
हमारी विद्यालयी शिक्षा का एक प्रमुख विषय इतिहास है।यह वह विषय है जिसे लेकर सबसे ज्यादा विवाद होता रहता है। हरेक शासक और हर विचारधारा के व्यक्ति ने इसे अपने नजरिये से प्रस्तुत किया है। किसी एक के दृष्टिकोण से दूसरे का मतभेद होना स्वाभाविक है लेकिन इतिहास के विषय में यह मतभेद इतना तीखा हो जाता है कि सरकारें बदलने पर प्राय: सबसे पहले इतिहास की पाठय पुस्तके संशोधित की जाती है। सरकारें बदलती रहती हैं और उसी के साथ ही इतिहास की किताबे भी बदलती रहती हैं। इतिहास की पाठय सामग्री में बदलाव इस सीमा तक होता है कि प्राय: एक दूसरे की विरोधी बातें सत्ता बदलने पर सही या गलत ठहरायी जाती हैं। इतिहास के वास्तविक तथ्य कुछ ओर होते हैं और निष्कर्ष कुछ ओर निकाला जाता है। कई बार आधे अधूरे तथ्य ही प्रकाश में लायें जाते हैं। सुविधानुसार तथ्यों और घटनाओं का संकलन तो आम बात है।
सरकारी किताबें जो एन0सी0आर0टी0 द्वारा प्रकाशित हैं और जो राज्यों के शिक्षा बोर्डों द्वारा प्रकाशित की गई हैं और जिनका प्रयोग सरकारी ओर अधिकॉंश निजी विद्यालयों में शिक्षण कार्य के लिये हो रहा है उनमें इतनी भिन्नता है कि उनके आधार पर किसी एक निष्कर्ष पर पहुचना संभव ही नहीं है। इसके अलावा संघ शिक्षा पद्धति के विद्यालयों में पढाई जाने वाली इतिहास की किताबें हैं जो झूठ के पुलन्दों और घ्रणा के लतीफों के सिवा कुछ नहीं हैं।
एक उदाहरण देखें कक्षा सात की इतिहास की किताब में लिखा है कि महमूद गजनवी ने कन्नौज के दस हजार मन्दिरों का विध्वंस किया। विद्या भारती की किताबों में पढाया जा रहा है कि मन्दिर को मुक्त कराने के लिये तीन लाख चालिस हजार लागों ने कुर्बानी दी। पृथ्वीराज चौहान द्वारा अन्धा होते हुये भी मोहम्मद गोरी को भरे दरबार में तीर मारकर खत्म करने का गढा गढाया किस्सा ऐसे सुनाया जाता है जैसे वास्तव में मौहम्मद गोरी पृथ्वीराज के हाथों मारा गया हो। इसी प्रकार सिन्ध की राजकुमारियों द्वारा सिन्ध पर हमला करने वाले मुहम्मद बिन कासिम को अपनी आबरू का लुटेरा बताकर खलीफा के ही हाथों मरवा देने का किस्सा भी इतिहास की पाठय पुस्तकों में शामिल हैं।
ये सभी बातें ऐसी हैं जो तथ्य से बहुत दूर हैं। आर0एस0एस0 अपनी नीति के अनुरूप् मुसलमानों के प्रति घ्रणा फैलाने वाली कहानी गढकर उन्हें इतिहास के नाम पर पढाता है। वह बार-बार राणा प्रताप और शिवाजी को हिन्दू धर्म का रक्षक बताकर उनका गुणगान करता रहेगा लेकिन कभी यह नहीं बतायेगा कि उनके प्रमुख सेनानायक और सलाहकारों में मुसलमान भी शामिल थे। वह यह भी नहीं बताता कि अकबर और ओरंगजेब के प्रधान सेनानायक राजपूत थे। वह राणा सॉंगा और बाबर के युद्ध को साम्प्रदायिक रंग देकर चित्रित करेगा लेकिन यह नहीं बतायेगा कि बाबर को भारत पर आक्रमण के लिये आमंत्रित करने वाला राणा सॉंगा ही था और और बाबर के विरूद्ध युद्ध लडते हुये मारे जाना वाला इब्राहिम लोदी मुसलमान था।
