रविवार, 31 मार्च 2013

दिल्ली ही देश नहीं है




कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर विधान सभा में दिल्ली में गिरप्तार संदिग्ध आतंकी लियाकत अली शाह की गिरप्तारी पर एतराज करते हुए कई गंभीर सवाल उठाये हैं. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने कश्मीर में जो अशांत क्षेत्र क़ानून लागू कर रखा है उसे फ़ौरन हटा दे. क्यूँकी उसके कारण  कश्मीरियों का बहुत उत्पीडन हो रहा है . वे इस बात से इत्तफाक नहीं रखते हैं कि ऐसा करने पर कश्मीर में गड़बड़ी होने का बड़ा खतरा है. उनहोंने कहा कि अगर खतरा भी  है तो यह खतरा उठाना चाहिए .आपने  अफजल गुरु को फांसी दे दी, उसे वापिस नहीं ला सकते हैं लेकिन अगर अफसा को हटा दें तो उसे  वापिस ला  सकते हैं .उन्होंने ये भी कहा कि कई स्वार्थी समूह  उत्पन्न हो गए हैं जो कश्मीर में शान्ति नहीं चाहते हैं .आज कश्मीरियों को तमगे  और तरक्की पाने के लिए जेलों में सडाया जा रहा है और  फर्जी मुठभेड़ों में मारा जा रहा है .
      युवा मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्ला ने काफी जज्बाती तकरीर की है.उन्होंने  देश के सामने वाजिब सवाल उठाये हैं . अफसोस ये है कि उनकी आवाज कश्मीर विधान सभा  के बाहर सुनायी नहीं दे रही है. उन्हें चाहिए कि वे पूरे देश में घूम घूम कर भारत की जनता के सामने अपनी पीड़ा को रखें . मेरा विश्वाश है कि देश की जनता कश्मीरियों की इस पीड़ा को समझेगी और उनका साथ देगी .वैसे भी यह केवल कश्मीरियों के वाजिब मांगों का सवाल नहीं है, यह देश की एकता का सवाल है .देश जिसे कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से अरुणाचल तक एक बताया जाता है लेकिन जब देश के सीमान्त प्रदेश के भारतीय अपनी आवाज उठाते हैं तो उसे अनसुना किया जाता है और उस आवाज को जबरन कुचल भी दिया जाता है. यह बात उत्तर में कश्मीर, दक्षिण  में तमिलनाडु,  पूर्वोत्तर  में  मणिपुर,नागालैंड में रहने वाले भारत के नागरिकों को सुनकर समझी जा सकती है लेकिन उनकी आवाज को सुनने समझने से पहले ही उन्हें अलगाववादी, आतंकवादी कहने का हो हल्ला होने लगता है.ऐसे में अगर उन्हें अपने को बाकी देश से अलग थलग होने का एहसास होता है तो कुछ गलत नहीं होता है .इसका जिम्मेदार कौन है ? इसकी  जिम्मेदार दिल्ली है और उसके नजदीक के क्षेत्रवासी  हैं जो स्वयं को ही सारा  भारत समझते हैं. इस संकुचित मानसिकता को त्यागना होगा .साथ ही दिल्ली से दूर के भारतीयों की पीड़ा को समझकर दूर करना होगा. यह देश सही मायने में  तभी एक कहा जा सकता है .इसके लिए अगर उन्हें कुछ विशेष सहूलियते भी देनी पड़ें तो दी जानी चाहियें.धार्मिक, जातीय,भाषाई और इलाकाई अल्प्संखयक और पिछड़े समुदायों को सशक्त कर राष्ट्र की मुख्यधारा में साथ लेकर चलने का दायित्व केंद्र सरकार का  है,राष्ट्र को एक मानने वाले सारे भारतीयों का है.आओ हम अपने इस दायित्व को निभाएं और आवाज उठायें कि हम कश्मीरियों के साथ हैं, श्रीलंकाई तमिलों के साथ है, मणिपुरियों के साथ हैं ,उड़ीसा,झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के साथ हैं. हम सब मिलकर एक साथ हैं हम पूरा देश हैं केवल दिल्ली ही देश नहीं है .  



