[अग्नि ५ के प्रयोग की सम्भावना साकार हुई और भारतीय अंधराष्ट्रवाद का दम्भ एक बार पुनः मुखर हो उठा. तब भी ऐसा ही हुआ था, जब भारत ने परमाणु विस्फोट किया था और अहिंसा के अपमानित होने पर भी "बुद्ध मुस्कुराये थे". इस बीच केवल एक प्रश्न लोगों के बीच से मुखरित हुआ कि क्यों राष्ट्र की सेना दुनिया में सबसे अधिक सैन्य सामग्री खरीदने के बाद भी स्वयं सेनापति के वक्तव्य के अनुसार संकट में है! ऐसा क्यों है कि भारत अग्नि ५ तो बना लेता है, मगर छोटे अस्त्र-शस्त्र और गोला-बारूद बनाने के बजाय खरीदने के लिये बाध्य है! और फिर इन शस्त्रास्त्रों का प्रयोग चाहे जिस पर हो, मरेगा तो मनुष्य ही न! मनुष्य की हत्या के लिये इतने सारे प्रबन्ध और शोषण-उत्पीडन के पाटों में पिस रहे मनुष्य की खुशहाली के नाम पर केवल कोरे भाषण और ऊपर से घोटालों और भ्रष्टाचार का मारक हलाहल! कैसे गले से नीचे उतर सकेगा मानवताविरोधी तन्त्र का यह दम्भी अट्टहास? आज जब जन बेतहाशा त्रस्त है तो राष्ट्र कैसे सुरक्षित रह सकता है? राष्ट्र की समृद्धि के लिये जन को खर्चीले शस्त्रास्त्रों की आवश्यकता है अथवा व्यापक रोजगार की? विचार करें मित्र, यह राष्ट्र आपका अपना है.-गिरिजेश तिवारी ]
अणुबम के विस्फोटों का उत्सव मनाने वालो,
महाप्रलय के हथियारों की होड बढाने वालो।
मैं इन धूम धडाको के उस पार देखता हूँ ,
जयकारों के पीछे चीख पुकार देखता हूँ |
शायद तुम कुछ भूल रहे हो एटमबम की गाथा,
इसी बहाने सही चलो मैं हूँ उसको दोहराता |
समृद्धि के महा शिखर पर बैठा था जापान,
बाजारों में सबसे सस्ता था उसका सामान।
कुछ बाजार नये पाने कुछ महाशक्ति बनने को,
विश्व युद्ध में कूद पडा जापान बडा बनने को।
लेकिन महासमर ने ऐसा नव इतिहास लिखा था
एटमबम से हिरोशिमा में कुछ भी नहीं बचा था।
वरदायी विज्ञान मनुजता का अभिशाप बन गया।
दूर-दूर तक मची तबाही हाहाकार घना था
अन्धा,बहरा हुआ मनुज अपने ही खून सना था।
अस्पताल के चिकित्सकों को खुद ही होश नही था,
जंग छेडने वालों में लडने का जोश नही था।
युद्धगान गाने वाले अब शोकगीत गाते थे
अन्धे राष्ट्रवाद के नायक नजर नहीं आते थे।
तब से अब तक हिरोशिमा की धरती बॉंझ बनी है,
उगे कोई फल-फूल तो क्या न उगती नागफनी है।
पर्यावरण विषैला जिसकी हुई नहीं भरपायी,
विकृत अंग बच्चे पैदा होते अब भी दुखदायी।
सोचो बम विस्फोटो का उत्सव मनाने वालो,
दुश्मन को बम की भाषा मे सबक सिखाने वालो|
जो एटमबम के निर्माता या बम बरसाते है्,
मानवता के अपराधी या वीर कहे जाते हैं?
सोचो शस्त्रों से प्रश्नों का समाधान कब होता?
