विश्व को मन्त्र अहिंसा का देने वाले,
सच तूने सारे जग का उपकार किया।
नूतन युग के तुम ही बुद्ध महान हो,
आधुनिक भरत की तुम पहचान हो,
विश्व देखता तुम में नयी दिशाये हैं,
गीत तुम्हारे धरा,गगन ने गाये हैं,
साबरमती के संत सादगी के सागर
मानवता का तुमने आ उद्धार किया।
मार्क्सवाद से आशंकित थी यह दुनिया,
तुम आये ज्यों सूरज नया निकल आया,
वाद भ्रमित जग ने नूतन ही पथ पाया|शोषण संघर्षो के शूल बुहार सभी
सर्वोदय का पथ तुमने तैयार किया।
तेरे पथ चल अफरीकी आजाद हुये
काले गोरे एक साथ आबाद हुये,
हम कृतघ्न हैं गॉंधी तुमको भूल गये,
स्वतंत्रता पा गुब्बारे से फूल गये|
झपट पडे खाली कुर्सी हथियाने को
भाग्य विधाता भारत का बन जाने को,
गाहे-ब-गाहे ही बस तेरा नाम लिया
केवल पूंजीपतियों का ही काम किया
दीन दलित ने जब जीने का हक मॉंगा
चंबल की घाटी में उसे उतार दिया।
पथ दर्शक की आज आस्था बिकी हुई,
सदा निगाहें उन देशों पर टिकी हुई,
जहॉं मनुज केवल सरकारी प्राणी है,
रोटी के बदले मे गिरवी वाणी है|
जहॉं सभ्यता संस्कृति बदनाम हुई,
मानवता की देवी है नीलाम हुई,
जहॉं खुदा के पैगम्बर शैतान बने,
मजहब की खातिर इन्सा हैवान बने,
जिनके वादे और विवादों ने जग मे,
घ्रणा कटुता,हिंसा का प्रसार किया।
लेकिन वह दिन दूर नहीं है अब गॉंधी,
वादो और विवादों की जब यह ऑंधी,
अणुयुद्ध की ज्वाला को धधकायेगी,
क्रुद्ध रूद्र की लीला को दिखलयेगी|
तब गॉंधी तुझको ही याद करेगा जग,
फिर खोजेगा भूल बिसरा तेरा मग
हम भी इतिहासो के पन्ने पलटेंगें,
गॉंधी महापुरूष वह था यह रट लेंगें,
गोली खाकर जिसने अपने सीने पर,
हमको जिन्दा रहने का अधिकार दिया।
-अमरनाथ 'मधुर
-अमरनाथ 'मधुर
पथ दर्शक की आज आस्था बिकी हुई,
जवाब देंहटाएंसदा निगाहें उन देशों पर टिकी हुई,
जहॉं मनुज केवल सरकारी प्राणी है,
रोटी के बदले मे गिरवी वाणी है|
बहुत सुंदर !
कविता आरंभ से अंत तक पाठक को बांधे रखने में सफल है !!