रविवार, 15 अप्रैल 2012

फिर भाषा की बात करें-پھر زبان کی بات کریں


   
     आपने मुहावरा सुना होगा अक्ल बडी की भैंस।मूर्ख व्यक्ति  के क्रिया कलाप के सन्दर्भ में इसका इस्तेमाल होता है। मैंने बहुत सोचा किन्तु ये बात समझ में ना आयी कि अक्ल का भैंस से क्या सम्बन्ध है? कई से पूछा कई तरह के जबाब मिले|  भैंस पहले खा लेती है फिर बाद में जुगालती रहती है। या गोबर करके उस पर ही बैठ जाती है। लेकिन बात कुछ स्पष्ट समझ में न आयी। फिर किसी ने बताया कि सही शब्द भैंस नहीं 'बहस' है। जब कोई व्यक्ति अक्लमंदी की कोई बात न करके कुतर्कयुक्त बहस किये जाता है तो कहा जाता है अक्ल बडी है या बहस| बहस का अपभ्रंश ही भैंस है।
 एक ओर मुहावरा है-'धोबी का कुत्ता घर का ना घाट का'। कहा जाता है कि एक बार कृष्ण जी ने घडी भर के लिये सोने की मुहरों की वर्षा की और ये कहा कि इस घडी में जो जितनी चाहे मोहरे बटोर सकता है | एक धोबी था। उसने सोचा कि घर तो कुत्ते कि देखभाल में छोड जाता हूँ  और घाट पर जाकर मोहरे बटोर लेता हूँ। मोहरों की बारिश तो सभी जगह हो रही है। वह घर पर कुत्ते को छोडकर घाट की ओर चल दिया| लेकिन वो तो कष्ण जी का घडी भर का ड्रामा था| घाट पर पहुँच ने में तो देर लगनी ही थी|धोबी के घाट पर पहुचने से पहले ही मोहरों की बारिश खत्म हो गयी। धोबी के हाथ कुछ न लगा। या हो सकता है उसके पहुचने से पहले किसी अन्य ने घाट पर पहले पहॅंचकर मोहरे बटोर ली हों। लेकिन धोबी का दुर्भाग्य जब वह घर पर पहुचा तो घर पर भी उसे मोहरे नहीं मिली।पता नहीं मोहरे चमत्कारिक थी जो किसी के हाथ आने से पहले ही उड़नछू हो गयी या कोई पड़ोसी उठा ले गया लेकिन इतना तय है किधोबी के हाथ एक भी मोहर नहीं लगी| धोबी ने डंडा उठाया लगा डंडे से कुत्ते को पीटने | पड़ोसियों ने कहा भाई कुत्ते को क्यों मारते हो | धोबी मारता जाता और कहता जाता ये धोबी का कुत्ता है घर नहीं रखा सकता तो घाट क्या रखातामैं इसे घर रखाने लिए छोड़कर गया लेकिन ये न घर का है ना घाट का |
              कहते हैं तभी से यह कहावत है कि धोबी का कुत्ता घर का ना घाट का। लेकिन मेरे समझ में ये नहीं आता कि इसमें कुत्ते का क्या दोष है? कुत्ते को तो मोहरों से कोई लगाव हो नहीं सकता। मोहरों से कुत्ते का पेट तो भर सकता तो वो उनकी कुछ परवाह भी करता |किसी ने एक झूठी हडडी डाल दी होगी और कुत्ता पूरी लगन से उस पर पिल पडा होगा। मोहरे जिसे ले जानी हो ले जाये।जब धोबी को घर के माल की परवाह नही तो कुत्ता क्यों परवाह  करने लगा? स्पष्ट है कि कुत्ते का घर का या घाट का ना होने का मुहावरा कुछ तार्किक नहीं है। इस सम्बन्ध में अचानक ही एक सामान्य पढ़े  लिखे ग्रामीण  ने बताया कि असल मुहावरा है 'धोबी का उत्ता घर का ना घाट का'। उत्ता मतलब बेटा। आपने सुना होगा उत्ता किसी काम का नहीं है। उत्ते को मौत नहीं आती। उत्ता रात को पीकर आ जाता है। लडके क्या हैं पूरे उत हैं। उत यानि की पूत। असल में कहानी यूँ  रही होगी जैसे कि ज्यादातर कमेरी जातियों में औरते पुरूषों के मुकाबले ज्यादा मेहनती होती हैं आदमी कम काम करते हैं।कुछ व्यसनी भी होते हैं तो कोई धोबी भी ऐसा ही निखटटू रहा होगा जिससे उसकी घरवाली बहुत तंग रहती होगी। वो घरेलू तो कोई कार्य करता ही नहीं होगा घाट पर कपडे  धोने के काम से भी जी चुराता होगा। उसकी पत्नि उसे कोसती होगी 'उत्ता  घर का तो कोई  काम कर ही नहीं सकता  घाट पर भी  कोई काम नहीं  कर सकता। बस धीरे धीरे बात सबकी जुबॉंन पर चढ वो धोबी का जो ना घर का काम करता है और ना किसी के कपडे धोता है। मोहल्ले पडोस की औरतें भी कहती होंगी हॉं अरे वो धोबी का उत्ता ना घर का ना घाट का दिन भर यूँ  ही डोलता रहता है। बस ऐसी ही कोई बात रही होगी जो 'धोबी का उत्ता ना घर का ना घाट का'।
        क्यों कैसी कही? बात कुछ जमीं की नहीं जमीं। आप कुछ और जानते हों या मानते हों तो जरूर बतायें।असल में सुनी सुनायी बातों को ज्यों  का त्यों  बिना किसी ना नुकर के मान लेने का मन नहीं करता। तर्क की कसौटी पर जो बात खरी उतरे वही समझ में आती है। कुछ गलत कह दिया हो तो फौरन अपनी गल्ती मानकर उसमें सुधार के लिये भी तैयार हैं बस हमें बात समझ में आ जानी चाहिये। आप ही कुछ समझाईये क्या सही है क्या गलत है ?
                                                                                                                                      -अमरनाथ 'मधुर'
پھر زبان کی بات کریں
آپ نے محاورہ سنا ہوگا عقل بڑی کی بھینس. بے وقوف شخص کے عمل كلاپ کے حوالہ میں استعمال ہوتا ہے. میں نے بہت سوچا لیکن یہ بات سمجھ میں نا آئی کہ عقل کا بھینس سے کیا تعلق ہے؟ کئی سے پوچھا کئی طرح کے جواب ملے | بھینس پہلے کھا لیتی ہے پھر بعد میں جگالتي رہتی ہے. یا گوبر کر کے اس پر ہی بیٹھ جاتی ہے. لیکن بات کچھ واضح سمجھ میں نہ آئی. پھر کسی نے بتایا کہ صحیح لفظ بھینس نہیں 'بحث' ہے. جب کوئی شخص اكلمدي کی کوئی بات نہ کرکے كتركيكت بحث کئے جاتا ہے تو کہا جاتا ہے عقل بڑی ہے یا بحث | بحث کا اپبھرش ہی بھینس ہے.
 
