शुक्रवार, 29 मार्च 2013

क्यूँ न लिखूँ ?


                     
                                
       कोई मुझसे पूछे कि फेसबुक ने मुझे क्या दिया है ? मेरा जबाब है कि मुझे फेसबुक ने लिखते रहने की प्रेरणा दी है। मुझे बेहतर लिखने का माहौल दिया है। लेकिन यहॉं मुझे अपने लिये ऐसे ऐसे कमेन्ट और आलोचनायें पढने को मिली हैं जिनसे कभी कभी मन बहुत दुखी हो जाता है । अभी पिछले दिनों एक पुराने साहित्यकार मित्र ने मुझे पाकिस्तान का जासूस ही कह दिया। इससे पहले मुझे मुसलमान भी बताया गया। कई लोगों ने मुसलमानों का तलवे चाटने वाला, गददार, राष्ट्र द्रोही, चमार, बोद्ध कहा  है। मुझे नक्सलवादी और माओवादी कहा गया।काग्रेस का एजेन्ट और विदेशी पैसा खाने वाला दलाल एन0जी0ओ0 बताया गया है। एक ने तो मेरा नाम ही मधुरूददीन ओबेसी रख दिया। मॉं बहिन की गाली देने वालों की तो कोई गिनती ही नही है।
     मेरे सुहद मित्र ने मुझे आत्मविश्लेषण करने की सलाह दी है। मैं आत्मविश्लेषण करना चाहता हूँ करता भी रहता हूँ । मेरी समझ में ये तो आता है कि मेरे क्या लिखने से किन लोगों को तकलीफ होती है लेकिन ये समझ में नहीं आता है कि ये मुझे क्यूँ  नहीं लिखना चाहिये? आखिर इसमें गलत क्या लिखा गया है जो नहीं लिखा जाना चाहिये था? सिर्फ  इसलिये कि कुछ लोगों को ऐसा लेखन पसन्द नहीं है मैं लिखना बन्द कर दूँ. ये मेरी समझ में नहीं आता है। मैं किसी के पास नहीं गया कि आप मेरा लिखा हुआ छाप दो। लेकिन इन्टरनेट हमें अपने मन की बात कहने की आजादी देता है, मैं उस पर लिखकर अपना काम कर लेता हूँ । उस पर भी इतना हो हल्ला कि कुछ पढने से पहले ही गरियाना शुरू कर दें और चाहें कि जो हमें पसन्द ना हो वो ना लिखा जाये, ये कोई मानने वाली बात है? 

             मैंने इस टोका टोकी को नहीं माना है और लिखना जारी है। पहले पहल तो कुछ परिचित स्वयंभू साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने इस तरह धमकाने की कौशिश कि तुम्हें कुछ लिखना आता है?
  
     मैंने भी उन्हें उसी तल्खी में जबाब दिया कि तुम मुझे रोकने टोकने वाले कौन होते हो? मैं क्या तुमसे पूछकर लिखूंगा ? अब सम्बन्धों में ठंडापन रहे या तल्खी आये मैने उनकी परवाह नहीं की है।मैं उनका जिक्र नहीं करूँगा जिन्होंने मुझे लिखने को प्रोत्साहित किया है। जिस किसी ने एक शब्द भी कमेन्ट किया है वो सब मेरे लिये वंदनीय हैं| यहाँ बात उनकी ही की जायेगी जो मुझे लिखने से रोकने की कौशिश करते रहते हैं। पता नहीं मेरे लिखने से कौन सा आसमान टूट जायेगा या नेट पर कितना बोझ पड जायेगा जो उन्हें परेशानी होती है। एक बार एक अपरिचित पाठक ने मुझे फालतू आदमी और मेरे लेखन को फालतू बात का नाम दिया है। शायद मेरे लगातार लिखने से उकताकर उन्होंने मेरे बारे में ऐसा कहा होगा। कुछ लोगों की नजर में मैं ज्यादा लिखता हूँ और कुछ लोगों की नजर में मैं एक समुदाय विशेष पर ही लिखता हूँ । जबकि मैं बहुत कम लिख रहा हूँ और कई ऐसे विषय जिन पर तत्काल लिखा जाना जरूरी था समयाभाव के कारण मैं नहीं लिख पाता हूँ । कई बार विषय इतनी तेजी से आते जाते हैं कि सब पर कुछ लिखने से ये डर रहता है कि साथी कहेंगें ये बस अपने लिखने में ही लगा रहता है, हमें ना पढता है और ना लिखने देता है। ये बात भी दूसरी बातों की तरह गलत है। सच तो यह है कि मैं दूसरों को पढने और उन्हें लिखते देखने में इतना मग्न रहता हूँ कि मुझे अपना लिखना अनावश्यक लगने लगता है। मैं यह भी करता हूँ कि जो कुछ भी मैंने अच्छा पढा है उसे दूसरों के साथ शेयर कर दूँ ताकि वे भी अच्छा लिख पढ सकें।  बस एक यही वह काम है जो मुझे लिखने से रोकता है, वरना मन करता है लगातार लिखता रहूँ। मजरूह सुल्तानपुरी के शब्दों में मेरी हालत यह रहती है-

