आ जाओ सनम तुम एक बार ।
जो स्वप्न अधूरे, अनघड हैं पल भर में दूँगा मैं सवॉंर।
आ जाओ सनम तुम एक बार ।
आंचल में तुम्हारे टाकूंगा
मैं अपनी ऑंखों के मोती
क्या इनकी समता कर सकती
मन्दिर के दीपक की ज्योति
आवाज पहुँचाती क्या तुम तक मैं रहा तुम्हें कब से पुकार।
आ जाओ सनम तुम एक बार ।
मैं दूर खडा देखा करता,
मुस्कान तुम्हारे होटों की
सहलाता दिल का दर्द रहा
मधुमय पीडा थी चोटों की
यह गीत चषक लेकर तुमसे मधु-पीडा जग हजार।
आ जाओ सनम तुम एक बार ।
तस्वीर तुम्हारी है दिल में
अपने मन को समझाने को
अब और बचा बाकी क्या है
इस सूनेपन में गाने को
ये गीत अमर हो जाते फिर जो तुम गा देती एक बार।
आ जाओ सनम तुम एक बार ।
-अमरनाथ 'मधुर'
-अमरनाथ 'मधुर'
रचना काल :दिनॉंक 12-01-82


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