کشمیر کے وزیر اعلی عمر عبداللہ نے کشمیر اسمبلی میں دہلی میں گرپتار مشتبہ دہشت گرد لياكت علی شاہ کی گرپتاري پر اعتراض کرتے ہوئے کئی سنجیدہ سوالات اٹھائے ہیں. انہوں نے کہا کہ مرکزی حکومت نے کشمیر میں جو شورش زدہ علاقہ قانون نافذ کر رکھا ہے اسے فورا ہٹا دے. كيوكي اس وجہ سے کشمیریوں کا بہت اتپيڈن ہو رہا ہے. وہ اس بات سے اتتپھاك نہیں رکھتے ہیں کہ ایسا کرنے پر کشمیر میں گڑبڑ ہونے کا بڑا خطرہ ہے. انهونے کہا کہ اگر خطرہ بھی ہے تو یہ خطرہ اٹھانا چاہئے. آپ نے افضل گرو کو پھانسی دے دی، اسے واپس نہیں لا سکتے ہیں لیکن اگر اپھسا کو نکال دیں تو اسے واپس لا سکتے ہیں. انہوں نے یہ بھی کہا کہ کئی خود غرض گروپ پیدا ہو گئے ہیں جو کشمیر میں امن نہیں چاہتے ہیں. آج کشمیریوں کو تمغے اور ترقی حاصل کرنے کے لئے جیلوں میں سڈايا جا رہا ہے اور فرضی مڈبھیڑوں میں مارا جا رہا ہے.
      نوجوان اہم وزیر عمر عبداللہ نے کافی جذباتی تقریر کی ہے. انہوں نے ملک کے سامنے واجب سوال اٹھائے ہیں. افسوس یہ ہے کہ ان کی آواز کشمیر اسمبلی کے باہر سنائی نہیں دے رہی ہے. انہیں چاہئے کہ وہ پورے ملک میں گھوم گھوم کر بھارت کے عوام کے سامنے اپنی تکلیف کو رکھیں. میرا وشواش ہے کہ ملک کے عوام کشمیریوں کی اس درد کو سمجھےگي اور ان کا ساتھ دے گی. ویسے بھی یہ صرف کشمیریوں کے واجب مطالبات کا سوال نہیں ہے، یہ ملک کی سالمیت کا سوال ہے. ملک جسے کشمیر سے كنياكماري اور گجرات سے اروناچل تک ایک بتایا جاتا ہے لیکن جب ملک کے سرحدی ریاست کے بھارتی اپنی آواز اٹھاتے ہیں تو اسے انسنا کیا جاتا ہے اور اس آواز کو جبرا کچل بھی دیا جاتا ہے. یہ بات شمال میں کشمیر، جنوب میں تامل ناڈو، شمال مشرق میں منی پور، ناگالینڈ میں رہنے والے بھارت کے شہریوں کو سن کر سمجھی جا سکتی ہے لیکن ان کی آواز کو سننے سمجھنے سے پہلے ہی انہیں علیحدگی پسند، دہشت گرد کہنے کا ہنگامہ ہونے لگتا ہے. ایسے میں اگر انہیں اپنے کو باقی ملک سے الگ تھلگ ہونے کا احساس ہوتا ہے تو کچھ غلط نہیں ہوتا ہے. اس کا ذمہ دار کون ہے؟ اس کی ذمہ دار دہلی ہے اور اس کے قریب کے كشےترواسي ہیں جو خود کو ہی سارا بھارت سمجھتے ہیں. اس تنگ ذہنیت کو تياگنا ہوگا. ساتھ ہی دہلی سے دور کے ہندوستانیوں کا درد سمجھ کر دور کرنا ہوگا. یہ ملک صحیح معنوں میں تبھی ایک کہا جا سکتا ہے. اس کے لئے اگر انہیں کچھ خاص سهوليتے بھی دینی پڑیں تو دی جانی چاہئیں. مذہبی، نسلی، لسانی اور الاكاي الپسكھيك اور پسماندہ لوگوں کو مضبوط کر ریاست کی مین اسٹریم میں ساتھ لے کر چلنے کی ذمہ داری مرکزی حکومت کا ہے، ملک کو ایک ماننے والے سارے ہندوستانیوں کا ہے. آؤ ہم اپنے اس فرض کو ادا کریں اور آواز اٹھائیں کہ ہم کشمیریوں کے ساتھ ہیں، سری لنکا تملو کے ساتھ ہے، مپريو کے ساتھ ہیں، اڑیسہ، جھارکھنڈ اور چھتیس گڑھ کے قبائلیوں کے ساتھ ہیں. ہم سب مل کر ایک ساتھ ہیں ہم پورا ملک ہیں صرف دہلی ہی ملک نہیں ہے.



              

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें