
[डॉ0 रामगोपाल 'भारतीय ' गीत और गजल के सुकोमल कवि हैं | आपकी साहित्यिक सक्रियता और सबको साथ लेकर चलने का गुण आपको लोकप्रिय बनाता है | आप अखिल भारतीय साहित्य कला मंच के अध्यक्ष हैं और अनेक संस्थाओं में सक्रिय सहयोगी हैं | ]
गीत -1
गाँव और बचपन का रिश्ता , आँखे भूल नहीं पाती हैं|
शहरी तपती धूंप में मुझको घर की याद बहुत आती है |
बरगद के नीचे बच्चों का अपने हाथ मिलाकर चलना,
रोज शाम को चोपालों पर तेरी मेरी उसकी बातें
सारी रात कहानी किस्से, उस पर लालटेन का जलना|
घर में चाची जब चाचा से घूँघट में ही बतलाती है |
शहरी तपती धूंप में मुझको घर की याद बहुत आती है ||
रिश्तों -नातों की गरमाहट अब ठंडी -ठंडी लगती है,
चौकी, थाना और कचहरी ,गिद्धों की मंडी लगती है |
कहाँ गए सावन के झूले कहाँ गई वे ईद दिवाली
अब दिल की चिड़िया सोने के पिंजरे में बंदी लगती है|
रोज सुबह का वादा करके, रात सभी को बहकाती है |
शहरी तपती धूंप में मुझको , घर की याद बहुत आती है| |
सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंहकीकत में
वास्तविकता को दर्शाती कविता है.
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