गुरुवार, 24 मई 2012

गजल-फूलों से बदन वाले बिकते हैं निवालों में



ये बात उभरती है रह-रह के ख़्यालों में|
फूलों से बदन वाले बिकते हैं निवालों में||

नकामिए-मंज़िल के सदमात ही इतने हैं|
एहसास नहीं होता तकलीफ़ का 
छालों में ||

हक़ खून के क़तरों का हम मांग तो लें लेकिन|
लगता है फ़रिश्ते हैं अब क़ैद शिवालों में||

दुनिया की सियासत ही मुफ़लिस पे मुसल्लत है|
फंसते हैं सियासतदां जरदार की चालों में||

हिन्दू औ मुसलमान थे कल कों मदारिस में|
ये बात भी आएगी बच्चों के सवालों में||

तहज़ीब-औ -शराफ़त बस कुछ रोज़ ठहर जाओ|
सुनने को मिलें शायद ये चीज़ मिसालों में||

वो मुल्क तबाही के होता है मुहाने पर|
मासूम भी बट जाएं जां मज़हबी 
पालों में||

یہ بات ابھرتی ہے رہ - رہ کے خيالو میں |
پھولوں سے بدن والے بکتے ہیں نوالو میں | |

نكامے - منزل کے سدمات ہی اتنے ہیں |
احساس نہیں ہوتا تکلیف کا چھلو میں | |

حق خون کے قترو کا ہم مطالبہ تو لیں لیکن |
لگتا ہے فرشتے ہیں اب قید شوالو میں | |

دنیا کی سیاست ہی مفلس پہ مسلط ہے |
پھستے ہیں سياستدا جردار کی چالو میں | |

ہندو او مسلمان تھے کل کوں مدارس میں |
یہ بات بھی آئے گی بچوں کے سوالوں میں | |

تہذیب - او - شرافت بس کچھ روز ٹھہر جاؤ |
سننے کو ملیں شاید یہ چیز مسالو میں | |

وہ ملک تباہی کے ہوتا ہے دہانے پر |
معصوم بھی بٹ جائیں جاں مذہبی لمحات میں | |


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