क्या जुल्मतों के दौर में भी गीत गायें जायेंगें
हॉं जुल्मतों के दौर के भी गीत गायें जायेंगें।
गौहर रजा की एक फिल्म है- जुल्मतों के दौर में। इस फिल्म का नरेशन मुझे ठीक ठीक याद नहीं, फिर भी वो कुछ इस तरह है-
जर्मनी में नाजीवाद अपने चरम पर है। हर ओर हिटलर की तानाशाही का आलम है। राजा का फरमान जारी हुआ है, नाटक करना गुनाह है। लेखकों, कलाकारों की जबान काटने का हुक्म हुआ है। उनके लिखे शब्दों, किताबों, गीतों को जलाने के लिए एक बड़ा अलाव तैयार किया जा रहा है। इस अलाव में हर किताब, हर कविता, हर गीत धू-धू करके जल रहे हैं। लेकिन गलती से एक लेखक की किताब बच जाती है।
अचानक वह खड़ा होकर जोर से चीखता है, हाकिमों, मेरी किताब भी जलाओ। मेरी किताबों ने हमेशा सच बोला है।
यह लेखक ब्रेख्त है।
सलमान रुश्दी, कमल हासन और मदीहा गौहर के बाद अब इन नाजियों का अगला निशाना है परगाश। परगाश की लड़कियों को गीत गाने के लिए बलात्कार और जाने से मारने की धमकियां मिलीं। इस घटना में तीन युवतियों द्वारा बनाए गए म्यूजिक बैंड ‘प्रगाश’ को बंद करवा दिया गया. यह बैंड दसवीं कक्षा की छात्राओं- नोमा नज़ीर, फराह दीबा और अनीका खालिद ने बनाया था. पिछले दिसंबर में श्रीनगर में अपने एक फरफॉरमेंस से उन्होंने श्रोताओं को मुग्ध कर दिया था. लेकिन फरवरी के आरंभ में कश्मीर के मुफ्ती (मौलवी) ने फतवा जारी कर दिया कि उनका गाना गैर-इस्लामिक है. रंग जगत खामोश रहा और लड़कियों ने डरकर गाना छोड़ दिया। सूरज की पहली किरण को कुचल देने के कोशिश में कश्मीरी कठमुल्ले सफल होते दीख रहे हैं। यह इस्लामी शरियत का पाखंडी निजाम मालूम पड़ता है। कठमुल्ले संविधान से ऊपर कैसे हैं। तुम्हारी खामोशी पर हम शर्मिंदा हैं औऱ थोड़ा बेबस भी।
लड़कियां गीत गाती थीं, लड़कियां गिटार बजाती थीं, लड़कियां घरों से बाहर निकली थीं, लड़कियां भरे चौराहे, लोगों की भीड़ में, मर्दों के सामने मुंह खोलकर गाती थीं, तेज आवाज में गाती थीं, आंखों में आंखें डालकर गाती थीं। लड़कियां अपनी आजादी के गीत गाती थीं, लड़कियां कश्मीर की आजादी के गीत गाती थीं। लड़कियां प्रगाश थीं, लड़कियां सूरज की पहली किरण थीं।
लेकिन इस बार फिर अकेली पड़ गई लड़कियां। फतवों के ठेकेदार इस बार फिर जीत गए। उन्हें लड़कियों का गाना पसंद नहीं, अपनी आजादी के लिए गाना पसंद नहीं। कश्मीर की आजादी के लिए गाना पसंद नहीं। उन्हें बेखौफ आजादी के सपनों से भरी लड़कियों की खुली निगाहें पसंद नहीं, उनके थिरकते शरीर पसंद नहीं। कठमुल्ले मुफ्ती लगे चिंघाड़ने, "बेपर्दा, बेशर्म लड़कियों, गाओगी तो जबान काट देंगे, आसमान देखोगी तो आंखें नोच लेंगे, आजादी की बात करोगी तो तुम्हारा बलात्कार करेंगे, मार डालेंगे हम तुम्हें।"
डर गई लड़कियां। सहम गईं बेचारी। बंद हो गई उनकी आवाज।
आओ दुआ करें कि ये एक प्रगाश कश्मीर में, समूचे हिंदुस्तान में हजारों-हजार प्रगाश की जमीन बन जाए। हर लड़की निकल आए घरों से, जोर-जोर से गाए, चीखे-चिल्लाए। वे जितना बंद करें हमारी जबान, हम उतना ही चिल्लाएं। नाचें, झूमें, गाएं।
हमें मर जाना हो गंवारा, लेकिन चुप रहना न हो।
तकलीफ सिर्फ लड़कियों के बुर्का न पहनने या गीत गाने से नहीं है। तकलीफ कश्मीर की आजादी के गीत गाने से है।
पक्की खबर है। प्रगाश पर फतवा देने वाले मुफ्ती नेशनल कांफ्रेंस के दलाल हैं। फतवा उमर अबदुल्ला की शह पर दिया गया है। लड़कियां कश्मीर की आजादी के गीत गा रही थीं। उन्हें जबरदस्त समर्थन मिल रहा था। उमर अबदुल्ला डर गए, सो उन्होंने मुल्लाओं को हथियार बनाकर फतवा जारी करवा दिया। खुद पाबंदी लगाते तो बदनामी होती। कश्मीर में बुर्का और बेपर्दगी इतना बड़ा मसला नहीं है। बहुत बड़ी आवादी बुर्का नहीं पहनती। बेपर्दगी का इल्जाम तो मुल्लाओं के लिए एक बहाना भर है। प्रगाश के कलाकार फिलहाल दिल्ली में हैं। अनट्रेसेबल हैं। मीडिया में खबरें उनके रिश्तेदारों के हवाले से आई हैं। अबदुल्ला खानदान ने कश्मीर की धरती और कश्मीर के लोगों का सौदा सबसे ज्यादा किया है।
मनीषा पाण्डेय


जश्न मनाओ दोस्तों
जवाब देंहटाएंहम आदमियों की जात हैं।
सिर पर बहरा भूत है
लहू में डूबे हाथ हैं।
निर्लज्ज निगाहें हो गईं
सड़े-गले जज्बात हैं।
जश्न मनाओ दोस्तों
हम आदमियों की जात हैं।
इसको पीटो, उसका लूटो
जैसे भी हो पैसा कूटो।
घात है फिर प्रतिघात है
सहर में घुल गई रात है।
जश्न मनाओ दोस्तों
हम आदमियों की जात हैं।
न राखी का मान रहा है
न किलकारी का ध्यान रहा है।
हवस की भट्टïी तप रही है
अब जलने लगी हयात है।
जश्न मनाओ दोस्तों
हम आदमियों की जात हैं।
सिसक रहा जंतर-मंंतर
गुमसुम है विजय चौक का अंतर।
हाय! रे तंत्र की रेलम-पेल
लोक खा रहा मात है।
जश्न मनाओ दोस्तों
हम आदमियों की जात हैं।
क्या मै कहूं, क्या मैं बोलूं
कैसे गजल की पलकें खोलूं।
घनघोर अंधेरों को धमकाने
निकली जुगनुओं की बारात है।
जश्न मनाओ दोस्तों
हम आदमियों की जात हैं।
किसी की अस्मत लुटती है
हर पल सांसे घुटती हैं।
फाइल पर कलमें लिखती हैं
बस, जारा-सी बात है।
जश्न मनाओ दोस्तों
हम आदमियों की जात हैं।
उधर इस्लाम ख़तरे में, इधर है राम ख़तरे में,
जवाब देंहटाएंमगर मैं क्या करूँ, है मेरी सुबहो-शाम ख़तरे में।
वो ग़म वाले से बम वाले हुए उनको पता क्यूँ हो,
के मुश्किल में मेरी रोटी, है मेरा जाम ख़तरे में।
ये क्या से क्या बना डाला है हमने मुल्क को अपने,
कहीं हैरी, कहीं हामिद, कहीं हरनाम ख़तरे में।
न बोलो सच ज़ियादा 'नूर' वर्ना लोग देखेंगे,
तुम्हारी जान जोख़िम में तुम्हारा नाम ख़तरे में।
-नूर मुहम्मद नूर