जनवादी लेखक संघ की मेरठ इकाई द्वारा 'मैं पूरा हिन्दुस्तान हूँ' नाम से 14 स्थानीय कवियों की कविताओं का संग्रह प्रकाशित किया है। दिनॉंक 25-03-2012 को शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी की पुण्य स्मृति दिवस के अवसर पर मेरठ बार एसोसियशन के सभागार में मुख्य अतिथि डॉ0सन्तोष कुमार गोड अध्यक्ष हिन्दी विभाग मेरठ कॉलिज मेरठ, मुख्य वक्ता श्री अजेय कुमार सम्पादक 'उदभावना' एवं विशिष्ट अतिथि प्रो0 आर0पी0जुयाल प्रवक्ता एन0ए0एस0 कालिज मेरठ, मुख्य समीक्षक डॉ0 वेदप्रकाश बटुक प्रवक्ता बर्कले यूनिवर्सिटी यू0एस0ए0 एवं श्री कथाकार निर्मल गुप्त द्वारा काव्य संग्रह 'मैं पूरा हिन्दुस्तान हूँ 'का संयुक्त लोकार्पण किया गया।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार श्री अजेय कुमार द्वारा 'मैं पूरा हिन्दुस्तान हूँ' संग्रह में शामिल कवियों की रचनाओं की समीक्षा करते हुये कहा कि कविताओं का रचाव यह बताता है कि ये कवि राष्ट्र और समाज के प्रति अपने दायित्वों का भली प्रकार निर्वाह कर रहे हैं और वैमनस्यता फैलानी वाली ताकतों का पुरजोर विरोध करने के लिये एकजुट हैं। इस संग्रह की रचनायें अपने समय का दस्तावेज हैं जो यह बताती हैं कि वे विभाजनकारी ताकतों के मन्सूबों को कामयाब नहीं होने देंगी। उन्होंने कहा कि जब कवि वीरेन्द्र 'अबोध' चुनौति देता है- 'बेगुनाह सीता को जला नहीं सकते तुम, मेहनत को खाक में मिला नहीं सकते तुम, तुम्हारी ये सोने की लंका लुटेगी, झोंपडी से ही यहॉं ज्वाला उठेगी, जिन्दा तुम्हारा नहीं महल रहेगा खपरैलो से ही यहॉं खून बहेगा, रोटी के लिये ही युद्ध ठनेगा, सुखिया का हॅंसिया ही हथियार बनेगा।' तो लगता है कि सदियों के दबे कुचले लोग उठ खडे हुये हैं और उन्हें अब कोई दबा नहीं सकेगा।
उन्होंने कहा कि कवि अमरनाथ 'मधुर' अपनी कविताओं में साम्प्रदायिक ताकतों से दो- दो हाथ करते हुये कहते हैं 'ये भगवा झण्डा किसका है? झण्डे में डंडा किसका है? झण्डा तो अपना लगता है, ना जाने डण्डा किसका है?' तो वे ये कह रहे हैं भगवा झण्डा हमारी संस्कृति की पहचान है हमारा अपना है लेकिन इस झण्डे को जो इस्तेमाल कर रहे है उनके शक्तिस्रोत उनकी वैचारिक स्रोत विदेशी हैं जिसे कवि झण्डे का डण्डा कहकर प्रश्नचिहन लगाता है।आगे जब कवि कहता है 'मन्दिर मस्जिद के झगडों में, दलितों पिछडों में अगडों में भर पाये कोई जहर नहीं न टूटे कोई कहर कहीं ये देश हमारा सबका है बाबा का नहीं किसी का है' तो देश को अपनी जागीर समझाने वाली ताकतों के लिए एक चेतावनी देता दिखाई देता है |
