मंगलवार, 5 जुलाई 2016

'आवाज ए फ़राज़'


औ हँसते चेहरों के दुश्मन सामने आजा वार भी कर 
हँसता गाता देख न हमको , तलवारों पे धार भी धर. 
कटने को तैयार यहाँ पर शीश हजार कतार में हैं
देखें हम भी कितना पानी तेरी इस तलवार में है.

हम उस परंपरा के वारिश जिसने है इतिहास लिखा 
वीर बहादुरशाह जफ़र के बेटो का रंग ख़ास दिखा . 
गुरु गोविन्द सिंह के बेटों की हममें बसी जवानी है  
खून शिरा में बहता है, ना कोई बहता पानी है .

जालिम आ तलवार चला ये शीश नहीं झुक सकता है 
शीश रहा तो हाथ हमारा तुम पर भी उठ सकता है . 
नहीं कोई परवाह हमें तुम हम मजहब हो, भाई हो 
चीख चीख कर बोलेंगे तुम कायर, क्रूर, कसाई हो .

मानवता के दुश्मन हो, कुछ कर्म नहीं इंसानों का 
मजहब को बदनाम कर रहे काम है सब हैवानों का. 
मेरा मजहब कहता है, मैं जालिम से टकराउंगा 
अपने मित्रों के मरने से पहले मैं मर जाऊँगा .

लाओ अपने फरसे, बरछे, छुरी, कटारी, तलवारें  
देखें वो थकती हैं पहले या हम हिम्मत हैं हारें 
लिख लेना दुनिया देखेगी ना हम झुके, ना हारे हैं
तुम ने ज्यूँ त्यूँ गिरते पड़ते, अपने शीश उतारें हैं .

शीश कटाकर भी अपना, हम मुस्काये ही जाते हैं 
दुनिया में कैसे जीना, मरना बतलायें जाते हैं .
ओ मजहब का परचम लेकर चलने वालों सुन लो तुम 
जिस दिन तुम घेरे जाओगे, टाँगों में रखोगे दुम .

मारे भी जाओगे ऐसे जैसे शूकर, श्वान मरे  
कब्रिस्तान तुम्हें दफनाने को बोलेगा परे परे.
कौवे गिद्ध चील गीदड़ शव नोच नोच कर खायेंगे
तुम को दफनाने को चल कर चार लोग ना आयेंगे .

खून हमारा रंग लाएगा तुम को बतलाये देते  
दिन गिनती के बचे तुम्हारे तुमको समझाए देते 
अभी पिटे काबुल में हो तुम अभी सीरिया में मारा
पहले भी मारा ढाका में, फिर मारेंगे दोबारा .

दहशतगर्दों का छोड़ेंगे धरती पर ना नाम निशान 
खोज खोज कर मारेंगे सब छुपे कहीं भी हों शैतान 
सब धर्मों के,सब मुल्कों के बच्चे,बूढ़े और जवान 
मानवता के लिए लड़ेंगे और जियेंगे सीना तान .









    






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