रविवार, 19 फ़रवरी 2017


था समंदर का गुमां नालों में गुम होता गया
खुद को कहता था सिकंदर हार कर रोता गया
पाँव तो पटके  बहुत मर्जी का कुछ न हो सका
बदजुबानी के मगर कुछ बीज वो बोता गया .


बीज ये उगकर कटीले झाड़ बन लहरायेंगे
राह जो सीधी चलेगा उसको ये उलझायेंगे .
सबसे  पहले ये कटीले झाड़ जड़ से फूंक दो
वरना आगे बढ़ने के रस्ते नहीं खुल पायेंगे .


मंदिर-मस्जिद, ईद -दिवाली, ढूंढ ढूंढ कर पूज रहे,
है चुनाव का मौसम नेता घर घर जाकर बूझ  रहे
पर चुनाव के बाद ये नेता कहीं नजर न आयेगें
न सोचेंगे न पूछेंगें हम किस गम से जूझ रहे
 










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