
शिक्षा का उद्देश्य'
भारत में प्रचलित शिक्षा पद्धति को लार्ड मैकाले की देन कहा जाता है जो कथित रूप् से केवल क्लर्क पैदा करने के लिये शुरू की गई थी। अनेक शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों ने इस शिक्षा पद्धति में बुनियादी परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया है। इसमें बदलाव के लिये शासन स्तर से अनेक प्रयास किये गये तथा निजी शिक्षण संस्थानों ने भी शिक्षा पद्धति के अनेक मॉडल प्रस्तुत किये हैं। वैसे हमारी प्राचीन गुरूकुल तथा मुस्लिम मदरसा शिक्षा संस्था के साथ ही साथ ईसाई मिशनरी शिक्षा संस्थायें भी कार्यरत रही हैं जिनकी शिक्षा प्रणाली विवादास्पद रही है तथा जिसमें वक्त के अनुरूप बहुत कम परिवर्तन हुये हैं। लेकिन हम यहॉं सरकारी प्राथमिक शिक्षा पद्धति की ही विवेचना करेगें क्योंकि यही सर्व सुलभ है और कमोबेस इसी के समान्तर अन्य शिक्षण संस्थायें अपनी शिक्षा व्यवस्था करती हैं।
शिक्षा मनुष्य को संस्कारित करने का उपक्रम है और इसकी शुरूआत उसके जन्म लेते ही उसके जन्मस्थान से, घर से शुरू हो जाती है।माता पिता अपने आचरण से व्यवहार से, अबोध शिशु को होश संभालने से पूर्व ही संस्कारित करना शुरू कर देते हैं। एक आस्थावान परिवार में मॉं बाप,दादा दादी सुबह उठते ही दैनिक पूजा कर्म करते हैं। कोई संध्या वदंन करता है ,कोई किसी मूर्ति के आगे दीपक जलाकर पूजा करता है, कोई रामायण,भागवत या गीता का पाठ करता है, कोई तुलसी या पीपल या बरगद को जल चढाता है, सूर्य को अर्ध्य देता है, गुरू ग्रन्थ साहिब का पाठ करता है या नमाज पढता है।
आप देखेंगें कि परिवार का कोई वयस्क भले ही ऐसे किसी नित्य कर्म में शामिल न हो लेकिन एक अबोध अल्पवय बालक को इस कार्यक्रम में जरूर शामिल किया जाता है। उददेश्य वही है बच्चे को आस्थावान सस्कारवान बनाना। वयस्क भले ही पूजा ना करें लेकिन बच्चा नहीं बच सकता। एक बडे से बडा नास्तिक भी यह हिम्मत नहीं रखता कि वह अपने परिवार के बडे बुजुर्ग या अपनी पत्नि को यह कहकर रोक दे कि यह अवैज्ञांनिक चिंतन है और इस अबोध शिशु को ऐसे संस्कार मत दीजिये।
नास्तिक जो यह मानता है कि कोई परमशक्ति नहीं है जिसकी पूजा की जाये, धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति जो यह मानता है कि धर्म व्यक्तिगत मसला है और इसे मानने या ना मानने की सबको समान स्वतंत्रता है वह भी अपने बच्चे के इस अधिकार की हिफाजत नहीं करता और बच्चे को धर्म की, आस्था की घुटटी पिलाने का काम उसकी समझ से पहले ही शुरू कर दिया जाता है।
बच्चा जब कुछ बडा हो जाता है तो उसे बाकायदा शिक्षित करने के लिये गुरू के पास किसी शिक्षा संस्थन में भेजा जाता है। गुरू तो यह मानकर चलता ही है कि शिष्य कच्चा घडा है ओर स्वयं वो कुम्हार है जो उसके ठोक पीट कर सही करेगा। बस उसके ठोकने पीटने का काम अनेक तरह से चालू हो जाता है।
विद्यालय में शिक्षारम्भ ईश वन्दना से होता है। ज्यादातर जगह बच्चे एक खुले मैदान में पंक्तिबद्ध इकटठे होते हैं जहॉं किसी उंचे चबूतरे जैसी जगह पर दो चार बच्चे खडे होकर उॅची आवाज में ईश वन्दना गाते हैं तथा सारे बच्चे उनका अनुसरण करते रहते हैं। 'वह शक्ति हमें दो दया निधे कर्त्तव्य मार्ग पर डट जायें, जिस देश जाति में जन्म लिया बलिदान उसी पर हो जायें',जैसी ईश वन्दना आपने भी अपने बचपन में की होगी या 'इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो ना', ईश्वर से ये प्रार्थना की होगी।
