रविवार, 8 मई 2011

अध्ययन ---सन् सत्तावन की राज्य क्रान्ति-----


                                                                                                                                                            
                                                                                        




डा0 रामविलास शर्मा
‘‘अंग्रेजों के राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता लेकिन उनकी धरती पर रक्त भी कभी नहीं सूखता।’’
                    - अर्नेस्ट जोन्स
 अर्नेस्ट जोन्स इग्लैण्ड के  एक मजदूर नेता और कवि थे जिन्होंने  अपने बन्दी जीवन  सन् 1851 में ही भारत के स्वाधीनता सग्रंम की कल्पना करते हुये और यह विश्वास करते हुये कविता लिखी कि एक दिन भारत स्वंतंत्र हो जायेगा। ‘द न्यू वर्ल्ड’ नामक यह कविता 1857 में पुनः ‘दि रिवोल्ट आफ हिन्दुस्तान’  नामक शीर्षक से प्रकाशित हुई। मजदूर नेता अर्नेस्ट जोन्स को 1848 में कैद किया गया था। वे 13 फुट लम्बी और 4 फुट चौडी काल कोठरी में रखे गये। 1848-49 में एक प्रार्थना पुस्तक के पन्ने फाडकर उन पर अपने रक्त से उन्होंने यह कविता लिखी। जेल अधिकारियों ने उन्हें लिखने की सामग्री देने से इन्कार कर दिया था।                                                                      (पृष्ठ38)

 जब नील इलाहबाद से चला तो अपराधी निरपराधी का भेद किये बिना इतने आदमियों को फॉंसी दी कि उसके एक अफसर ने इस बिना पर उसका विरोध किया कि यदि देश जनशून्य हो गया तो  सामग्री कहॉ से मिलेगी। अग्रेंज हत्यारों में नील सबसे जघन्य राक्षस था। उसके रास्तें में जो भी गॉंव पडे उसने उन्हें जला दिया, जो मिला उसे पेडों पर फॉंसी पर फॉंसी देकर लटका दिया।बारह आदमियों को उसने सिर्फ इसलिये फॉंसी दी कि वे उल्टी तरफ मुंह  किये हुये थे। 
     हिन्दू गोमॉंस नहीं खाते, मुसलमान सूअर को अववित्र समझते हैं। इसलिये हिन्दुओं के मुंह  में गोमॉंस ठूसकर और मुसलमानों के बदन पर सूअर की चर्बी मलकर फॉंसी दी गईं । 

    अन्य शहरों, गॉंवों की तरह कानपुर को जी भर के लूटा गया। नाना सहाब का महल लूटने के बाद उसे गिरा दिया गया। नील ने हिन्दुओं और मुसलमानों से बीवीघर का खून चटवा कर साफ कराया और इस क्रिया के बाद उन्हें फॉंसी देता गया। (बीवीघर में अग्रेंज औरतों और बच्चे कत्ल हुये थे।)

     निकलसन का कहना था कि मारने से पहले सताने का कानूनी अधिकार होना चाहिये। अगेंरज स्त्री, बच्चों, बीमारों को मारने वालों को जिन्दा जलाने और खाल खीचनें का अधिकार मिलना चाहिये। 
                                                                               (पृष्ठ सं0 220-21-22)


   स्वाधीनता संग्राम के विरूद्ध अग्रेंज किस तरह के लौगों को बटोरते थे, इसकी सुन्दर मिसाल पठानों की भर्ती मे मिलती है। बेव ब्राउन ने लिखा... ‘क्या हुआ यदि इस भर्ती में डाकू, गुण्डे, भागे हुए कैदी, बेकार लफंगे थे, उन्हें अपने विरूद्ध होने देने से उन्हें पक्ष में कर लेना अच्छा था।’


    बेव ब्राउन डाकुओं और गुण्डों की भर्ती का उल्लेख करने के बाद कहता है कि पठानों में लूट से प्रेम होता है। इसी ने पंजाबियों के बारे में लिखा था कि गुरू तेगबहादुर की याद दिलाकर दिल्ली से बदला लेने के लिये खालसा सैनिकों की भर्ती करना काफी न था। इसलिये मजहबी सिख जो उनके अनुसार पहले हिन्दु भंगी  थे, बडी संख्या में भर्ती किये गये थे।
    सीमान्त के डाकुओं को भी लूट का लालच देकर चt राई सेना में भर्ती कर लिया गया।

 लखनउ में एक कश्मीरी लडका एक बूढे और अन्धे आदमी के साथ जा रहा था। वह एक गोरे अफसर के पैरों पर गिर पडा और जान बचाने की याचना की। इस अफसर ने पिस्तौल निकाल ली और घोडा दबाया। तीन बार गोली चलाने पर भी पिस्तौल न चली। चौथी बार उसने उस पर गरीब की जान ले ली। 
                                                                                                              (पृष्ठ 283)

      क्रान्ति का नारा था .. ‘ खल्के खुदा, मुल्के बादशाह, हुक्मे सिपाही।’


