बुधवार, 3 अप्रैल 2013

शान्ति का स्वर्गलोक भारत

                                      









  
         मैं एक नजर भारत के पडोसी देशों की आन्तरिक स्थिति पर डालता हूँ  तो यही दिखायी देता है कि पाकिस्तान में तालिबानी और दूसरे कट्टरपंथी आतंकवादी उत्पात मचाये हैं । श्रीलंका में तमिलों और मुसलमानों का जीना हराम है। बंग्लादेश में कटटरपन्थी मुसलमान वहॉं की राजनीतिक एवं न्यायिक व्यवस्था को ललकार रहे हैं । बर्मा में अहिंसावादी बौद्ध मुसलमानों के खून के प्यासे हैं। पडौसी चीन में तिब्बत के अन्दर बौद्वों का दमन नियमित है। जब अपने चारों तरफ के हालात इतने भयावह हों तब अपना भारत शान्ति का स्वर्गलोक लगने लगता है। लेकिन जैसे ही हम अपने यहॉं की जमीनी सच्चाईयों से रूबरू होते है हमारा ये  सारा के सारा स्वर्गलोक कराहता, बिलखता, टूटता, बिखरता नजर आने लगता है। जब मुझे बारह साल से अनशन पर बैठी इरोम शर्मिला का मणीपुर,जेलों और अस्पतालों के बीच लंगडाती सोनी सोरी  का छत्तिसगढ, दामिनीमय निर्भया दिल्ली और लियाकत अली शाहों का कश्मीर दिखायी देता है तो अपने देश की शान्ति सुकून नहीं देती बल्कि अपने अन्दर एक भय पैदा करती है। अपने देश में नागरिक स्वतंत्रता और न्यायिक व्यवस्था में विश्वास तब और डगमगा जाता है जब हम देखते हैं कि पडौसी देशों में तो कोर्ट के फैसलों द्वारा सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर आसीन राजनेताओं तक को पैदल कर दिया जाता है और हमारे यहॉं तमाम घ्रणित आरोपों की जॉंच ही पूरी नहीं होती है। हो जाये तो बमुश्किल किसी को सजा होती है। सजा हो जाये तो उसका क्रियान्वयन रोकने के लिये स्यापा होने लगता है। राजनेता तो उसकी कुछ परवाह ही नहीं करते है। मुझसे किसी ने कहा था कि हमारे पडौस के हालात उतने खराब नहीं हैं जितने हम समझते है और जितना हमारा मीडिया दिखाता है। अपने देश में ऐसे हाल में भी लोग अगर खुश हैं तो इससे ज्यादा खराब हालात यकीनन पडौसी देशों में तो नहीं होंगें। सिर्फ इसलिये कि हम नियमित रूप से पॉंच साल में चुनाव कर लेते हैं एक आजाद और लोकतांन्त्रिक देश के नागरिक नहीं कहला सकते हैं। वास्तविक आजादी और जनतंत्र अभी बहुत दूर है।  














میں ایک نظر بھارت کے پڑوسی ممالک کی اندرونی صورتحال پر ڈالتا ہوں تو یہی دکھائی دیتا ہے کہ پاکستان میں طالبان اور دوسرے انتہا دہشت فساد مچايے ہیں. سری لنکا میں تملو اور مسلمانوں کا جینا حرام ہے. بنگلہ دیش میں كٹٹرپنتھي مسلمان وہاں کی سیاسی اور عدالتی نظام کو للکار رہے ہیں. برما میں اهساوادي بودھ مسلمانوں کے خون کے پیاسے ہیں. پڈوسي چین میں تبت کے اندر بودوو کا دمن برابر ہے. جب اپنے چاروں طرف کے حالات اتنے خطرناک ہوں تو اپنا بھارت امن کا سورگلوك لگنے لگتا ہے. لیکن جیسے ہی ہم اپنے یہاں کی زمینی سچچاييو سے روبرو ہوتے ہیں ہمارا یہ سارا کے سارا سورگلوك كراهتا، بلكھتا، ٹوٹتا، بكھرتا نظر آنے لگتا ہے. جب مجھے بارہ سال سے انشن پر بیٹھی اروم شرملا کا ميپر، جیلوں اور ہسپتالوں کے درمیان لگڈاتي سونی سوری کا چھتتسگڈھ، دامنيمي نربھيا دہلی اور لياكت علی شاهو کا کشمیر دکھائی دیتا ہے تو اپنے ملک کی امن سکون نہیں دیتی بلکہ اپنے اندر ایک خوف پیدا کرتی ہے. اپنے ملک میں شہری آزادی اور عدالتی نظام میں ایمان اس وقت اور ڈگمگا جاتا ہے جب ہم دیکھتے ہیں کہ پڈوسي ممالک میں تو کورٹ کے فیصلوں کی طرف سے اقتدار کے اعلی ترین چوٹی پر مقرر سیاستدانوں تک کو پیدل کر دیا جاتا ہے اور ہمارے یہاں تمام گھرت الزامات کی جچ ہی پوری نہیں ہوتی ہے. ہو جائے تو بمشکل کسی کو سزا ہوتی ہے. سزا ہو جائے تو اس کا عملدرآمد روکنے کے لیے سياپا ہونے لگتا ہے. سیاسی لیڈر تو اس کی کچھ پرواہ ہی نہیں کرتے ہیں. مجھ سے کسی نے کہا تھا کہ ہمارے پڈوس کے حالات اتنے خراب نہیں ہیں جتنے ہم سمجھتے ہیں اور جتنا ہمارا میڈیا دکھاتا ہے. اپنے ملک میں ایسے حال میں بھی لوگ اگر خوش ہیں تو اس سے زیادہ خراب حالات یقینا پڈوسي ممالک میں تو نہیں ہوں گے. صرف اس لئے کہ ہم باقاعدگی سے پچ سال میں انتخاب کر لیتے ہیں ایک آزاد اور لوكتانترك ملک کے شہری نہیں کہلا سکتے ہیں. اصلی آزادی اور جنتتر ابھی بہت دور ہے.

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