मुख्य समीक्षकबर्कले यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर वेदप्रकाश 'बटुक' ने कहा कि आज शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी का शहादत दिवस है जिन्होंने कितने ही कवियों लेखकों और क्रान्तिकारियों को राह दिखायी। भगतसिंह को क्रान्तिकारी बनाने में उनका ही योगदान था। भगतसिंह के रास्ते पर ही चलकर पंजाबी कवि अवतार सिंह पाश शहीद हुये। 'मैं पूरा हिन्दुस्तान हूँ' कविता संग्रह में वे कवि शामिल हैं जिन्होंने उन अमर शहीदों के बताये रास्ते पर चलते हुये जनता के हक में आवाज बुलन्द करने का हौसला किया है।ये कवि नागार्जुन,शील और मुक्तिबोध की परंपरा को आगे बढ़ा रहें हैं | वे इस राह पर चलकर नये मुकाम हासिल कर सकते हैं।
मुख्य अतिथि मेरठ कालिज मेरठ के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ0 सन्तोष कुमार गोड ने कहा कि सच्चा साहित्य वही है जो समाज के हित में होता है। जनवादी लेखक संघ मेरठ के सदस्य कवियों का यह संग्रह यह प्रमाणित करता है कि ये कवि जनता के हित में लेखन के लिये प्रतिबद्ध हैं।उनकी यह प्रतिबद्धता ही 'मैं पूरा हिन्दुस्तान हूँ' काव्य संग्रह की उपादेयता प्रमाणित करती है।
विशिष्ट अतिथि डॉ0 राजेन्द्र जुयाल ने 'साहित्य के सरोकार' विषय पर बोलते हुये कहा कि जो साहित्य जन जीवन के व्यापक पक्षों को अपने अन्दर समेटकर चलता है, आम आदमी की पीडा को स्वर देता है तथा बदलाव के लिये दिशा प्रदान करता है वही सच्चा साहित्य है। जलेश ऐसे ही प्रतिबद्ध रचनाकरों का संगठन है ओर उससे जुडे लेखक स्थानीय मुददों से लेकर समसामयिक वैश्विक घटनाओं पर नजर रखते हुये जनजीवन पर पड रहे उनके प्रभावों दुष्प्रभावों को ध्यान में रखकर समाज को दिशा देने वाला साहित्य लिखते रहें हैं।
कार्यक्रम के अध्यक्ष कथाकार निर्मल गुप्त ने कहा कि आज कविता बाजार में बिकने वाली चीज हो गयी है। हमारे तथाकथित बडे मंचीय कवि ऐसी कविता लिख रहे हैं जो भडकाउ और बिकाउ है। उन्होंने कहा कि कवियों के तीन तीन जेब हैं। एक जेब में वह एक वर्ग को खुश रखने करने वाली कविता रखता है दूसरी जेब में दूसरे वर्ग को खुश करने वाली कविता रखता है। तीसरी जेब में वह सरकार ओर उसके प्रतिष्ठानों से पुरस्कार सम्मान प्राप्त करने वाली कवितायें रखता है। कुल मिलाकर अवसरवादी कवि लेखकों का बोलबाला है। लेकिन इस कविता संग्रह में शामिल कवि इन प्रपंचों से दूर हैं। ये विचारधारा से लैस प्रतिबद्ध कवि हैं।
