गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

कोरियाई युद्धोन्माद

        



               







                अभी ज्यादा पुराना इतिहास नहीं हुआ है जब लाल झंडा सारी दुनिया के दबे कुचले लोगों की आशा आकांक्षाओं का प्रतीक हुआ करता था.उस झंडे के नीचे खड़े होने वाले जनता के नायक हुआ करते थे और उस झंडे को उंचा उठाकर चलने वाली फौजें जन मुक्ति वाहिनी कहलाती थीं .लेकिन आज उसी लाल झंडे के नीचे खड़े होकर उत्तरी कोरिया का तानाशाह किम जुंग ऊन परमाणु युद्ध का उन्माद जगा रहा है.समंदर की खौफनाक लहरों की तरह उमड़ती उत्तरी कोरिया की लाल सेना दूसरे विश्व युद्धकालीन जापान की सेनाओं की याद ताजा कर रही है. निश्चित  ही उत्तरी कोरिया भयग्रस्त है जिसके कारण वह बौखलाहट में यह सब कर रहा है  लेकिन उसके भयग्रस्त होने की कोई वजह नहीं है. दक्षिण कोरिया चाहे कितना भी अमेरीकी साए में रहे वो उत्तरी कोरिया से युद्ध नहीं लड़ना चाहेगा.इसलिए उत्तरी कोरिया जो लगातार अमेरिकी दादागिरी को दुस्साहसी तरीके से ललकार रहा है वह उसके लिए  एक आत्मघाती कार्यवाही सिद्ध हो सकता है.हमें नहीं भूलना चाहिए कि विश्व की आर्थिक महा शक्ति  और प्रबल सैन्य शक्ति होते हुए भी जापान को लड़ाई में भयानक पराजय का कहर झेलना पड़ा था तथा उसके बाद उसने पूरी तरह से  अमेरिका के आगे घुटने टेक दिए थे जो अभी तक टिके हैं . इसलिए कहीं  उत्तरी कोरिया का भी यही हाल न हो इससे  अच्छा होगा कि वह अमेरिका से उलझने कि हिमाकत न करे. सबसे अच्छा तो यही रहेगा कि दोनों कोरिया  के नेता अपने यहाँ कोरिया के एकीकरण के मुद्दे पर जनमत संग्रह करा लें और उसके बाद एक संयुक्त सरकार का गठन कर देश के एकीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दें ताकि वैमनस्यकता  की जड़ ही ख़त्म हो जाए,  इससे  अमेरिकी हस्तक्षेप  से भी मुक्ति मिलेगी और जनता का भी भला होगा . लेकिन एकीकरण में जितनी  बाधा  अमेरिका की है उससे भी ज्यादा उत्तरी कोरियाई तानाशाह की  है . सिर्फ लाल झंडे लहराने से ही जनता का भला नहीं हो सकता है,जनमत का आदर करना और जनता के हित में कार्य करना भी जरूरी है .उत्तरी कोरिया के शासक  ऐसा  नहीं कर रहे हैं और न ही उन्हें वहाँ की जनता ने जनतांत्रिक तरीके से चुना  है.  इसलिए वो जनता के नेता नहीं हैं वो लाल झंडे के वफादार नहीं हैं . वे जनता के अपराधी है अगर उन्हें कोई सजा  मिलती  है तो सारी दुनिया  में कहीं से भी उनके लिए सहानुभूति नहीं मिलने वाली है.  उन जैसे नकली   कम्युनिस्टों   से विश्व कम्युनिस्ट  आन्दोलन  को बहुत  नुकसान  पहुंचा  है .वे जनता के सपनों  के हत्यारें  हैं .

     
ابھی مزید پرانا تاریخ نہیں ہوا ہے جب لال جھنڈا ساری دنیا کے دبے کچلے لوگوں کی امید تمناؤں کی علامت ہوا کرتا تھا. اس پرچم کے نیچے کھڑے ہونے والے عوام کے ہیرو ہوا کرتے تھے اور اس پرچم کو اونچا اٹھا کر چلنے والی فوجیں جن مکتی واهني کہلاتی تھیں. لیکن آج اسی لال جھنڈے کے نیچے کھڑے ہو کر شمالی کوریا کے ڈکٹیٹر کم جگ اون ایٹمی جنگ کا جنون جگا رہا ہے. سمندر کی خوفناک لہروں کی طرح امڑتي شمالی کوریا کی سرخ فوج دوسرے عالمی يددھكالين جاپان کی فوجوں کی یاد تازہ کر رہی ہے. یقینا شمالی کوریا بھيگرست ہے جس کی وجہ سے وہ بوکھلاہٹ میں یہ سب کر رہا ہے لیکن اس کے بھيگرست ہونے کی کوئی وجہ نہیں ہے. جنوبی کوریا چاہے کتنا بھی امریکی سائے میں رہے وہ شمالی کوریا سے جنگ نہیں لڑنا چاہے گا. اس لئے شمالی کوریا جو مسلسل امریکی داداگري کو حوصلہ مند طریقے سے للکار رہا ہے وہ اس کے لئے خود کش کارروائی ثابت ہو سکتا ہے. ہمیں نہیں بھولنا چاہیے کہ دنیا کی اقتصادی مہا طاقت اور مضبوط فوجی طاقت ہوتے ہوئے بھی جاپان کو جنگ میں بھیانک شکست کا قہر برداشت کرنا پڑا تھا اور اس کے بعد اس نے مکمل طور پر امریکہ کے آگے گھٹنے ٹیک دیے تھے جو ابھی تک ٹکے ہیں. اس لیے کہیں شمالی کوریا کا بھی یہی حال نہ ہو اس سے بہتر ہو گا کہ وہ امریکہ سے الجھنے کہ ہماکت نہ کرے. سب سے بہتر تو یہی ہوگا کہ دونوں ممالک کے رہنما اپنے یہاں کوریا کے مجموعی کے مسئلے پر ریفرنڈم کرا لیں اور اس کے بعد ایک مشترکہ حکومت کی تشکیل کر ملک کے مجموعی کا عمل شروع کر دیں تاکہ وےمنسيكتا کی جڑ ہی ختم ہو جائے، اس سے امریکی مداخلت سے بھی نجات ملے گی اور عوام کا بھی بھلا ہوگا. لیکن مجموعی میں جتنی رکاوٹ امریکہ کی ہے اس سے بھی زیادہ شمالی کوریا کے ڈکٹیٹر کی ہے. صرف لال پرچم لہرانے سے ہی عوام کا بھلا نہیں ہو سکتا ہے، رائے عامہ کا احترام کرنا اور عوام کے مفاد میں کام کرنا بھی ضروری ہے. شمالی کوریا کے حکمران ایسا نہیں کر رہے ہیں اور نہ ہی انہیں وہاں کے عوام نے جمہوری طریقے سے منتخب کیا ہے. اس لیے وہ عوام کے لیڈر نہیں ہیں وہ سرخ جھنڈے کے وفادار نہیں ہیں. وہ عوام کے مجرم ہیں اگر انہیں کوئی سزا ملتی ہے تو ساری دني میں کہیں سے بھی ان کے لئے ہمدردی نہیں ملانے والی ہے، ان جیسے جعلی کمیونسٹوں سے عالمی کمیونسٹ تحریک کو بہت نقصان پہنچا ہے. وہ عوام کے خوابوں کے هتيارے ہیں.



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