शनिवार, 25 मार्च 2017

तुम बसंत को आने भी दो.

जहाँ सोच पर बैठा पहरा
दिल में रहता है डर ठहरा
वहीँ नेह का दीप जलायें
जहाँ दिखे अँधियारा गहरा .

      कुछ तो अँधियारा कम होगा
      कुछ कहने का भी दम होगा .
      आज नहीं छोड़ी फुलझड़ियाँ
      तो कल हाथों में बम होगा.

     बच्चों फुलझड़ियों से खेलों
    और बड़ों का गुस्सा झेलो
    डरो नहीं मुस्का कर बोलो
    आओ बाबा तुम भी ले लो .

 किलकारी में प्यार छुपा है
 जीवन का उपहार छुपा है
औ वैरागी देख यहाँ पर
खुशियों का संसार छुपा है.

गृहस्थ काज से क्यों भागे हो ?
क्यों तुम त्यागे हो समाज को ?
क्या अतीत में ढूंढ रहे हो ?
देख रहे क्यों नहीं आज को ?

वक्त नहीं पीछे जाता है
हठी हार कर रह जाता है.
हाँ समाज भी जो चुप रहता
घाव बहुत गहरे खाता है .

इतने गहरे घाव न देना
सदियों दर्द पड़े जो सहना
हम न कहीं भी जाने वाले
तुम को यहीं पड़ेगा रहना .

जब रहना है साथ यहीं पर
क्यूँ बिगड़े फिर किसी बात पर ?
मुस्काओ तो तनिक प्यार से
बल क्यूँ डाले हुए माथ पर ?

देखो जब हम मुस्काते हैं
प्यार भरे दिल मिल जाते हैं
सूखे ठूंठ काष्ठ पर भी तब
फूल सुहाने खिल जाते हैं .

कोयलिया को गाने भी दो
गाकर उसे रिझाने भी दो .
पतझर कोई नहीं चाहता है
तुम बसंत को आने भी दो.

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