अब सोचने की बात है जब पहले ही हाथ फैलाकर मॉंगना सिखाया जा रहा है तो विश्वास तो अपने आप ही कमजोर होगा। लेकिन वन्दना जारी है 'विश्वास कमजोर हो ना।' काहे बात का विश्वास कमजोर ना हो? मॉंगने का, सर झुकाने का या ये मानने का कि कोई परमशक्ति है जो हमें सबको देता है? पहली वन्दना जो यह शिक्षा दे रही है कि हमने जिस देश और जाति में जन्म लिया है हम उसी पर बलिदान हों| अब अन्ध राष्ट्रवाद की यह शिक्षा, जातिय मिथ्याभिमान की यह शिक्षा कैसे वसुधैव कुटुम्बकम के भाव पल्लवित करेगी ?कैसे विश्व बन्धुत्व की भावना बढायेगी ये बिल्कुल समझ से बाहर है।
अब सोचने की बात है जब पहले ही हाथ फैलाकर मॉंगना सिखाया जा रहा है तो विश्वास तो अपने आप ही कमजोर होगा। लेकिन वन्दना जारी है 'विश्वास कमजोर हो ना।' काहे बात का विश्वास कमजोर ना हो? मॉंगने का, सर झुकाने का या ये मानने का कि कोई परमशक्ति है जो हमें सबको देता है? पहली वन्दना जो यह शिक्षा दे रही है कि हमने जिस देश और जाति में जन्म लिया है हम उसी पर बलिदान हों| अब अन्ध राष्ट्रवाद की यह शिक्षा, जातिय मिथ्याभिमान की यह शिक्षा कैसे वसुधैव कुटुम्बकम के भाव पल्लवित करेगी ?कैसे विश्व बन्धुत्व की भावना बढायेगी ये बिल्कुल समझ से बाहर है।
इस ईश वन्दना के बाद राष्ट्रगान होता है।दूसरे देशों की बात जाने दें अपने राष्ट्रगान को देखिये। वह अभी भी सिन्ध को अपने ही देश का भूभाग मानता है।उसमें मराठा भी है। उसमें भारत भाग्य विधता की जय है। ये सब क्या है ?इस पर सवाल उठाओ तो तुरन्त आपको राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिया जायेगा। लेकिन इससे सवाल हल नहीं होते। सिन्ध को अपने राष्ट्रगान में शामिल रखना, दूसरे देश की अखण्डता पर बद नजर रखना है। कुछ लौग कहेंगें सिन्ध नहीं सिन्धु नदी है। ये भी बहुत सही नहीं है। ये नदी भी दूसरे देश में बहती है। आपकी नदी मॉं गंगा है। उसे क्यों नहीं राष्ट्रगान में शामिल करते।
मराठों की जय बोलने का तो कोई औचित्य ही नहीं है। ये जात पॉंत और क्षेत्रवाद को बढावा देना है, उन दुराभिमानियों को बढावा देना है जो मुम्बई से गैर मराठियों को खदेडने में लगे हैं तथा जिनका शिवाजी के समय से ही एकमात्र स्वप्न दिल्ली की गददी पर काबिज होना रहा है। भाग्य विधाता पर तो पहले ही एक बडे कवि यह कहकर प्रश्न चिहन लगा चुके हैं. 'राष्ट्रगीत में कौन भला वो भारत भाग्य विधाता है? फटा सुथन्ना पहले जिसका गुन हरचरना गाता है?'
मराठों की जय बोलने का तो कोई औचित्य ही नहीं है। ये जात पॉंत और क्षेत्रवाद को बढावा देना है, उन दुराभिमानियों को बढावा देना है जो मुम्बई से गैर मराठियों को खदेडने में लगे हैं तथा जिनका शिवाजी के समय से ही एकमात्र स्वप्न दिल्ली की गददी पर काबिज होना रहा है। भाग्य विधाता पर तो पहले ही एक बडे कवि यह कहकर प्रश्न चिहन लगा चुके हैं. 'राष्ट्रगीत में कौन भला वो भारत भाग्य विधाता है? फटा सुथन्ना पहले जिसका गुन हरचरना गाता है?'
