गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

मैं हंसी सूरत का आशिक बात बस इतनी सी है 
वो मेरे माजी में जाने खोजते फिरते हैं क्या ?
जो मेरे दिल को लगा अच्छा, वो मैंने कह दिया 
क्यूँ कहा ? कैसे कहा ? वो सोचते रहते हैं क्या ?


हम से कोई खुश न होता फिर भी हम मोजूद रहे

जो दिल में आता  कह देते ऐसे हम बेसूद रहे
उन की महफ़िल में हाँ जी हाँ का ही मुजरा होता था
हम ऐसे थे ना कहते थे फिर भी हम महबूब रहे .



किताबें हाथ में अच्छी थी क्यूँ  पत्थर उठा लाये 

ये मसला यूँ न सुलझेगा तुम्हें कैसे ये समझायें.
तुम्हारे एक पत्थर से किसी सिर जो फूटेगा 
तो फिर बंदूक वालों का कहर तुम पर भी टूटेगा .





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