ایک طرف محاورہ ہے - 'دھوبی کا کتا گھر کا نہ گھاٹ کا'. کہا جاتا ہے کہ ایک بار کرشن جی نے گھڑی بھر کے لیے سونے کی مهرو کی بارش کی اور یہ کہا کہ اس گھڑی میں جو جتنی چاہے موهرے بٹور سکتا ہے | ایک دھوبی تھا. اس نے سوچا کہ گھر تو کتے کہ دیکھ بھال میں چھوڑ جاتا ہوں اور گھاٹ پر جا کر موهرے بٹور لیتا ہوں. موهرو کی بارش تو ہر جگہ ہو رہی ہے. وہ گھر پر کتے کو چھوڑ کر گھاٹ کی طرف چل دیا | لیکن وہ تو كش جی کا گھڑی بھر کا ڈرامہ تھا | گھاٹ پر پہنچ نے میں تو دیر لگني ہی تھی | دھوبی کے گھاٹ پر پہچنے سے پہلے ہی موهرو کی بارش ختم ہو گئی. دھوبی کے ہاتھ کچھ نہ لگا. یا ہو سکتا ہے اس کے پہچنے سے پہلے کسی دوسرے نے گھاٹ پر پہلے پهچكر موهرے بٹور لی ہوں. لیکن دھوبی کا بدقسمتی جب وہ گھر پر پہنچا تو گھر پر بھی اسے موهرے نہیں ملی. پتہ نہیں موهرے چمتكارك تھی جو کسی کے ہاتھ آنے سے پہلے ہی اڑنچھو ہو گی یا کوئی پڑوسی اٹھا لے گیا لیکن اتنا طے ہے كدھوبي کے ہاتھ ایک بھی مہر نہیں لگی | دھوبی نے ڈنڈا اٹھایا لگا ڈنڈے سے کتے کو پیٹنے | پڑوسیوں نے کہا بھائی کتے کو کیوں مارتے ہو | دھوبی مارتا جاتا اور کہتا جاتا یہ دھوبی کا کتا ہے گھر نہیں رکھا سکتا تو گھاٹ کیا ركھاتامے اسے گھر رکھانے لئے چھوڑ کر گیا لیکن یہ نہ گھر کا ہے نا گھاٹ کا |
           