जलेश मेरठ इकाई के अध्यक्ष वीरेन्द्र 'अबोध' ने कहा कि कविता में बिम्बों और प्रतिमानों की दुहाई देने वाले ये भूल जाते हैं कि उनकी दुरूह कवितायें एकेडिमिक होकर रह जाती हैं। वे साहित्यिक प्रतिमान तो गढ सकती हैं लेकिन जनसाधरण को राह नहीं दिखा सकती हैं। उन्होंने कहा कि कोई कवि अभिधा में बात नहीं करना चाहता लेकिन अगर साहित्य को आम आदमी तक ले जाना है तो आम आदमी की भाषा में ही बात करनी होगी और वो बिम्बों और प्रतीकों में इतनी नहीं हो सकती जितनी सीधी सादी भाषा में हो सकती है। जनवादी साहित्य जनता का साहित्य है इसलिये उनकी कवितायें चाहे साहित्यिक पुरोधाओं की नजर में साहित्य के किसी काम की न हों लेकिन वे रिक्शे वाले, ठेले वाले की समझ में आती हैं यही काफी है।
कार्यक्रम का संचालन करते हुये जलेश के जिला सचिव एवं समीक्षित काव्य संग्रह 'मैं पूरा हिन्दुस्तान हूँ'के सम्पादक श्री मुनेश त्यागी ने कहा कि मेरठ के कवियों और लेखकों ने साम्प्रदायिक एकता और भाईचारे को मजबूत करने के लिये जो रचनात्मक प्रयास किये उनका प्रतिफल ये कविता संग्रह है। इसी के साथ मशहूर क्रान्तिकारी गीतों का संग्रह भी प्रकाशित किया है जो विरासत को संजोकर रखने का काम है। उन्होंने कहा कि भविष्य में भी हम ऐसे ही प्रयास करते रहेंगें। इस अवसर पर विमोचित काव्य संग्रह में सम्मिलित कवि श्री वीरेन्द्र 'अबोध', मुनेश त्यागी,निर्मल गुप्त,विजय गुप्त, कृष्ण कुमार 'बेदिल',ब्रजपाल 'बृज' डा0 रामगोपाल 'भारती',सत्यपाल'सत्यम्', अमरनाथ'मधुर',अजीत कुमार 'अजीत',डॉ0 हिमॉंशु, धनेश कुमार गुप्त,रामपालसिंह मलिक ने काव्य पाठ किया। कार्यक्रम में बार अशियोशिएशन मेरठ के पूर्व अध्यक्ष श्री सुभाष त्यागी, अलामाश अहमद एडवोकेट, तौसीफ अली खान एडवोकेट प्रो० घासीराम मालिक, कवि धर्मजीत सरल, यशपाल कौत्सायन,कुमार पंकज,संजय गुप्त का० सुनीता त्यागी आदि उपस्थित थे |
جنوادي مصنف یونین کی میرٹھ یونٹ کی طرف سے 'میں مکمل ہندوستان ہوں' نام سے 14 مقامی شاعروں کی نظم کا مجموعہ شائع کیا ہے. دنك 25-03-2012 کو شہید گنیش شنکر طالب علم کی شریک زندگی یاد دن کے موقع پر میرٹھ بار اےسوسيشن کے ہال میں مہمان خصوصی ڈاکٹر 0 قناعت کمار گوڈ صدر ہندی محکمہ میرٹھ كلج میرٹھ چیف مقرر جناب ناقابل شکست کمار ایڈیٹر ادبھاونا اور مخصوص مہمان پروفیسر 0 آر 0 پی 0 جيال ترجمان این 0 اے 0 ایس 0 کالج میرٹھ اہم ناقد ڈاکٹر 0 وےدپركاش بٹك ترجمان بركلے یونیورسٹی یو 0 ایس 0 اے 0 اور جناب كتھاكار نرمل خفیہ ذریعہ شاعری جمع 'میں مکمل ہندوستان ہوں' کا مشترکہ لوكارپ کیا گیا.
