसाब के सवाल इस प्रकार दिये हैं-
'एक सोलह वर्ष की दासी का 32 निष्क में मिलती है तो बीस वर्ष की दासी का दाम क्या होगा?'
यह सवाल कैसे हल किया जाता होगा, इस सम्बन्ध में राहुल जी ने कुछ नहीं लिखा है। शायद कुल मूल्य को वर्ष से विभाजित करके एक वर्ष का मूल्य निकालकर उसे वर्ष से गुणा करके बीस वर्ष की दासी का मूल्य निकाला जाता होगा। दासों की कीमत निर्धारण संभवत उनकी उम्र और कार्यक्षमता को देखकर ऑंकी जाती होगी। यही प्राचीन सभ्यता और संस्कृति है जिसका गुणगान करते हम नहीं थकते। यद्यपि पहली नजर में श्रमिक के श्रम का मूल्य आज भी लगभग ऐसे ही निर्धारित होता है।जब हम किसी मजदूर को काम के लिए तय करते हैं तो उसके डील डोल और अवस्था को देखकर यह अनुमान लगा लेते हैं कि वह काम करेगा या काम के नाम पर केवल खाना पूरी करेगा | ये माना जाता है की युवा और बलिष्ठ शरीर वाला मजदूर खूब काम करेगा| इसलिये दासी के मूल्य निर्धारण की बात को हवाई नहीं समझना चाहिये।
आधुनिकता शिक्षा अपने ढंग से अपने जीवन मूल्यों के साथ चल रही है। उपर कुछ उदाहरण मैंने दे दिये हैं। आप बहुत से खोज सकते हैं। एक उदाहरण ऐसा भी मिलेगा-'बबलू के पिता ने बबलू को 100 रू0 बाजार से सामान जाने के लिये दिये। बबलू बाजार से 5स्0 का पारले बिस्कुट, 20 रू0 की टाटा चाय, 20 रू0 का कोलगेट टूथपेस्ट, 20 रू0 की कैडबेरी चाकलेट लाया । बताओ वह कितने रूप्ये का सामान लाया तथा उसके पास कितने रूपये शेष हैं?'
ये गणित की शिक्षा ही नहीं है, एक तरह से तमाम कम्पनियों का विज्ञापन है और उपभोक्ता संस्कृति को बढावा देना है।यह एक ब्रॉंड विशेष जो अधिकतर विदेशी कम्पनियों के हैं उनको स्थापित करते हैं। बचपन से ही दिमाग में चस्पा किये जा रहे हैं |
अपनी बात को एक घटना के उल्लेख से समाप्त करता हूँ| कहते हैं कि एक अमरीकी प्रोफेसर समाजवादी शासन के दिनों में मास्कों के स्कूलों में गये। वहॉं उन्होंने बच्चों से पूछा कि 'बच्चों अगर तुमने एक पेंसिल 1 रूबल में खरीदी और 4 रूबल में बेच दी तो तुम्हें क्या मिलेगा? सारे बच्चों ने एक साथ कहा 'जेल'।
यह अन्तर है व्यवस्था के वर्गीय चरित्र का। शिक्षा अपनी वर्गीय जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने के कारखाने हैं। आपको तय करना होगा कि आप क्या चाहते हैं? एक लूट खसोट कर कुछ लोगों को अमीर बनाने वाला समाज चाहते हैं या सबके सुख दुःख को अपना समझने वाला शोषण मुक्त समाज चाहते हैं |











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