राष्ट्रगान पर सवाल उठाने पर सबसे ज्यादा वो लोग हल्ला करते हैं जो इसे अपनी संस्था,संगठनों में नहीं गाते| जो 'नमस्ते सदा वत्सले' जैसा गान गाकर राष्ट्रवन्दना करते हैं, और ये कहते हैं कि 'वन्दे मातरम' सच्चा राष्ट्रगीत है| वन्दे मातरम पर जन गणमन से भी ज्यादा सवाल उठते रहे हैं। बहरहाल इस पर चर्चा विषयान्तर हो जायेगी| मूल सवाल बच्चों को राष्ट्रगान गवाने का है। निश्चय ही यह बच्चों में देशभक्ति के भाव भरने के लिये किया जाता है। ज्यादातर यह इण्टर कालिजों तक ही कराया जाता है । डिग्री कालिजों में प्राय: यह नहीं होता। शायद तब बच्चे इतने समझदार हो चुकें होते हैं कि उन्हें देशभक्ति सिखाने की ऐसी किसी कवायद करने की जरूरत नहीं समझी जाती या वो इस नियंत्रण से बाहर हो चुके होते हैं और जबरदस्ती उन्हें देशभक्ति सिखाना संभव नहीं रह जाता। लेकिन सोचने की बात ये है कि बचपन से युवावस्था तक लगभग बारह साल प्रतिदिन घोटने के बाद भी न तो सब वांछित देशभक्ति सीख पाते हैं और न ही ईशभक्ति। उनमें से कितने ही नास्तिक हो जाते हैं, कितने ही शकित रहते हैं और तर्क करने लगते हैं।
यही कुछ लोंगों की चिन्ता का विषय है ओर वे चाहते हैं कि मैकाले की शिक्षा पद्धति को हटाकर शिक्षा का भारतीयकरण किया जाये| अध्यात्म और नैतिकता को शामिल किया जाये। इसमें भी अनेक दृष्टिकोण हैं लेकिन सबसे ज्यादा सक्रिय शिक्षा का संघीकरण करने वाले हैं| जिन्होंने अपनी समानान्तर शिक्षा पद्धति शिशुमन्दिर के नाम से चला रखी है। यद्यपि आजकल की शिक्षा पद्धति की ही देन है जो एक डॉक्टर भी मरीज का ऑपरेशन करने के बाद यह कहता है कि मैंने अपना काम कर दिया, अब बचाना ना बचाना उपर वाले के हाथ में है। उसे अपने चिकित्सा ज्ञान पर भरोसा नहीं है, ईश्वर पर है। इस लिये उसका नाम लेता है। अब ऑपरेशन असफल हो जाये मरीज की जान चली जाये तो उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है, वह तो पहले ही कह चुका है 'मैंने अपना काम कर दिया, अब बचाना ना बचाना उपर वाले के हाथ में है।' वह ईश्वर जिम्मेदार है। अब रोओ उसके नाम को 'अरे भगवान ये क्या कर दिया? क्यू मार डाला इसे| हमें क्यू नहीं मार देता।' अब ईश्वर हो तो आये और कहे चलो तुम्हें भी निबटा देता हूँ ।
सब जानते हैं ऐसा नहीं हो सकता। एक बार डॉक्टर से कहकर देखो| उसे मुंहमॉंगी फीस थमाओ फिर देखो वो कैसे बिना भगवान से पूछे गछे तुम्हारा काम तमाम करता है। आखिर कन्या बध, वधू हत्या, विधवा सती जैसे पुण्य कर्म आप कर रहे हो या नहीं ?कहॉं भगवान से पूछने जाते हो? बस जब अपने सही गलत कामों की जिम्मेदारी दूसरे के सिर डालनी होती है तो सबसे आसान ईश्वर लगता है उसके सर डाल दो जो कभी नहीं कहता कि मेरा नाम किससे पूछकर ले रहे हो? एक्सीडेंट में कोई मर जाये ईश्वर की मरजी, पुल टूट जाये ईश्वर की मरजी, बाढ आ जाये ईश्वर की मरजी, आग लग जाये ईश्वर की मरजी? सब ईश्वर की मरजी से हो रहा है| बस ' प्रभु के गुन गाओ और सब चट कर जाओ|' अपने कर्मों को मत देखो जिसके कारण आपदायें आती हैं और खुद के साथ- साथ बेकसूर लौग भी कष्ट पाते हैं। ये हमारे अंधविश्वासों, संस्कारों का फल है जो हम शिक्षा और दूसरे तरीके से एक पीढी से दूसरी पीढी तक पहुंचा रहे हैं।
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