मुसलमानों के बाद और मुसलमानों के पहले के इतिहास के बारे में इनकी अलग दृष्टि है। उनके अनुसार मुसलमानों के आने से पहले यहॉं हिन्दू स्वर्ण युग था जिसमें सब अच्छा ही अच्छा था।अग्रेंजों बारे में इनका कहना है कि वे मुसलमानों से अच्छे हैं और बॅटवारे का जिम्मेदार केवल गॉंधी है। उनके अनुसार सावरकर और हेडगेवार सबसे बड़े देशभक्त हैं। ये कुछ प्रमुख प्रस्थापनायें हैं जिनकी पुष्टि के लिये मनगढंत किस्से कहानियॉं को सच्चा इतिहास बताते हैं।
मुगलों के अत्याचार और राजपूतों के बलिदानों की कहानियॉं बहुत बढा चढाकर सुनायी जाती हैं, जैसे मुगलों ने हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया, मंदिरों का विध्वंस किया, राजपूतनानियों ने अपनी आबरू की रक्षा के लिये अपने को आग को हवाले कर जौहर किया आदि आदि।ये सब इसलिये बताया जाता है ताकि मुसलमानों को अत्याचारी और देशद्रोही सिद्ध किया जा सके। यह नहीं पढया जाता कि राणा सॉंगा की विधवा और मेवाड की महारानी कर्णावती ने मालवा के मुस्लिम बादशाह से अपने राज्य की रक्षा के लिये हुमायूँ के पास राखी भेजकर सहायता की याचना की थी।
हुमायूँ रानी कर्णावती द्वारा उसको भाई का मान दिये जाने से इतना गोरवान्वित हुआ कि वह शेरशाह के साथ चल रहे अपने युद्ध को सेनापतियों के भरोसे छोडकर तत्काल महारानी कर्णापती की मदद के लिये चल पडा। यद्धपि इसका परिणाम यह हुआ कि शेरशाह युद्ध में जीत गया और हुमायूँ की सेना को हार का मुँह देखना पडा लेकिन हुमायूँ ने भाई बहिन के रिश्ते और हिन्दु मुस्लिम एकता की एक नई मिसाल कायम कर दी।
एक और भी घटना है जिसने इतिहास का नया अध्याय लिखा।दारा शिकोह की बीवी नादिरा ने अपनी छातियों का दूध उतारकर जम्मू के राजा राजरूप् के लिये भेजा था ताकि मॉं के दूध को पीकर वह हिन्दू राजपूत मेरे साथ जुड जाये। राजा ने वचन दिया कि वह पहाडी राजाओं की सेना खडी करके दारा की मदद करेगा। लेकिन दूध पीकर, यकीन की सबसे बडी शपथ खाकर इस राजपूत ने अपनी मुहबोली मॉं के दूध का अपमान किया। दारा से लाखों मोहरे लेकर भी एक साल बाद ही देवराई के फैसलाकुन युद्ध में इस राजपूत राजा ने विष्वासघात किया और ओरंगजेब की ओर से दारा की सेना पर ही हमला कर दिया। दारा के सिपहसालार शहनवाज खॉं के पैर उखड गये और वह युद्ध से जान बचाकर भग निकला । ओरंगजेब की फोज जीत गयी।
एक और भी घटना है जिसने इतिहास का नया अध्याय लिखा।दारा शिकोह की बीवी नादिरा ने अपनी छातियों का दूध उतारकर जम्मू के राजा राजरूप् के लिये भेजा था ताकि मॉं के दूध को पीकर वह हिन्दू राजपूत मेरे साथ जुड जाये। राजा ने वचन दिया कि वह पहाडी राजाओं की सेना खडी करके दारा की मदद करेगा। लेकिन दूध पीकर, यकीन की सबसे बडी शपथ खाकर इस राजपूत ने अपनी मुहबोली मॉं के दूध का अपमान किया। दारा से लाखों मोहरे लेकर भी एक साल बाद ही देवराई के फैसलाकुन युद्ध में इस राजपूत राजा ने विष्वासघात किया और ओरंगजेब की ओर से दारा की सेना पर ही हमला कर दिया। दारा के सिपहसालार शहनवाज खॉं के पैर उखड गये और वह युद्ध से जान बचाकर भग निकला । ओरंगजेब की फोज जीत गयी।
