[ जब तालिबानी कठमुल्लाओं द्वारा 'बामियान बुद्ध' की प्रतिमा को तोड़ दिया गया और उससे कुछ वर्ष पूर्व भारत में बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया गया था तो उससे उत्पन्न आक्रामक धर्मोन्माद को द्रष्टिगत रखकर यह कविता लिखी गयी थी |बुद्धजयंती के अवसर पर भगवान बुद्ध की महानता और पराजित धर्मोन्माद पर फिर से नजर डालने की आवश्यकता अनुभव हो रही है | इसी सन्दर्भ में वह कविता प्रस्तुत है |]
नई चुनौती
बुद्ध और गॉंधी को फिर से मिलने लगी चुनौती, हिंसा नंगी नाच रही मानवता चुप चुप रोती।

कभी हथौडा कभी तोप बम हाथों में ले आया।
मुस्काते थे बुद्ध खडे इन्सान मूर्ख है कितना,
पत्थर के बुत ढहाने को श्रम व्यर्थ कर रहा इतना।
मैं कब रहा बुतो में मेरी दिल में पूजा होती||
गोरी और गजनवी तो थे बहुत बडे व्यापारी,
तुम हाथों में लिये हुये हो एक तलवार दुधारी।
वे तो लूट लूट कर अपने राजकोष को भरते,
तुम ऐसे नादान बेवजह बिना मौत ही मरते।
तालिबान कहते हो खुद को बुझा ज्ञान की ज्योति||
माना यह इतिहास कि हम काबुल से चलकर आये,
पर इसका क्या मतलब जो वो हमको ऑंख दिखाये।
बाबर का तो बहुत दिनों में अब नम्बर है आया,
यहॉं बुद्ध को हमने जाने कितनी बार मिटाया।
सदियों पिछड गये तुम हमसे कैसे समता होती||
बात पुरानी है ये जब हम बुद्धवाणी गाते थे,
दुनियॉं भर में धर्मदूत भारत भू से जाते थे।
अब तो अपने यहॉं एटमबम में ही बुद्ध मुस्काते,
ममता करूणा दया त्याग हम हिंसा पर्व मनातें |
बमबम का जयकारा हो गया पूजा और मनौति||
दुनियॉं भर में धर्मदूत भारत भू से जाते थे।
अब तो अपने यहॉं एटमबम में ही बुद्ध मुस्काते,
ममता करूणा दया त्याग हम हिंसा पर्व मनातें |
बमबम का जयकारा हो गया पूजा और मनौति||
संस्कृति के रक्षक भी हम तुमसे बहुत बडे हैं,
नई रौशनी के आगे हम सीना तान खडे हैं।
जेट विमानों के युग में हम रथ पर घूम रहे हैं,
रामभक्त स्वयंसेवक सारे लाठी चूम रहे हैं।
कण कण व्यापे राम बहुत अब अपनी हुये बपौति||
नई रौशनी के आगे हम सीना तान खडे हैं।
जेट विमानों के युग में हम रथ पर घूम रहे हैं,
रामभक्त स्वयंसेवक सारे लाठी चूम रहे हैं।
कण कण व्यापे राम बहुत अब अपनी हुये बपौति||
जब तुम हो हमराह हमारे फिर झगडा कैसा है,
जरा गौर से देखो नेकर भी अचकन जैसा है।
बुद्ध सरीखों से हमने कब का पाया छुटकारा,
रामभक्त गॉंधी से रहता अब संघर्ष हमारा|
नंगें बदन फकीर की हमने खींची खूब लंगोटी||
गॉंधी को भी पूज रहे हैं गॉंधी के हत्यारे, जब गोली से नहीं मरे वे पूज-पूज कर मारे। इसीलिये स्वदेशी अपने लिये सिर्फ नारा है, गॉंधी के हे राम से ज्यादा श्रीराम प्यारा है। रामभरोसे की रोटी में होती रोज कटौती।।
--- अमरनाथ मधुर