اس موقع پر چیف مقرر سینئر ادیب جناب ناقابل شکست کمار کی طرف سے 'میں مکمل ہندوستان ہوں' جمع میں شامل شاعروں کی تخلیقات کا جائزہ لیتے ہوئے کہا کہ نظم کا رچاو یہ بتاتا ہے کہ یہ شاعر متحدہ اور سماج کے تئیں اپنے فرائض کا بھلی طرح قیام کر رہے ہیں اور وےمنسيتا پھےلاني والی طاقتوں کا پرزور مخالفت کرنے کے لئے متحد ہیں. اس مجموعے کی رچنايے اپنے وقت کا دستاویز ہیں جو یہ بتاتی ہیں کہ وہ وبھاجنكاري طاقتوں کے منسوبو کو کامیاب نہیں ہونے دیں گی. انہوں نے کہا کہ جب شاعر وےرےندر 'معصوم' چیلنج دیتا ہے - 'بے گناہ سیتا کو جلا نہیں سکتے تم، محنت کو خاک میں ملا نہیں سکتے تم، تمہاری یہ سونے کی لنکا لٹےگي، جھوپڈي سے ہی یہاں شعلہ اٹھے گی، زندہ تمہارا نہیں محل رہے گا كھپرےلو سے ہی یہاں خون بہے گا، روٹی کے لئے ہی جنگ ٹھنےگا، سكھيا کا هسيا ہی ہتھیار بنے گا. ' تو لگتا ہے کہ صدیوں کے دبے کچلے لوگ اٹھ کھڑے ہوئے ہیں اور انہیں اب کوئی دبا نہیں سکے گا.
انہوں نے کہا کہ شاعر امرناتھ 'مدھر' اپنی نظم میں مذہبی طاقتوں سے دو - دو ہاتھ کرتے ہوئے کہتے ہیں 'یہ بھگوا پرچم کس کا ہے؟ جھنڈے میں ڈنڈا کس کا ہے؟ پرچم تو اپنا لگتا ہے، نہ جانے ڈڈا کس کا ہے؟ ' تو وہ یہ کہہ رہے ہیں بھگوا پرچم ہماری ثقافت کی پہچان ہے ہمارا اپنا ہے لیکن اس جھنڈے کو جو استعمال کر رہے ہیں ان کے شكتسروت ان کی نظریاتی ذریعہ غیر ملکی ہیں جسے شاعر جھنڈے کا ڈڈا کہہ کر پرشنچهن لگاتا ہے. آگے جب شاعر کہتا ہے 'مندر مسجد کے جھگڈو میں، دلتوں پچھڈو میں اگڈو میں بھر پائے کوئی زہر نہیں نہ ٹوٹے کوئی قہر کہیں یہ ملک ہمارا سب کا ہے بابا کا نہیں کسی کا ہے 'تو ملک کو اپنی ملکیت میں سمجھانے والی طاقتوں کے لئے ایک انتباہ دیتا دکھائی دیتا ہے |
اہم سميكشكبركلے یونیورسٹی کے پروفیسر وےدپركاش 'بٹك' نے کہا کہ آج شہید گنیش شنکر طالب علم کا یوم شہادت ہے جنہوں نے کتنے ہی شاعروں ادیبوں اور كرانتكاريو کو راہ دکھائی. بھگت سنگھ کو انقلابی بنانے میں ان کا ہی حصہ تھا. بھگت سنگھ کے راستے پر ہی چل کر پنجابی شاعر اوتار سنگھ پاش شہید ہوئے. 'میں مکمل ہندوستان ہوں' نظم مجموعے میں وہ شاعر شامل ہیں جنہوں نے ان امر شہیدوں کے بتائے راستے پر چلتے ہوئے عوام کے حق میں آواز بلند کرنے کا حوصلہ کیا ہے. یہ شاعر ناگارجن، شيل اور مكتبودھ کی روایت کو آگے بڑھا رہیں ہیں | وہ اس راہ پر چل کر نئے مقام حاصل کر سکتے ہیں.
مہمان خصوصی میرٹھ کالج میرٹھ کے ہندی وبھاگادھيكش ڈاکٹر 0 قناعت کمار گوڈ نے کہا کہ سچا ادب وہی ہے جو سماج کے مفاد میں ہوتا ہے. جنوادي مصنف یونین میرٹھ کے رکن شاعروں کا اس مجموعہ یہ ثابت کرتا ہے کہ یہ شاعر عوام کے مفاد میں تحریروں کے لئے پابند عہد ہیں. ان کی یہ عزم ہی 'میں مکمل ہندوستان ہوں' شاعری جمع کی اپادےيتا تصدیق کرتی ہے.
