बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

गीत - अभिशाप



घुटती सॉंसें, कुछ बोझिल मन,डसता हर घडी अकेलापन। 
जाने कैसा अभिशाप मिला सारा जीवन हो गया हवन ।। 


पैरों  के  नीचे  जमीं  नहीं 
सर से सरका है आसमान,
सारे भविष्य को लील गया 
उलझनों भरा ये वर्तमान।


ऑंखों  में  खोया   खोयापन 
पाँवों  में  भटकन  लिये  हुए,
सडको-सडकों फिरता हूँ अब 
इस भटकन को ही नियति मान।


अब धडकन-धडकन मौन रुदन हावी है एक अजीब थकन।
जाने कैसा अभिशाप मिला सारा जीवन हो गया हवन ।।


है याद अभी तक वो बचपन 
मम्मी,पापा का लाड प्यार,
दादी की आँखों से झरते 
आशीषों की मीठी फुहार ।


इक दिन ऐसा तूफान उठा 
रिश्तों में घुला कसैलापन,
जिन्दगी परत दर परत खुली 
फिर जीत हुई या हुई हार।


दरके रिश्ते, टूटे बंधन, कैसे अपने, क्या अपनापन ?
जाने कैसा अभिशाप मिला सारा जीवन हो गया हवन।


ये तो तय है ये तिमिर चीर 
आशा का होगा सूर्य उदय,
इक दिन उलझनें दूर होंगी, 
कुछ सम होगी जीवन की लय ।


पर कब तक ये टूटन का क्रम ? 
कब तक ये बिखरा-बिखरा मन?
ये घूँट घूँट ऑंसू पीना, कब 
तक ये हॅंसने का अभिनय ?


ऑंखों में घिरा-घिरा सावन, मन में दहकता पलाशवन।
जाने कैसा अभिशाप मिला, सारा जीवन हो गया हवन।।
                                        -यशपाल कौत्सायन

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