इस हाथी से हमें बचाओ
हाथी जब जब भी आता था
फसल उजाडी चल देता था
ये हाथी?
पत्थर का हाथी?
खडा खडा ही सब खाता है।
नजर नहीं कुछ भी आता है
क्या क्या खाया?
कब कब खाया ?
कितना खाया कैसे खाया?
कितना फूल गया है देखो
कितना भारी हाथी है ये
ऐसा कभी नहीं देखा था
सुना नही था ऐसा हाथी|
जैसा अब हम देख रहमें हैं
बैठे माथा ठोक रहे हैं
ये सरकश में काम करेगा?
महाराज का पेट भरेगा?
या फिर कोई युद्ध लडेगा ?
पौरस और सिकन्दर वाला?
युद्ध नहीं लडता अब कोई
हाथी चढकर |
यूँ वैसे भी युद्ध कई हमने हारे हैं
हाथी पर जब किया भरोसा
रोंद दिया अपनी फौजों को
दुश्मन को जयमाल मिली है
जब जब हमने किया भरोसा
हाथी अपना सच्चा साथी|
सच्चा साथी अपना हाथी
पत्थर का है गच्चा देता
जब सच्चा था तब अच्छा था
सीदा सादा मस्तराम था
हमको भी कितना अराम था
कोई छेडे, कुछ भी बोले
चलता रहता अपने रस्ते
बालक छोड मदरसे बस्ते
चिल्लाते थे शौर मचाते
हाथी जाता, हाथी जाता।
हाथी को क्या पढे बेपढे
पडे, खडे या चढे अटारी
उसके लिये बराबर सारे
लडका, लडकी या नर, नारी
हाथी मस्ती में रहता था|
चमक बढ गयी,धमक बढ गई
ताकत भी बढ गई बहुत है
हाथी महलों में रहता है।
हाथी का अब मोल बहुत है
जिन्दा हाथी एक लाख का,
मरा अगर तो सवा लाख का,
और अगर पत्थर का है वो ,
उसकी कीमत को मत पूछो
पत्थर के हाथी की कीमत?
अब इतनी है नहीं मिलेगी।
अब हाथी अनमोल हो गया
बैठ नहीं सकते हो उस पर
छूकर देख नहीं सकते हो
हाथी अब संग मरमर का है|
चमक दमक कायम रखनी है
मैदानों को हरा भरा भी
पता नहीं कब भूख लगे फिर
याद करे उस हरी घास को
जिसे कभी खाया करता था|
हाथी भूल नहीं करता है
याद उसे महाराज अभी भी
जो उसको रोटी देता था
याद उसे बेबस किसान वो
जिसके खेतों के गन्ने का
स्वाद जुबॉं पर चढा हुआ है
रोम रोम में बसा हुआ है
रोम रोम में बसा हुआ है
'आहा याद बहुत आता है
गन्ने का रस मीठा मीठा
जो किसान गन्ना बोता है
वो भी तो खाता ही होगा ।
इसीलिये इतनी मिठास है
उस किसान के लोहू में ही
सभी उसे पीते रहते हैं
नेता हों या हों व्यापारी
नेता हों या हों व्यापारी
जिससे गालों पर लाली है
मोटे पेट हुये हैं उससे ।'
घास फूस कैसे खाउंगा
बुरी चीज है, लहु पियूँगा
मैं भी अब केवल किसान का
जाऊं भी तो ओर कहॉं मैं ?
हरे भरे ये खेत पडे हैं
इससे अच्छा कहाँ मिलेगा ?
मैं तो अब बस यही रहूंगा |'
लो जी लो पत्थर का हाथी
पसर गया सारे खेतों पर
नहीं उठाये से उठता है
ये हाथी पत्थर का हाथी
इस हाथी को दूर हटाओ
इस हाथी से हमें बचाओ।



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9-संदीप वर्मा सही कहा माथुर साहब इस हाथी ने तो इतिहास में बहुत सी हारों की जिम्मेदारी ली है .उनके बारे में आप भूल गए .आपका इतिहास ज्ञान जरा कम नजर आता है .जब तक ठाकुर साहब हाथी पर बैठे थे आप चुप थे ,जैसे ही शुद्र बैठा हाथी भी शुद्र हो गया ...|
जवाब देंहटाएंVikram Singh Rajput, Aakriti Singh, Aaliya Khan and 3 others like this.