इतिहास में यह कही नहीं पढाया जायेगा। बस यह बताया जायेगा कि ओरंगजेब ने मन्दिर तोडे और हिन्दुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाया। मन्दिर तोडे गये तो मस्जिदें भी तोडी गयी लेकिन वे धार्मिक कारणों से नहीं टूटी। उसके तोडने के कारण मंदिरों का राज सत्ता विरोधी और गैर धार्मिक कार्यों के केंद्र के रूप में उपयोग किया जाना था। ओरंगजेब और अन्य मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दू मनिदरों के निर्माण ओर उनके रखरखाव के लिये धन ओर जागीरें दान किये जाने के दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध हैं। अतः ये कहना कि वे हिन्दू धर्म के खिलाफ थे, बहुत सही नहीं है।
जबरन धर्मान्तरण के विरोध में सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि ओरंगजेब की चार पत्नियों में से एक नबाबबाई पहले हिन्दू थी जिससे बहादुरशाह का जन्म हुआ। दूसरी पत्नि दिलरस बानो शिया थी जिससे जेबुन्निसा नाम की पुत्री हुई जो फारसी में कवितायें लिखा करती थी। तीसरी पत्नी सरोपी हिन्दू थी और आजन्म हिन्दू ही रही। वह स्वाभिमानी स्त्री थी ओर अपने लालची माता पिता को बुरा भला कहती रहती थी। ओरंगजेब उसे उदयपरी कहता था क्योंकि उदयपुर वालो की तरह उसने भी ओरंगजेब को कभी सिर नहीं झुकाया। उसके पुत्र अकबर ने ओरंगजेब से विद्रोह किया वह पराजित होकर अपनी पत्नि के साथ ईरान भाग गया । सरोपी ने विषपान करके प्राण दे दिये।
ओरंगजेब की चोथी पत्नि मसीहन्नुसा ईसाई थी। वह आजीवन ईसाई ही रही। इस स्त्री को दारा गोवा से
लाया था। जब दारा को पकडकर हाथी पर बिठाकर दिल्ली की सडकों पर घुमाया गया तो हाथी पर मसीहन्निसा
भी बिठायी गयी थी। ओरंगजेब जनता को यह दिखाना चाहता था कि दारा विधर्मी है। ओरंगजेब ने बाद में उससे निकाह कर लिया जिससे कामबख्स का जन्म हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि जब ओरंगजेब अपनी चारों पत्नियों को उनकी इव्छा के विरूद्ध मुसलमान नहीं बना सका तो बाकि जनता को भी जबरन मुसलमान नहीं बना सकता था। असल में धर्म परिवर्तन अनेक कारणों से होता है जिसमें सबसे महत्वपूर्ण वह होता है जिसमें सबसे ज्यादा व्यक्तिगत लाभ हानि का प्रभाव रहता है।
मेवाड के राणा कुम्भा के शासनकाल में सन 1440 ई0 में मालवा और गुजरात की संयुक्त सेनाओं ने मेवाड पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में राणा कुम्भा की विजय हुई और गुजरात का शासक महमूद खिलजी बन्दी बनाकर मेवाड लाया गया। महमूद खिलती छ महीने तक मेवाड मे रहा बाद में महाराणा कुम्भा ने उसे बहुत सी बहुमूल्य भेंटे देकर गुजरात भेज दिया। इस युद्ध के बाद दोनो में मित्रता हो गयी। जब दिल्ली की फोजों ने मेवाड पर चढाई की तो महमूद खिलजी अपनी सेना लेकर राणा की सहायता को पहुच गया ।राणा की विजय हुई।
इतिहास में अनेक मिसालें मिलेंगी जिन पर हमें गर्व करना चाहिये। ऐसी भी बहुत घटनाये हैं जिनके कारण हम आज तक शर्मिन्दा हैं। जैसे हमारे यहॉं युद्ध कुछ खास जातियों का काम माना गया है वही समाज में प्रतिष्ठित जाति भी हैं। दूसरे देशों में यह भेदभाव नही था।महमूद गजनवी ने जब सोमनाथ पर चढाई की तब सोमनाथ मन्दिर के मुख्य पुजारी गंग के अविवाहित दासी के पुत्र देवस्वामि ने मातृभूमि की रक्षार्थ लडने के लिये पुजारी से अनुमति मॉंगी। देवस्वामि ने कहा तुम शूद्र हो तुम्हें शस्त्र उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अधिक आग्रह किये जाने पर देव स्वामि ने क्रुद्ध होकर कहा यह संकट टलते ही तुझे ब्राहमण के सम्मुख मुख खोलने और शस्त्र उठाने की शास्त्र विरूद्ध अक्षम्य बात सोचने के अपराध में दण्डित किया जायेगा।
देवस्वामि निराश होकर महमूद गजनवी की शरण में पहुच गया। महमूद गजनवी ने उसे फतेह मोहम्मद का नाम देकर सेना में अच्छे ओहदे पर रख लिया। जब वह महमूद गजनवी की ओर से लडने आया तो पुजारी गंग ने उसे धर्म की दुहाई दी और लडाई में महमूद के विरूद्ध लडने के लिये कहा लेकिन उसने साफ इनकार कर दिया और महमूद के लिये लड़कर विजय प्राप्त की। महमूद गजनवी की सेना में तिलक नाई भी सेना पति के पद पर था जिसने महमूद की ओर से तुर्कों पर विजय प्राप्त की थी।
निम्न जातियों साथ भेदभाव की दारूण दास्तानें बहुत हैं। ओरंगजेब ने जब आदिवासी सरदार पैमनायक को पंचहजारी ओहद देने की घोषणा की तो उसके टेडे मेडे शरीर और काले तॉंबे जैसे रंग को देखकर मुगल और राजपूत दरबारी मुस्करा पडे थें| ध्यान रहे ओरंगजेब ने यही ओहदा शिवाजी को भी दिया था। सारे दरबारी आदिवासी सरदार पैमनायक को घिनोना जीव मानते थे लेकिन ओरंगजेब को उस जैसे बहादुर को अपने साथ रखने में अक्लमन्दी नजर आती थी।
भारत सरकार ने 'असुर' को आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा है। अर्थात् आदिवासियों में भी प्राचीन। घने जंगलों के बीच ऊंचाई पर बसे नेतरहाट पठार पर रहने वाली सुषमा इसी 'आदिम जनजाति' असुर समुदाय से आती है। सुषमा गांव सखुआपानी (डुम्बरपाट), पंचायत गुरदारी, प्रखण्ड बिशुनपुर, जिला गुमला (झारखंड) की रहने वाली है। वह अपने आदिम आदिवासी समुदाय असुर समाज की पहली रचनाकार है। यह साधारण बात नहीं है। क्योंकि वह उस असुर समुदाय से आती है जिसका लिखित अक्षरों से हाल ही में रिश्ता कायम हुआ है। सुषमा इंटर पास है पर अपने समुदाय के अस्तित्व के संकट को वह बखूबी पहचानती है। झारखंड का नेतरहाट, जो एक बेहद खूबसूरत प्राकृतिक रहवास है असुर आदिवासियों का, वह बिड़ला के बाक्साइट दोहन के कारण लगातार बदरंग हो रहा है। आदिम जनजातियों के लिए केन्द्र और झारखंड के राज्य सरकारों द्वारा आदिम जनजाति के लिए चलाए जा रहे विशेष कल्याणकारी कार्यक्रमों और बिड़ला के खनन उद्योग के बावजूद असुर आदिम आदिवासी समुदाय विकास के हाशिए पर है। वे अघोषित और अदृश्य युद्धों में लगातार मारे जा रहे हैं। वर्ष 1981 में झारखंड में असुरों की जनसंख्या 9100 थी जो वर्ष 2003 में घटकर 7793 रह गई है। जबकि आज की तारीख में छत्तीसगढ़ में असुरों की कुल आबादी महज 305 है। वैसे छत्तीसगढ़ के अगरिया आदिवासी समुदाय को वैरयर एल्विन ने असुर ही माना है। क्योंकि असुर और अगरिया दोनों ही समुदाय प्राचीन धातुवैज्ञानिक हैं जिनका परंपरागत पेशा लोहे का शोधन रहा है। आज के भारत का समूचा लोहा और स्टील उद्योग असुरों के ही ज्ञान के आधार पर विकसित हुआ है लेकिन उनकी दुनिया के औद्योगिक विकास की सबसे बड़ी कीमत भी इन्होंने ही चुकायी है। 1872 में जब देश में पहली जनगणना हुई थी, तब जिन 18 जनजातियों को मूल आदिवासी श्रेणी में रखा गया था, उसमें असुर आदिवासी पहले नंबर पर थे, लेकिन पिछले डेढ़ सौ सालों में इस आदिवासी समुदाय को लगातार पीछे ही धकेला गया है।
झारखंड और छत्तीसगढ़ के अलावा पश्चिम बंगाल के तराई इलाके में भी कुछ संख्या में असुर समुदाय रहते हैं। वहां के असुर बच्चे मिट्टी से बने शेर के खिलौनों से खेलते तो हैं, लेकिन उनके सिर काट कर। क्योंकि उनका विश्वास है कि शेर उस दुर्गा की सवारी है, जिसने उनके पुरखों का नरसंहार किया था।
बीबीसी की एक रपट में जलपाईगुड़ी ज़िले में स्थित अलीपुरदुआर के पास माझेरडाबरी चाय बागान में रहने वाले दहारू असुर कहते हैं, महिषासुर दोनों लोकों- यानी स्वर्ग और पृथ्वी, पर सबसे ज्यादा ताकतवर थे। देवताओं को लगता था कि अगर महिषासुर लंबे समय तक जीवित रहा तो लोग देवताओं की पूजा करना छोड़ देंगे। इसलिए उन सबने मिल कर धोखे से उसे मार डाला। महिषासुर के मारे जाने के बाद ही हमारे पूर्वजों ने देवताओं की पूजा बंद कर दी थी। हम अब भी उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।
सुषमा असुर भी झारखंड में यही सवाल उठाती है। वह कहती है, मैंने स्कूल की किताबों में पढ़ा है कि हम लोग राक्षस हैं और हमारे पूर्वज लोगों को सताने, लूटने, मारने का काम करते थे। इसीलिए देवताओं ने असुरों का संहार किया। हमारे पूर्वजों की सामूहिक हत्याएं की। हमारे समुदाय का नरसंहार किया। हमारे नरंसहारों के विजय की स्मृति में ही हिंदू लोग दशहरा जैसे त्योहारों को मनाते हैं। जबकि मैंने बचपन से देखा और महसूसा है कि हमने किसी का कुछ नहीं लूटा। उल्टे वे ही लूट.मार कर रहे हैं। बिड़ला हो, सरकार हो या फिर बाहरी समाज हो, इन सभी लोगों ने हमारे इलाकों में आकर हमारा सबकुछ लूटा और लूट रहे हैं। हमें अपने जल, जंगल, जमीन ही नहीं बल्कि हमारी भाषा-संस्कृति से भी हर रोज विस्थापित किया जा रहा है।
यहां यह जानना भी प्रासंगिक होगा कि भारत के अधिकांश आदिवासी समुदाय 'रावण' को अपना वंशज मानते हैं। दक्षिण के अनेक द्रविड़ समुदायों में रावण की आराधना का प्रचलन है। बंगाल, उड़ीसा, असम और झारखंड के आदिवासियों में सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय 'संताल' भी स्वयं को रावण वंशज घोषित करता है। झारखंड-बंगाल के सीमावर्ती इलाके में तो बकायदा नवरात्रि या दशहरा के समय ही 'रावणोत्सव' का आयोजन होता है। यही नहीं संताल लोग आज भी अपने बच्चो का नाम 'रावण' रखते हैं। झारखंड में जब 2008 में 'यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस', यूपीए) की सरकार बनी थी संताल आदिवासी समुदाय के शिबू सोरेन जो उस वक्त झारखंड के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने रावण को महान विद्वान और अपना कुलगुरु बताते हुए दशहरे के दौरान रावण का पुतला जलाने से इंकार कर दिया था। मुख्यमंत्री रहते हुए सोरेन ने कहा था कि कोई व्यक्ति अपने कुलगुरु को कैसे जला सकता है, जिसकी वह पूजा करता है, गौरतलब है कि रांची के मोरहाबादी मैदान में पंजाबी और हिंदू बिरादरी संगठन द्वारा आयोजित विजयादशमी त्योहार के दिन मुख्यमंत्री द्वारा ही रावण के पुतले को जलाने की परंपरा है। भारत में आदिवासियों के सबसे बड़े बुद्विजीवी और अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान स्व. डा. रामदयाल मुण्डा का भी यही मत था।
देश के आम आदमियों के साथ इतिहास में बहुत अन्यायपूर्ण व्यवहार किया गया है |यही कारण है कि इतिहास में राजा रानियों के किस्से बहुत हैं, लेकिन सामान्य जन का कोई अता पता नहीं है। इतिहास लिखने के दो बेहतर ढंग हो सकते हैं पहला यह कि यह ऐसे काल खण्डों में विभाजित हो जिनसे सामाजिक परिवर्तनों के कारणों और उसके प्रभावों का राजसत्ता पर पडे प्रभाव का आकलन किया जा सके| खासकर यह देखा पढ़ाया जाना चाहिए कि व्यवसायों और उद्योगों के क्रमिक विकास से उसके कर्मकारों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में कैसे परिवारं होता है और यह परिवर्तन राजसत्ता को कैसे प्रभावित करता है | बजाय इसके कि राजसत्ता का जनजीवन पर क्या प्रभाव पडा। कई बार कुछ भी प्रभाव नहीं पडता| जनता कोउ नृप् होउ हमें का हानि की भाव दशा में रहती है। राजा लडते रहते हैं किसान हल चलाता रहता है। वह जानता है राजाओं का काम ही है लडते रहना उसे हल चलाना है चाहे जो राजा हो। ऐसे में देश पर मर मिटने का भाव कहॉं से जन्म ले सकता है।देश तो तब अपना है जब उसकी हिफाजत के लिये हम भी लडें जब उसके सुरक्षित/ असुरक्षित हाने पर हम पर भी वैसा ही प्रभाव पडे।
दूसरा तरीका यह है कि हम एक काल खण्ड का जब इतिहास पढाये उस काल खण्ड में विश्व में कहॉं क्या स्थिति थी यह भी साथ्र बताते चलें। आज इतिहास मे डिग्री हासिल कर लीजिये और आपको यह नहीं पता चलेगा कि रामायणकाल में चीन,मिश्र,यूनान, इग्लैण्ड जैसे देशों का जन जीवन कैसा था? अशिक्षित ही नहीं अल्पशिक्षित और शिक्षित लोग भी यह समझते हैं कि भारत प्राचीन काल में ज्ञान विज्ञान में बहुत बढा चढा था और बाकी दुनियॉ के सारे लोग असभ्य थे, जंगली थे। ये एक ऐसी गलतफहमी है जो अन्धराष्ट्रवाद को जन्म देती है।
अंतत: जैसा कि साहित्यकार राजेन्द्र यादव कहते हैं इतिहास तो सरकारी गवाह है उससे जैसा चाहे वैसा कहलवा लीजिये | आप चाहें तो उसमें से साम्प्रदायिक खून खराबे और विलासिता पूर्ण जीवन जीने वाले राजाओं के किस्से चुन लीजिये या मेहनतकश जनता के बलिदानों और सामप्रादायिक सोहार्द की मिसालें ले लीजिये| इतिहास में सब है लेकिन आप सारा एक साथ नहीं पढ़ा सकते| अब हमें यह तय करना है कि हम किस स्तर पर क्या पढ़ाएं कैसे पढ़ाएं? छोटी कक्षाओं में जब बच्चे का दिमाग कम विकसित होता है उसे सोहार्द की कथाएं ही पढाई जानी चाहियें, न कि नफ़रत और खून खराबे की दास्तानें | यह इसलिए भी जरूरी है कि बहुत संभव है वह उच्च शिक्षा न प्राप्त करे और इतिहास के विस्तृत और गहन अध्ययन से वंचित ही रह जाये | ऐसे में वैमनस्यता फैलाने वाले अधकचरे ज्ञान से सोहार्द बढाने वाला अल्प ज्ञान ज्यादा उपयुक्त रहेगा | जो लोग इतिहास का उच्च स्तरीय ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं वो वयस्क बुद्धि के होंगें और सारी वाकये को बेहतर ढंग से समझाने में समर्थ होंगें | उनसे कोई भी तथ्य छुपाया नहीं जाना चाहिए | समस्त तथ्यों के अध्ययन से निष्कर्ष निकालना वयस्क व्यक्ति का अधिकार है लेकिन यह कम उम्र में अपूर्ण और अधकचरे ज्ञान प्राप्त व्यक्तिओं का की बात नहीं, वयस्क व्यक्ति की बात है जिसे सही गलत का चयन करने का विवेक होता है |
-अमरनाथ 'मधुर'
[ इतिहास के वामपंथी विकृतीकरण को लेकर एक लेख अलग से प्रकाशित किया जायेगा| ]







1-गजेन्द्र परिहार - गज़ब की इनफोरमेसन
जवाब देंहटाएंहमारा ज्ञान बढाने के लिए थैंक्स |
2-भूपट शूट- अच्छा व पढ़ने, सिखने तथा समजने लायक आलेख . परिश्रमी को ह्रदय से धन्यवाद !
आरएसएस के शिशु शिक्षा मंदिरों में पढ़ाया जा रहा है किराम मंदिर का निर्माण राम के पुत्र कुश द्वारा कराया था |सबसे पहले यह मंदिर १५० ई0 पू० सिकनाद्र के सेनापति मिनांदर द्वारा तोडा गया था |
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जवाब देंहटाएंनजीर मालिक - महमूद गजनवी जब सोमनाथ को लूटने के लिए चला तो मुल्तान के मुसलमान शासक ने उसे रास्ता नहीं दिया, जिस पर गजनवी ने मुल्तान में आग लगा दी। वहां की मस्जिद को जला दिया। बाद में हिंदू राजा जयपाल ने रास्ता दिया। गजनवी जब सोमनाथ पहुंचा तो पुरोहितों ने मंदिर का पट खोल दिया। उस समय मंदिर प्रांगण में पचास हजार श्रद्धालु और सैनिक थे। पुजारी उन्हें बताते रहे कि लडने की जरूरत नहीं अभी भगवान गजनवी का नाश करने खुद आएंगे। भगवान तो नही आए, मगर पुजारियों ने पचास हजार लोगों की हत्या के साथ सोमनाथ के मंदिर को जरूर लुटवा दिया। पुजारियों के कारणकोई सैनिक प्रतिरोध नहीं हुआ।
जवाब देंहटाएंगल्त जनकारी
जवाब देंहटाएंकिस दुनिया में जी रहे हैं मित्र ? अगर मुस्लिम धर्मांतरण जबरन नहीं हुए तो सम्पूर्ण आर्यावर्त का इस्लामीकरण क्या प्यार से हो गया ? ज्यादा प्राचीन इतिहास छोड़ दें, कश्मीर का इस्लामीकरण किस प्यार-मोहब्बत में हुआ ? पाकिस्तान में १९४७ में १२% हिन्दू थे, आज कितने बचे ? ज्ञात है क्या आपको ? एहसान फरामोश बांग्लादेश तक ने हिन्दुओं को मारने और धर्मान्तरण में कोई कसार नहीं छोड़ी. जरा इतिहास फिर से पढ़ें.
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