کہتے ہیں تبھی سے یہ کہاوت ہے کہ دھوبی کا کتا گھر کا نہ گھاٹ کا. اور میری سمجھ میں یہ نہیں آتا کہ اس میں کتے کا کیا قصور ہے؟ کتے کو تو موهرو سے کوئی لگاؤ ​​ہو نہیں سکتا. موهرو سے کتے کا پیٹ تو بھر سکتا تو وہ ان کی کچھ پرواہ بھی کرتا | کسی نے ایک جھوٹی هڈڈي ڈال دی ہوگی اور کتا پوری لگن سے اس پر پل پڑا ہوگا.موهرے جسے لے جانی ہو لے جائے. جب دھوبی کو گھر کے مال کی پرواہ نہیں تو کتا کیوں پرواہ کرنے لگا؟ واضح ہے کہ کتے کا گھر کا یا گھاٹ کا نا ہونے کا محاورہ کچھ منطقی نہیں ہے. اس تعلق میں اچانک ہی ایک عام پڑھے لکھے دیہی نے بتایا کہ اصل محاورہ ہے 'دھوبی کا اتتا گھر کا نا گھاٹ کا'. اتتا مطلب بیٹا. آپ نے سنا ہوگا اتتا کسی کام کا نہیں ہے. اتے کو موت نہیں آتی. اتتا رات کو پی کر آ جاتا ہے. لڑکے کیا ہیں پورے ات ہیں. ات یعنی کی پوت. اصل میں کہانی یوں رہی ہوگی جیسے کہ زیادہ تر كمےري ذاتوں میں اورتے مردوں کے مقابلے زیادہ محنتی ہوتے ہیں آدمی کم کام کرتے ہیں. کچھ ويسني بھی ہوتے ہیں تو کوئی دھوبی بھی ایسا ہی نكھٹٹو رہا ہوگا جس سے اس کی گھر والی بہت تنگ رہتی ہوگی. وہ گھریلو تو کوئی کام کرتا ہی نہیں ہوگا گھاٹ پر کپڑے دھونے کے کام سے بھی جی چراتا ہے. اس کی پتن اسے كوستي ہوگی 'اتتا گھر کا تو کوئی کام کر ہی نہیں سکتا گھاٹ پر بھی کوئی کام نہیں کر سکتا. بس دھیرے دھیرے بات سب کی جبن پر چڑھ وہ دھوبی کا جو نا گھر کا کام کرتا ہے اور نہ کسی کے کےکپڑےدھوتا ہے. محلے کے پڑوس کی عورتیں بھی کہتی ہوں ہاں ارے وہ دھوبی کا اتتا نا گھر کا نا گھاٹ کا دن بھر یوں ہی ڈولتا رہتا ہے. بس ایسی ہی کوئی بات رہی ہوگی جو 'دھوبی کا اتتا نا گھر کا نا گھاٹ کا'.
        
کیوں کیسی کہی؟ بات کچھ جمي کی نہیں جمي. آپ کچھ اور جانتے ہوں یا مانتے ہوں تو ضرور بتائیں. اصل میں سنی سنائی باتوں کو جوں کا توں بغیر کسی نا نكر کے مان لینے کا من نہیں کرتا. دلیل کی کسوٹی پر جو بات کھری اترے وہی سمجھ میں آتی ہے. کچھ غلط کہہ دیا ہو تو فورا اپنی گلتي مان کر اس میں بہتری کے لئے بھی تیار ہیں بس ہمیں بات سمجھ میں آ جانی چاہئے. آپ ہی کچھ سمجھاييے کیا صحیح ہے کیا غلط ہے؟


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