 क्रान्तिकारियों के साथ अनेक अग्रंज सैनिक और अधिकारी भी भारत की आजादी के लिये कन्धे से कन्धा मिलाकर लडे थे। इनमें एक अधिकारी का नाम गोर्डन था और दूसरे अग्रेंज ने बाद में अपना नाम अब्दुल्ला बेग रखकर इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था। इसी के परामर्श से बादशाह सेनाओं के नाम परवाने भेजा करता थे।
                                                                          (पृष्ठ  295...296)
     बरेली ब्रिगेड के तोपखाने के प्रधान यूरोपियन अफसर ने क्रान्तिकारियों को युद्ध संचानल में अन्त तक सहायता दी। विक्टोरिया के घोषणापत्र  के बाद उस यूरोपियन ने अनेक सिपाहियो को आत्मसमर्पण से रोका था और उन्हें समझाया था कि हथियार डालने पर उन्हें कुत्तों की तरह फॉंसी पर लटका दिया जायेगा।
    रसेल को उदधृत करते हुये 26 जून 1858 के लेख में एगेंल्स ने लिखा ‘लखनउ जीतने के बाद अग्रेंज फौजों की निष्क्रियता का कारण यह था कि लूट के काम में एक पखवारा अच्छा बीता। अफसरों और सैनिकों ने जब नगर में प्रवेश किया था तब वे गरीब और कर्जदार थे। वहॉं से निकलने तो अचानक अमीर हो गये। अब वे पहले वाले आदमी नहीं थे। फिर भी उनसे आशा की जाती थी कि वे पहले की तरह अपनी फौजी डयूटी बजा लायेंगें। ताबेदार होंगें, चपुचाप हुकुम का पालन करेंगें। लेकिन यह अब होने का नहीं। जो फौज लूट के लिये तितर बितर हो जाती है फिर वह सदा के लिये बदल जाती है। कोई भी हुकुम, कोई भी सेनापति या कितना भारी रोबदाब उसे पहले जैसा नहीं बना सकता। डेढ सौ अफसरों ने सर कोलिन कैम्पबेल को अपना इस्तीफा भेज दिया है। अग्रेंज सैनिक अपने ही भाई बच्चों को लूट रहे हैं। .... लूट लेने और लूट का माल पाने की इच्छा होती है, लूट के लिये आसपास हिन्दुस्तानी खजाना न मिले तो ब्रिटिश हकूमत के खजाने पर क्यों  हाथ साफ न किया जाये? रसेल ने लिखा था कि ‘‘वेतन वितरण करने वाले अफसर अग्रेंजों की अपेक्षा भारतीय सैनिकों को खजाने की चौकसी के लिये तैनात करना उचित समझते थे।’’
                                                                                                               ( पृष्ट395)
  दिल्ली में एक स्त्री सवार वर्दी पहने जनता की ओर से लडी। उसने ब्रिटिश सेना के घुडसवारों पर आक्रमण किया। हडसन के शब्दों में वह शैतान की तरह लडी । अग्रेंजों के ही अनुसार उसने दो सिपाहियों के प्राण ले लिये। ब्रिटिश सैनिक कहते थे कि वह अकेली ही पॉंच सिपाहियों से भयानक थी। अग्रेज सोचते थे कि वह दिल्ली में रहेगी तो लोगों को उत्साहित करती रहेगी। इसलिये उन्होंने उसे पकडने का विशेष प्रयत्न किया। उसके बाद अपनी सहज नीचता का परिचय देते हुये कर्लन कीथ यंग ने अपनी पत्नि को लिखा ‘‘ वह बूढी ओर बदसूरत है, इसलिये रोमांस की कोई गुंजाईश नहीं है। ’’
    एक बार दिल्ली के कुछ सैनिक एक मस्ज्दि में घुसे। वहॉं उन्होंने एक बूढी स्त्री को अपने लडके का शव लिये लिये देखा जो युद्ध मे मारा गया था । एक ब्रिटिश सैनिक ने उसे मारने के लिये कहते हुये बन्दूक उठायी कि स्त्रियॉं पुरूषों से भी से अधिक खराब हैं’’
                                                                                                                (पृष्ट सं0 194)
     लखनउ में  मिआगंज की जनता कितनी वीरता से लडी इसकी एक कहानी यह है कि एक मकान में एक नागरिक बन्दूक लिये अपने घर के पास खडा था।  जो भी उसके पास आता वह उस पर गोजी चलाता । अन्त मे गोली खाकर गिर पडा । उसकी वीरागंना पत्नि ने बन्दूक उठाकर गोली चलायी किन्तु निशाना चूक गया ओर दूसरे क्षण वह धराशायी हो गयी। 
                                                                                                                               (पृष्ट237)
      रसेल को शिकायत थी कि अपने आप तो कोई मदद करता ही नहीं है। किसानों से उनको किसी तरह की सहायता न मिलती थी उल्टे वे अग्रेंजों को चकमा देकर विद्रोहियों की ही सहायता किया करते थे। किसी से पूछों ‘यहॉं नदी कितनी गहरी है?’
 जबाब मिलता. ‘कभी कमर तक पानी रहता है, कभी गले तक।‘ 
पार करने को उथली जगह नहीं है?’ 
हॉं उधर को पॉंच कोस पर घुटनों पानी है?’
  ‘तोपें निकल जायेंगी?’ 
‘पता नहीं, शायद धॅंस जायें?’ 
‘पूछों तलहटी मुलायम है या सख्त?’ 
जबाब...‘मजे की है न बहुत मुलायम न सख्त।
अगले ‘गॉव के लिये रास्ता कैसा है?’ 
उसर है, झीले हैं, फिर कांस है, फिर जंगल है?’ 
जंगल से तो निकलकर जाया जा सकता है?’ 
‘रास्ता जरा सकंरा है। घूमकर जायें तो ज्यादा अच्छा हो।’ 
                                                            [पृष्ट266}
                ---'' सन् सत्तावन की राज्य क्रान्ति और मार्क्सवाद ''--ले०डा0 रामविलास शर्मा

  

1 टिप्पणी:

  1. १० मई १८५७ को मेरठ से प्रारंभ प्रथम क्रांति की यादगार चर्चा के लिए धन्यवाद.

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