10-ब्रजमोहन झा -शानदार सर
22 hours ago · Unlike · 1
11-संदीप वर्मा जल्दी में माथुर समझने की गलती के लिए क्षमा ,सही कह रहे हैं मधुर जी .मायावती नें कुछ बड़ी गलतियाँ की हैं ,उसके लिए कोई भी किन्तु परन्तु भी नहीं.जिस मानसिक यंत्रणा की आप बात कर रहे हैं मैं शायद समझ सकता हूँ ,क्यों कि मैंने भी मायावती के पहले काल के बाद से मात्र उनका छरण ही देखा और समझा है. मगर मज़बूरी है जो चुप कराती है. शायद कुछ बड़े प्रतीकों का लालच होना हमारी मजबूरी भी है जिसे मायावती नें जिसका शोषण किया. वैसे मैं आपके साथ ही खडा हूँ .
12-सत्येन्द्र श्रीवास्तव कुछ राजनीतिक लोग भी साहित्य की नगरी में कवी का चोला पहन विचरण करते हैं ...जय हो ..............
7 minutes ago · Like
13-अमरनाथ मधुर ये किसने कहा है कि साहित्य के स्वर्ग में राजनीतिज्ञों का या राजनीति में साहित्याकारों का प्रवेश वर्जित है ? जो ऐसा मानते हैं उनकी अपनी राजनीति है |
a few seconds ago · Like
बेनामीMay 6, 2012 06:59 PM
जवाब देंहटाएं-Nilakshi Singh हाथी नहीं गणेश है,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश है !
8 hours ago via mobile · Unlike · 4
2-Amarnath Madhur ये सारे पत्थर के देवता, इनसे अब तक आश तुम्हें है, इनसे अब तक स्नेह तुम्हें है, अब तक इनको बूझ रहे हो, अब तक इनको पूज रहे हो ? पूजो पूजो इनको पूजो, जब तक चाहो तब तक पूजो, कुछ भी इनसे नहीं मिलेगा, द्वार स्वर्ग का नहीं खुलेगा, जब थक जाओ तब आ जाना, साथ मेरे खुद स्वर्ग बनाना, नहीं हमारा और तुम्हारा, जो होगा जन जन का प्यारा |
7 hours ago · Like · 3
3-Nilakshi Singh तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा...
पूरब-पश्चिम
7 hours ago via mobile · Like · 1
4-Amarnath Madhur पत्थर के सनम तुझे हमने ......बड़ी भूल हुई.....|
7 hours ago · Like
5-Amarnath Madhur जब थक जाओ
तब फिर आना
मैं बैठा हूँ यहीं मिलूंगा
रक्त वर्ण की ध्वजा उठाये
इन्कलाब के गान सुनाता-
'हम सारे जग के मालिक हैं
मेहनत कश सारी दुनिया के
खेत नहीं एक देश नहीं
हम लेंगें सारा जग लेंगें |
सारी धरती है घर अपना
हम खुद मालिक होंगें अपने
सुन लो ओ सारे जग वालो
सुन लो ओ सारे रब वालो
अब झुके माथ ऊँचें होंगें
मालिक हम अपने खुद होंगें |
7 hours ago · Like
6-Girijesh Tiwari मित्र मधुर, मेरे पास प्रशंसा के लिये सच में उचित शब्द नहीं हैं. इस प्रतीक को इस तरह प्रस्तुत करना अदभुत है. मुझे फैज़ की रचना 'कुत्ते' याद आ रही है. सक्षम कलमकार इसी तरह प्रतीकों में नये अर्थ भर देते हैं. बधाई. बहुत बहुत बधाई.