कहता है मेरा खामा किस किसको मैं बॉंधू
बादल से चले आते हैं मजमूँ मेरे आगे ।

        लेकिन जब कुछ लोग लगातार लॉंक्षित कर रहें हों या कुछ खास मित्र गण कुपित हो रहें हों तो मन बेचैन हो जाता है, और यह सोचने लगता हूँ कि मुझे इससे अलग क्या लिखना चाहिये? कुछ लोगों के लिये प्रेम, सौन्दर्य, देशभक्ति, धर्म, दर्शन जैसे शाश्वत और निर्विवाद विषयों पर लिखना ही बेहतर काम है,वही मुझे भी करना चाहिये। मुझे भी इससे कहॉं इन्कार है? लेकिन इनको समझने समझाने का नजरिया भी मैं अपना ही तो रखूँगा, उनकी नजर से कैसे देखूँ और समझ लूँ?  बस विवाद यहीं पर शुरू हो जाता है। वरना प्रेम हो या सौन्दर्य, देश हो या धर्म, चाहत हमारी भी कुछ कम नहीं है, समर्पण भी कम नहीं है, अभिव्यक्ति भी कम नहीं है। बस एक विशिष्ट जीवन दर्शन है जो कुछ को स्वीकार नहीं है और हमारे लिये कुछ भी उससे बाहर नहीं है। 
      लोग कहते हैं तुम्हारे लिखने से क्या होगा? मैं कहता कि आप इतना भी सोचते हैं यही क्या कम है? अपने लिये तो यही आदर्श है.

ले दे के अपने पास फकत एक नजर तो है 
क्यूँ जिन्दगी को देखें किसी की नजर से हम.
माना कि इस जमीन को गुलजार ना कर सके 
कुछ खार कम तो कर गये गुजरे जिधर से हम.

1 टिप्पणी:

  1. 1-राम कुमार सविता - तुम मुझे रोकने टोकने वाले कौन होते हो?
    बस इतना ही काफी है लिखते रहने के लिए.

    2-ध्रुव गुप्ता - आप आलोचनाओं को दरकिनार कर अपने दिल से लिखते रहिये ! फसेबूक जैसे मंच की आप जैसे सच्चे लोगों की ज़रुरत है .

    3-गोविन्द सिंह परमार - मित्र सूची को रिव्यू करले ,जिसकी भाषा मर्यादित न हो ,बाहर करे ,मत भिन्नता हो सकती है पर असहमति भी गरिमापूर्ण हो

    4-गिरिजेश तिवारी - बुद्ध का वचन अनुकरणीय है मित्र. चरैवेति चरैवेति.

    5-अहमद कमल सिद्दिकुई - आप् से किसने कहा कि आप् के लिखने से लोगों को तकलीफ होती है ?? मै भेड़ बकरियों कि बात नहीं कर रहा हूँ उनको ज़रूर कुछ अटपटा लगता होगा ...आप् के जैसा बेहतर और न्यायिक लेख फेस बुक पर् शायद ही कोई लिखता होगा ...किसी को जवाब देना है तो आपसे बेहतर लिख कर दिखाए ...

    6-अमित भारतीय बॉबी - बहुत अच्छे सर .. वाह क्या बात कही है.

    7-एस .यु . सैयद - आप अमर हैं ,नाथ हैं और मधुर तो है ही , अपनी मधुरिमा बिखेरते रहिये . एक कहावत हा I, कुत्ते भौंकते हैं रहेंगें और हाथी चलता ही रहेगा और चलते ही रहना चाहिए .सच बहुत कड़वा होता है ,इसे पचाने के लिए संस्कार और सुशिक्षा चाहिए ,पर हम में बहुत कम है .

    8-सुधाकर आशावादी- समाज में ऐसा बहुत कुछ है जो कूटनीति के अंतर्गत आता है , हमें यह नहीं भूलना चाहिए की जिस देश में हम रहते है उसके प्रति हमारी भी कुछ ज़िम्मेदारी है , एक पक्ष आपको दिखाई देता है , दूसरा नहीं , एक सवाल क्या किसी प्रदेश में बेटियों बेटियों में अंतर रखा जा सकता है कि मुस्लिम बेटियों के लिए सुविधाएँ हिन्दू बेटियों के लिए असुविधाएं , सो लिखो मगर तटस्थ भाव से .

    9-नवलेश कुमार - असहमति सहमती आपनी जगह ....मुझे अपनी बात कहनी है डंके की चोट पर कहूँगा.


    10-शैल त्यागी बेज़ार - 'ग़ालिब ' बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे ...
    ऐसा भी है कोई सब अच्छा कहें जिसे ...
    आप लिखते रहिये , लोगों को कहने दीजिये वैसे भी हकीक़त बहुत कम लोग स्वीकार कर पाते हैं , वो अपने वैचारिक खांचों में फंसें रहते हैं और उससे इतर कुछ सुनना पसंद नहीं करते .

    11-आराधना सिंह - आलोचना और प्रशंसा के चक्कर में नहीं पड़े। आप लिखते रहिएगा। आप जब लिख सकते है तो ज़रूर लिखना ही चाहिए।

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