गुरुवार, 3 मई 2012

अब झुके माथ ऊँचें होंगें


बहुत लुभाया 
मेरे   भाया , 
पर अब मन ये ऊब रहा है.
तुम हो वरिष्ठ 
गरिष्ठ बड़े हो 
बुद्धिजीवी आतंकवादी. 
तुमसे अपनी बात कहूँ मैं 
मेरी हिम्मत? 
हकलाती मेरी जबान है. 
मित्र मेरे 
तू तो महान है.
मैं ठहरा दुर्बुद्धि 
कम अक्ल 
बड़ी बात कैसे समझूंगा? 
क्या कहते थे- 
मार्क्स, एंगेल्स,
लेनिन,माओ ओ चेग्वेरा
किसे बुर्जुवा कहा गया है? 
क्या होता है सर्वहारा ?'
क्या जानूँगा? क्या समझूंगा ?

'पूछ लिए तुमने सवाल हैं?
या अब भी कुछ शेष बचा है?
मुझे लांछित करने वाला,
आरोपित हर प्रश्न तुम्हारा|
पूछो-पूछो बिलकुल पूछो
तुमको हक़ है,
हर सवाल का
उत्तर मुझको देना ही है,
पर क्या तुममें धैर्य शेष है?
उत्तर भी पूरे सुनने का,
चल न दोगे बिना सुने ही,
उत्तर उनका,
प्रश्न किये हैं जो कुछ तुमने
उनका उत्तर?
सुनो अगर तुम  सुन सकते हो -

तुम गांधी का चरखा कातो,
बाबा साहेब की जय बोलो, 
हाथी पाल लिया है तुमने, 
शक्ल तुम्हारी बदल गयी है, 
अक्ल तुम्हारी दूंढ रही है ,
फिर जंजालों में ही मुक्ति |
जब थक जाओ 
तब फिर आना 
मैं बैठा हूँ यहीं मिलूंगा 
रक्त वर्ण की ध्वजा उठाये 
इन्कलाब के गान सुनाता- 
'हम सारे जग के मालिक हैं 
मेहनत कश सारी दुनिया के 
खेत नहीं एक देश नहीं 
हम लेंगें सारा जग लेंगें |
सारी धरती है घर अपना 
हम खुद मालिक होंगें अपने 
सुन लो ओ सारे जग वालो 
सुन लो  ओ सारे रब वालो 
अब झुके माथ ऊँचें होंगें 
मालिक हम अपने खुद होंगें |'
               












-अमरनाथ 'मधुर' 

3 टिप्‍पणियां:

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  2. 1-अनूपअवस्थी- शब्द मन की सोच को उजागर कर रहे हे, शुरुवात में उन लोगो को इंगित गरती है जो आपके सोच से परेशां है , और बाद मै उन लोगो को इंगित करती है जिनको हम आंख मूंद कर जिनकी सोच का पीछा किया जा रहा है ,अलग अलग लेकिन सब एक है ," मैं बैठा हूँ यहीं मिलूंगा ,रक्त वर्ण की ध्वजा उठाये ,इन्कलाब के गान सुनाता", डित हो कभी हार नही मानोगे क्या? रस्ते से नही हठोगे तो लोग पत्थर समजेंगे, खेर हमारे देश में तो पत्थर ही पूजे जाते है. कुछ कमी नही है मेरे नजरिये से, शुरुवात में कुछ और मजबूती मिलनी थी सायद.... "अब झुके माथ ऊँचें होंगें ,मालिक हम अपने खुद होंगें | यही पन्तिया जान है । इतना लिखने के पीछे राज ये है की पड़ा नही समझने की कोसिस भी की है।
    May 3 at 8:50pm · Like · 2
    2-अमरनाथमधुर- मैं अपनी कविता के बारे में फेंडली जानना चाहता था |असल में इस शैली में मैंने कोई कविता नहीं लिखी है |इसलिए भी कुछ अच्छा बुरा सुनाने की इच्छा थी | दूसरी बात ये है कि कविता का पूर्वार्द्ध ही मन में उमंग सा जगा था बाद में तो पहिया लुढ़ककर अपनी पुरानी लीक में चला गया |वस्तुत: आदमी जिस विचारधारा के रंग में रंग जाता है वह मुश्किल से उतरता है |
    May 3 at 8:59pm · Like · 1

    3-पुश्कवीर सिंह भाटिया - वाह सुंदर
    May 3 at 9:07pm · Unlike · 1

    4-संजय दीक्षित - अक्ल तुम्हारी दूंढ रही है
    फिर जंजालों में ही मुक्ति
    जब थक जाओ
    तब फिर आना
    मैं बैठा हूँ यहीं मिलूंगा
    रक्त वर्ण की ध्वजा उठाये
    इन्कलाब के गान सुनाता-
    -------------सचमुच मुक्तिमार्ग तो एक ही है,कभी न कभी तो आना ही होगा इस परचम के नीचे,बहुत सुन्दर ,बधाई
    May 3 at 9:23pm · Unlike · 1

    5-संजय दीक्षित मुझे शेयर करने की अनुमति दें
    May 3 at 9:23pm · Like
    6-अमरनाथ मधुर अगर आप किसी लायक समझें तो जरूर करें |मुझे लिखने का हौसला मिलेगा |बहुत बहुत धन्यवाद |

    7-अनिल कुमार दोहरे - बहुत खूब .....कभी कभी अच्छा भी लिख देते हो मधुर जी .....
    May 3 at 9:00am via mobile · Unlike · 1
    8-अमरनाथमधुर - कभी कभी ? हा हा हा हा | आपकी नज़ारे इनायत हैं |
    May 3 at 9:06am · Like · 1
    9-अनिल कुमार दोहरे - आज है किस मंजिल पै इंसान, दिल में अंधेरा, रूख पै उजाले।......

    10-डी .के . बाजपेयी - बहुत खूब भाई जी ... बधाई ....
    May 3 at 8:37am · Like
    11-अरुण कुमार तुरैहा - गुड

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