مخصوص مہمان ڈاکٹر 0 راجندر جيال نے 'ادب اور سنیما کی ضرورتیں کے موضوع پر بولتے ہوئے کہا کہ جو ادب عوامی زندگی کے وسیع فریقوں کو اپنے اندر سمےٹكر چلتا ہے، عام آدمی کی درد کو مکمل دیتا ہے اور تبدیلی کے لئے سمت فراہم کرتا ہے وہی سچا ادب ہے. جلےش ایسے ہی پابند رچناكرو کی تنظیم ہے اور اس سے متعلق مصنف مقامی مددو سے لے کر سمساميك عالمی واقعات پر نظر رکھتے ہوئے عام زندگی پر پڑ رہے ان کے اثرات دشپربھاوو کو دھیان میں رکھ کر سماج کو سمت دینے والا ادب لکھتے رہیں ہیں.
پروگرام کے صدر كتھاكار نرمل خفیہ نے کہا کہ آج شاعری بازار میں فروخت ہونے والی چیز ہو گئی ہے. ہمارے نام نہاد بڑے مچيي شاعر ایسی شاعری لکھ رہے ہیں جو بھڈكا اور بكا ہے. انہوں نے کہا کہ شاعروں کے تین تین جیب ہیں. ایک جیب میں وہ ایک طبقے کو خوش رکھنے کرنے والی شاعری رکھتا ہے دوسری جیب میں دوسرے طبقے کو خوش کرنے والی شاعری رکھتا ہے. تیسری جیب میں وہ حکومت اور اس کے اداروں سے ایوارڈ عزت حاصل کرنے والی كوتايے رکھتا ہے. مجموعی طور پر موقع پرست شاعر ادیبوں کا بول بالا ہے. لیکن اس نظم مجموعے میں شامل شاعر ان پرپچو سے دور ہیں. یہ نظریہ سے لیس عزم شاعر ہیں.
جلےش میرٹھ یونٹ کے صدر وےرےندر 'معصوم' نے کہا کہ نظم میں بمبو اور پرتمانو کی دہائی دینے والے یہ بھول جاتے ہیں کہ ان کی دروه كوتايے اےكےڈمك ہو کر رہ جاتی ہیں. وہ ادبی پرتمان تو گڈھ سکتی ہیں لیکن جنسادھر کو راہ نہیں دکھا سکتی ہیں. انہوں نے کہا کہ کوئی شاعر ابھدھا میں بات نہیں کرنا چاہتا لیکن اگر ادب کو عام آدمی تک لے جانا ہے تو عام آدمی کی زبان میں ہی بات کرنی ہوگی اور وہ بمبو اور علامت میں اتنی نہیں ہو سکتی جتنی سیدھی سادی زبان میں ہو سکتی ہے. جنوادي ادب عوام کا ادب ہے اس لئے ان کی كوتايے چاہے ادبی پرودھاو کی نظر میں ادب کے کسی کام کی نہ ہوں لیکن وہ رکشے والے، ٹھیلے والے کی سمجھ میں آتی ہیں یہی کافی ہے.
پروگرام کا اہتمام کرتے ہوئے جلےش کے ضلع سیکریٹری اور جائزہ شاعری جمع 'میں مکمل ہندوستان ہوں' کے ایڈیٹر جناب منےش تیاگی نے کہا کہ میرٹھ کے شاعروں اور ادیبوں نے مذہبی یکجہتی اور بھائی چارے کو مضبوط کرنے کے لئے جو تخلیقی کوشش کی ان کا اجر یہ شاعری مجموعہ ہے. اسی کے ساتھ مشہور انقلابی گیتوں کا مجموعہ بھی شائع کیا ہے جو وراثت کو سجوكر رکھنے کا کام ہے. انہوں نے کہا کہ مستقبل میں بھی ہم ایسے ہی کوشش کرتے رهےگے. اس موقع پر وموچت شاعری مجموعے میں شامل شاعر جناب وےرےندر 'معصوم'، منےش تیاگی، نرمل خفیہ، وجے خفیہ، کرشن کمار 'بےدل'، برجپال 'برج' ڈاکٹر 0 رام گوپال 'بھارتی'، ستيپال "ستیم '، امرناتھ' مدھر '، اجیت کمار 'اجیت'، ڈاکٹر 0 همش، دھنےش کمار خفیہ، رامپالسه ملک نے شاعری متن کیا. پروگرام میں بار اشيوشےشن میرٹھ کے سابق صدر جناب سبھاش تیاگی، الاماش احمد ایڈووکیٹ، توسيپھ علی خان ایڈوکیٹ پروفیسر 0 گھاسيرام مالک، شاعر دھرمجيت آسان، یشپال كوتساين، کمار پنکج، سنجے خفیہ کا 0 سنیتا تیاگی وغیرہ موجود تھے |
sabhi janvadi kaviyon ko badhai pustak vimochan ke avsar par .ramnavmi ki hardik shubhkamnayen .
जवाब देंहटाएंआदरणीय अमरनाथ जी, संघ के बाक़ी लेखकों से माफ़ी चाहता हूँ कि मैं इस पर कुछ कह नहीं पाया हूँ क्यूंकि मेरे ला के एकज़ाम एकदम से शुरू हो गए हैं , लेकिन एक 100% सच्चाई ये है कि ये कलेक्शन तारीफ़ के काबिल है और इसे न देख पाना एक सुखद अनुभूति से अपने आप को महरूम रखने वाली बात है|
जवाब देंहटाएंपहला सुखदायी अनुभव तो ये एहसास है कि अभी दुनिया में इतने भले लोग मौजूद हैं जो कौमी भाईचारे के लिए न सिर्फ सोच रहे हैं , बल्कि इस हद तक कार्यशील हैं कि इन सोचों को कविताओं के रूप में लिखने , लोगो के आगे रखने , और विरोध के बावजूद भी खुद अपने समाज कि कमियों को आँखों में आँखे ड़ाल कर चनौती देने की हिम्मत कर रहें हैं|
इस विमोचन से मै न सिर्फ इन बेशकीमती कविताओं को अपने साथ लाया हूँ, बल्कि सबसे कीमती एहसास ये लाया हूँ कि अभी ईद और दिवाली एक साथ मनाने वाला हिन्दुस्तान ख़त्म नहीं हुआ है, बल्कि अभी इसके और एकजुट और मज़बूत होने की उम्मीद अच्छी तरह से मौजूद है|
- सितावतअहमद
सितवत भाई आपने इतने अपनेपन से सच्चाई बयान की है कि शुक्रिया अदा करके मैं उसके महत्व को हल्का नहीं करना चाहता ।किसी विद्वान ने कहा है कि दुनिया में कोहराम बुरे लोगों के चिल्लाने से नहीं भले लोगों के खमोश रहने से है । बुरे लोगों के मुकाबले भले लोगों की संख्या सभी जगह आज भी ज्यादा है लेकिन वे भले लोग अपने तक सीमित रहते हैं जबकि चन्द बदमाशों के गिरोह समाज को लूटने खसोटने में एक दूसरे का साथ देते हैं ।आज तो फिर भी सामाजिक स्वतंत्रता हासिल है लेकिन जब साम्प्रदायिकता का जहर फैला था तब हम उसके खिलाफ गोष्ठियों में , चोराहों पर गा बजाकर लोगों को उससे लड़ने के लिये तैयार करने में लगे थे ।ये उसी दौर की कवितायें हैं जो अब पुस्तक में सहेजकर रख दी गयीं हैं । आप जैसे हमसफ़र मिलते रहें और ये कारवाँ बढ़ता रहे यही ख्वाहिश है| -अमरनाथ 'मधुर'