रणभूमि में खडा विजेता फूट-फूट है रोता।
ऐसी होती जीत की जिस पर हार हॅंसा करती है
नर सहॉंर का अपराधी अपनी जनता कहती है।
ओ विस्फोटों के उदघोषक हथियारों के सौदागर
क्या सब कुछ है ठीक देश में अपने सब मजबूत किले घर।
कुछ भी ठीक नहीं है देखो फैली बदकिस्मत बेकारी,
भूखे नंगे बदन घूमते रहते हैं लाखों नर नारी।
दुनियॉं में सबसे ज्यादा अन्धे, कोढी, लाचार,
इसी देश में मिलते सब लाईलाज बीमार।
इसी देश में निरक्षरों की लम्बी फौज पडी है
इसी देश में पानी की किल्लत भी बहुत बडी है।
इसी देश में अन्नदाता खुद भूखा मर जाता है
महलों के निर्माता का फुटपाथों से नाता है।
इसी देश में कृष्ण कन्हैया कचरा बीन रहे हैं
इसी देश में विप्र सुदामा अब तक दीन रहे हैं।
इसी देश में नारी अब भी रूपकुवर बनती है
इसी देश में भॅंवरीबाई की इज्जत लुटती है।
न्याय पालिका की ऑंखों पर पट्टी बॅंधी रहेगी
सीता का अपहरण हुआ सीता को सजा मिलेगी।
जबकि रावण खुले घूमते अटटहास करते हैं,
उन पर किसी कानून के लंबे हाथ नहीं पडते हैं।
समझ नयी आता इनसे कैसे पायें छुटकारा
कहते सारे जहॉं से अच्छा हिन्दोस्तॉं हमारा।
देखो ये सब देखो साथी उलझन बहुत बडी है
ऐसे में इन बम विस्फोटो की आन पडी है।
हमलावर भारत पर कोई बढा नहीं आता है,
विश्व विजय के स्वप्न लिये तो जिया नही जाता है।
सोचो जो जनता को रोटी खिला नहीं सकते हैं
अणुबम के विस्फोटो से तो जिला नहीं सकते हैं।
वे विध्वंस के वाहक नव निर्माण नहीं कर सकते
राम-राम जपते रहते हैं राम नहीं बन सकते।
कडवी बात कवि की लेकिन कही खरी जायेगी
इनके रामराज्य में सीता रोज हरी जायेगी।
दुःशासन है नित्य द्रोपदी चीरहरण भी होगा
इनका प्रिय प्रहसन गॉंधी देह मरण ही होगा।
जनता इनसे व्यर्थ चाहती है विकास की गंगा
ये लाशों पर फहरायेंगें ऊँचा बहुत तिरंगा।
शस्य श्यामला धरती को शमशान बना देंगें ये
हिन्द पाक को हिरोशिमा जापान बना देंगें ये ।
जितनी जल्दी हो इनको तुम सत्ता से धकियाओं
गॉंधी गौतम की धरती पर गीत अमन के गाओ।
तुम पर टिकी हुई जनता की आश भरी निगाहें
नही सुनी जाती हैं उसकी अब दुखदायी आहें ।
दुविधा को दो त्याग करो साकार स्वप्न गॉंधी के
बढते कदम रोक दो अब इस नफरत की ऑंधी के।
ये ऑंधी बरबाद करेगी बापू के गुलशन को
सारे जहॉं से अच्छा कैसे दोगे नाम वतन को?
रचना दिनांक :07-08-98
[अग्नि-5 के परीक्षण पर बहुत से लोग हर्षित हैं बहुत लोग इसे अनावश्यक समझते हैं | मैं भी दूसरे मत का हूँ |पोखरण के बम विस्फोटों का हमने 'भय,भूख और बम' पुस्तिका निकालकर विरोध प्रचार किया था |इस पुस्तिका में युद्ध विरोधी कई कविताएँ शामिल थीं| उपरोक्त 'बम गाथा 'कविता भी तभी लिखी गयी जो काफी लोकप्रिय थी | गिरिजेश तिवारी जी की टिप्पणी पढ़कर यह कविता पोस्ट करने का मन हुआ इसलिए पोस्ट की है |अब कविता पढ़ें और इसका पोस्टमार्टम भी करें अच्छा लगेगा | ] --अमरनाथ मधुर
[अग्नि-5 के परीक्षण पर बहुत से लोग हर्षित हैं बहुत लोग इसे अनावश्यक समझते हैं | मैं भी दूसरे मत का हूँ |पोखरण के बम विस्फोटों का हमने 'भय,भूख और बम' पुस्तिका निकालकर विरोध प्रचार किया था |इस पुस्तिका में युद्ध विरोधी कई कविताएँ शामिल थीं| उपरोक्त 'बम गाथा 'कविता भी तभी लिखी गयी जो काफी लोकप्रिय थी | गिरिजेश तिवारी जी की टिप्पणी पढ़कर यह कविता पोस्ट करने का मन हुआ इसलिए पोस्ट की है |अब कविता पढ़ें और इसका पोस्टमार्टम भी करें अच्छा लगेगा | ] --अमरनाथ मधुर








1-कुलदीप सिंह दीप - मैं आपसे बिलकुल सहमत हूँ , और आपकी ये कविता भी उतनी ही प्रासंगिक है .पहले जिंदगी जीने योग्य तो बने युद्ध तो बाद कि बात है अभी तो रोटी के लिए जंग जारी है
जवाब देंहटाएं2-अमरनाथ मधुर- अभी तो रोटी के लिए जंग जारी है-' रोटी से भी बड़ा प्रश्न है जहाँ किसी मंदिर का 'ऐसे धर्मप्रिय समाज में हमें नहीं रहना है ' एक अन्य कविता|
3-गिरिजेश तिवारी - जनता इनसे व्यर्थ चाहती है विकास की गंगा
ये लाशों पर फहरायेंगें ऊँचा बहुत तिरंगा।
शस्य श्यामला धरती को शमशान बना देंगें ये
हिन्द पाक को हिरोशिमा जापान बना देंगें ये ।
37 minutes ago · Like
4-गिरिजेश तिवारी - मित्र, आपकी यह कविता पूरी बात कह देती है. इसके कुछ अंशों को कम कर देंगे तो और भी प्रभावशाली हो जायेगी. इतनी सुन्दर रचना अब तक क्यों रोके रखे?
31 minutes ago · Like
5-अमरनाथ मधुर- धन्यवाद गिरीजेश जी मेरा भी यही विश्वास है
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