about an hour ago · Unlike · 1
7-Amarnath Madhur कविता की समालोचना के लिए नीलाक्षी जी और गिरिजेश जी का बहुत बहुत धन्यवाद | आप यह नहीं जान सकते कि ये कविता मैंने कितनी मानसिक यंत्रणा और द्वंद्व झेलकर लिखी है |अपनों की सार्वजनिक आलोचना व्यक्ति तब करता है जब बहुत निराश और दुखी होता है | उत्तर प्रदेश में सरकार के भूमि हरण कार्यक्रम के विरुद्ध किसानों ने जो कुछ संघर्ष किया और जो रक्तिम बलिदान दिया उसे कोई अंधा बहरा ही सहन कर सकता है |हाथी सजीव रहता तो उसे कुछ एहसास भी रहता लेकिन संगमरमर के हाथी को इंसानों की क्या चिन्ता हो सकती थी? महलों में रहने वाली दौलत की महारानी ने भी ज़िंदा इंसानों की चिंता छोड़कर पत्थर के हाथी का ही निर्माण करने में अपने अधिकारों का दरुपयोग किया है| दिक्कत ये है कि हमसे संघ, भाजपा, कांग्रेस के तो हर गलत कदम पर शब्दबाण चलाने की अपेक्षा की जाती है लेकिन कम्युनिस्ट और बसपा के हर तरह के गलत कार्य को आँख, कान और जबान बंद रख कर समर्थन करते रहने की उम्मीद की जाती है | मुझे ये दोमुँहापन स्वीकार नहीं है| चाहे मेरे सारे दलित और वामपंथी साथी मुझसे अपने सम्बन्ध तोड़ लें मैं अपने लेखकीय दायित्व को अवश्य पूरा करूँगा| जब मैं संघियों के धमकाए में नहीं आता तो फिर और किसी की क्यों मानने लगा| साथ ही मैं ये भी स्पष्ट कहे देता हूँ कि मैडम मायावती को चाहे कोई प्रगतिशील माने मैं प्रगतिशील बिलकुल नहीं मानता हूँ |
9 minutes ago · Like · 1
8-Girijesh Tiwari मैं आप के हर शब्द से पूरी तरह से सहमत हूँ, मित्र.
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संदीप वर्मा सही कहा माथुर साहब इस हाथी ने तो इतिहास में बहुत सी हारों की जिम्मेदारी ली है .उनके बारे में आप भूल गए .आपका इतिहास ज्ञान जरा कम नजर आता है .जब तक ठाकुर साहब हाथी पर बैठे थे आप चुप थे ,जैसे ही शुद्र बैठा हाथी भी शुद्र हो गया ...|
Vikram Singh Rajput, Aakriti Singh, Aaliya Khan and 3 others like this.
ब्रजमोहन झा -शानदार सर
22 hours ago · Unlike · 1
संदीप वर्मा जल्दी में माथुर समझने की गलती के लिए क्षमा ,सही कह रहे हैं मधुर जी .मायावती नें कुछ बड़ी गलतियाँ की हैं ,उसके लिए कोई भी किन्तु परन्तु भी नहीं.जिस मानसिक यंत्रणा की आप बात कर रहे हैं मैं शायद समझ सकता हूँ ,क्यों कि मैंने भी मायावती के पहले काल के बाद से मात्र उनका छरण ही देखा और समझा है. मगर मज़बूरी है जो चुप कराती है. शायद कुछ बड़े प्रतीकों का लालच होना हमारी मजबूरी भी है जिसे मायावती नें जिसका शोषण किया. वैसे मैं आपके साथ ही खडा हूँ .
सत्येन्द्र श्रीवास्तव कुछ राजनीतिक लोग भी साहित्य की नगरी में कवी का चोला पहन विचरण करते हैं ...जय हो ..............
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अमरनाथ मधुर ये किसने कहा है कि साहित्य के स्वर्ग में राजनीतिज्ञों का या राजनीति में साहित्याकारों का प्रवेश वर्जित है ? जो ऐसा मानते हैं उनकी अपनी राजनीति है |
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