विशेष जज ज्योत्सना याग्निक ने 2002 में गुजरात के मुस्लिम विरोधी दंगों के दौरान नरोरा-पाटिया में हुए नरसंहार के शिकार 97 लोगों की हत्या के 32 आरोपियों को दंडित कर जिनको एक बड़ा झटका दिया है। उनमें प्रमुख हैं विधायक और पूर्व मंत्री माया कोडनानी और बजरंगदल का गुंडा बाबू बजरंगी जो दस साल तक खुले सांड की तरह घूमता और यह डींग मारते रहा था कि हिंसक भीड़ की अगुआई करते समय वह अपने को 'राणा प्रताप जैसा' महसूस कर रहा था। लंबे अरसे तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की 'लाड़ली' और मुख्यमंत्री की करीबी रही माया कोडवानी उस पूर्व नियोजित हत्याकांड की मुख्य कसाई थी जिसमें 32 महिलाओं और 30 पुरुषों के साथ-साथ 35 अबोध बच्चों और 20 दिन के शिशु तक को बेरहमी से मार दिया गया था। मारे जाने वाले इन सबका केवल एक कसूर था: ये सब मुसलमान थे। पाटिया इलाके को अच्छी तरह से जानने वाली स्त्रीरोग विशेषज्ञ ने अपने शिकारों की पहले से निशानदेही की थी और भीड़ को निर्देशित किया था जिसने उनको मार डाला और आग के हवाले कर दिया था। उसने पिस्तौल से गोली चलाई और दंगाइयों को हथियार तथा मिट्टी का तेल बांटा था। अगर उसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो माया कोडनानी का अपराध किसी भी मायने में कसाब से कम नहीं था, जिसने मुंबई के सीएसटी स्टेशन पर अपने संगी आतंकवादियों के साथ मिलकर 58 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। वह सिर्फ इतने सारे लोगाे की हत्या के लिए ही जिम्मेदार नहीं थी, वह बेवकूफी की हद तक नफरत की बीमारी से भी ग्रस्त थी। वह जानती थी कि मारे जाने वाले बेकसूर थे और इतनी दूर गोधरा में ट्रेन के डिब्बे को जलाने के लिए जिम्मेदार नहीं थे। कसाब भी जानता था कि वह बेकसूर लोगों को सिर्फ इसलिए मार रहा है कि वे भारतीय हैं। माया कोडनानी को दी गई 28 साल के कारावास की सजा, जिसमें खतरनाक हथियारों अथवा उपायों से जानबूझ कर गंभीर चोट पहुंचाने के लिए 10 साल की सजा, और इसके बाद 18 साल की सजा हत्या, षड़यंत्र और और अन्य आरोपों के लिए, तथा 31 अन्य को आजीवन कारावास की सजा एक शक्तिशाली संदेश है। और संदेश यह है कि हिंसा और धौंसपट्टी से अंततया फायदा नहीं होगा। राष्ट्र पूर्वाग्रह और सांप्रदायिक घृणा पर आधारित उस राजनीतिक गिरोह को बर्दाश्त या माफ नहीं करेगा जिसका प्रतिनिधित्व नरोदा पाटिया के कसाई करते हैं। भारत न्याय देने में भारतीय न्यायपालिका कुछ की गति धीमी है। लेकिन इस मामले में इसने कानून के राज को लागू करने के अपने संकल्प को प्रदर्शित कर दिया है, वो भी महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्तियों के विरुध्द, और इस तथ्य के बावजूद कि माया कोडनानी पर पुलिस की भारी कृपा बनी हुई थी जिसने उसे बचाने के लिए जांच एजेंसियों के कर्तव्य की कीमत पर हर मुमकिन कोशिश की थी। ये अभूतपूर्व सजाएं धर्मनिरपेक्ष जनमत के दबाव में सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बिना मुमकिन नहीं थीं। ऐसा करना गुजरात हिंसा को राय सीमाओं से बाहर ले जाने और यह स्वीकार करने के लिए बेहद जरूरी था कि यह एक राष्ट्रीय, वास्तव में एक वैश्विक कलंक का, मानवता के विरुध्द अपराध का मामला था, जिसकी दुनिया भर में निंदा हुई थी, और इसमें ऐसी सजा दी जानी थी, जो उदाहरण बन सके। न्यायिक हस्तक्षेप, विशेष जांच दल (विजाद) की नियुक्ति सहित, नागरिक आयोगों की 40 से अधिक जांचों तथा नागरिक समाज द्वारा तैयार अनेक अन्य रिपोर्टों और विख्यात बुध्दिजीवियों द्वारा उन घटनाओं के प्रमाण प्रस्तुत किए जाने के बाद ही हो पाया था जिनमें हिंसा को उकसाने या भड़काने में राय के उच्च स्तरीय कर्मियों की भूमिका को दिखाया गया था जिसकी शुरूआत अहमदाबाद में गोधरा पीड़ितों की लाशों की भड़काऊ ढंग से परेड कराने और विश्व हिंदू परिषद को बंद करवाने की इजाजत देने से हुई थी जिसका मकसद साफ तौर पर मुस्लिम विरोधी हमलों को उकसाना था। स्वतंत्र भारत के सबसे भयावह राय प्रायोजित नरसंहार के खून के उन धब्बों को नरेंद्र मोदी कभी धो नहीं पाएंगे जो उनके पूरे व्यक्तित्व पर लग गए हैं। मोदी की छवि कभी उजली नहीं हो पाएगी चाहे वह कितने ही सद्भावना अभियान क्यों न आयोजित करा लें और चाहे वह शाहिद सिद्दिकी जैसे लोगों को कितने ही नकली इंटरव्यू क्यों न दे लें जिनमें वह मुसलमानों के प्रति अपनी मुहब्बत का ऐलान करते हैं और कहते हों कि यदि दोषी पाए जाएं तो उनको भी सजा मिलनी चाहिए। 2002 में नरसंहार के लिए भारत नरेंद्र मोदी को राजनीतिक रूप से सजा नहीं दे पाया था। गुजरात में संवैधानिक व्यवस्था के स्पष्ट रूप से टूट जाने के बावजूद एनडीए सरकार ने राष्ट्रपति शासन लागू करने से इंकार कर दिया था। विरोधी दलों ने मोदी को हटाने का कोई मजबूत और सतत् अभियान नहीं चलाया था। सांप्रदायिक तौर पर ध्रुवीकृत परिस्थिति में मोदी को दो बार जीत हासिल हुई। बड़े व्यवसाय जिस पर मोदी ने भारी सुविधाओं और रियायतों की बरसात की है उसने उनको ''विकास'' की मानसिकता वाला मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। जनता से बहुत से दूसरों ने कहा कि जो हो गया उसे भूल जाना चाहिए। लेकिन 10 साल बाद 2002 का भूत मोदी पर फिर से मंडराने लगा है। वह अब भी एक बेहद तोड़फोड़ करने वाला और अत्यंत घृणित व्यक्ति है। जिसका विरोध परिवार और भाजपा के जनता दल यूनाईटेड जैसे सहयोगी भी करते हैं। आशा की जा सकती है कि विरोधी मोदी के उस दांव को उलट देंगे जो वह अपने लिए राष्ट्रीय भूमिका के लिए लगाए बैठे हैं। |
गुरुवार, 18 अप्रैल 2013
नरेन्द्र मोदी को बाड़ा झटका -प्रफुल्ल विदवई [साभार 'देशबन्धु']
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Mr. madhur ji...No comments on this article...But India need Narendra Modi and we are with him!!
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